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किसान आंदोलन के विरोध समर्थन में नही अपनी नासमझी में अपनी डिग्री वापस कर दूँ : के के अस्थाना

सोच रहा हूँ अपनी डिग्री वापस कर दूँ। किसी के विरोध या समर्थन मे नहीं, अपनी नासमझी के कारण। मुझसे तो वह अनपढ़ किसान भले हैं जो किसान बिल को पूरा पूरा समझ गए हैं और उसे वापस लिए जाने की मांग कर रहे हैं।कोरोना और जाड़े को भूल कर दिल्ली की सीमा सील किए बैठे हैं।

मैंने किसान बिल को कई कई बार पढ़ा। किसानों की बात सुनी। पक्ष की बात सुनी। विपक्षियों की बात सुनी। टीवी पर बहस सुनी, पर अभी तक समझ नहीं पाया हूँ की इसमे ऐसा क्या है जिसे खासतौर से किसान विरोधी कहा जा सके। लानत है मेरी पढ़ाई पर और ऐसी शिक्षा प्रणाली पर जो मुझे इस लायक नहीं बना पाई की मै इस बिल मे किसान विरोधी तत्वों की पहचान कर सकूँ।

मै भी एक आम हिन्दुस्तानी हूँ। टीवी की चीख पुकार के आधार पर किसी मुद्दे पर अपनी राय बनाता हूँ। टीवी पर माइक हाथ मे थामे हाँफ हाँफ कर चिल्लाती हुई सुंदरी और उससे टक्कर लेता हुआ दूसरे चैनल का थका हारा रिपोर्टर मेरे ज्ञान के स्रोत हैं। मेरा सारा ज्ञान उनकी आवाज की पिच पर निर्भर करता है। जो रिपोर्टर जोरदार आवाज मे अपनी बात कहता है मेरा मन उसकी बात को सही मान लेता है। पर इस किसान बिल पर इन लोगों ने किसी खास एंगल पर ज्यादा फोकस ही नहीं किया। इसलिए इस मुद्दे पर मेरी भी कोई खास राय नहीं बन पाई। मै भी लंगर और किसानो के आपसी भाईचारे की कहानियों पर अटक कर रह गया।

किसानों और सत्ता के बीच जो बातें होती रहीं उससे भी कोई राय बनाना संभव नहीं हो पाया। किसान नेता वार्ता करने गए। सत्ता पक्ष ने वार्ता की। किसान नेताओं ने शुरू मे ही कह दिया की बिल वापस लो। इससे कम पर कोई वार्ता नहीं होगी। सत्ता पक्ष ने कहा की बिल मे कोई परिवर्तन नहीं होगा।इसके अलावा और कोई बात हो तो बताओ। हमारे दरवाजे वार्ता के लिए हमेशा खुले हैं। दोनों पक्ष खुले दरवाजे मे वार्ता के लिए इकट्ठे हुए। वार्ता हुई। उन्होने कहा नहीं। उन्होने सुना नहीं। वार्ता सम्पन्न हुई।

वार्ता दुबारा हुई। वह अपना अपना खाना लेकर आए। अपना पानी लेकर आए। अपनी चाय लेकर आए। दोनों ने अपना अपना खाना खाया। अपना अपना पानी पिया। अपनी अपनी चाय पी। अपनी अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होने अपने अंगौछे या गमछे से मुंह पोछा। उन्होने टिश्यू पेपर से हाथ पोछे। वार्ता एक बार फिर पॉज़िटिव नोट पर समाप्त हुई। और इस तरह अच्छे माहौल मे वार्ता के पाँच दौर हो गए। अगली वार्ता फिर होगी।

लोकतन्त्र की यही तो खासियत है कि वार्ताएं होती हैं।हालांकि वार्ता का नतीजा अक्सर पहले से तय होता है। हम गीता के ज्ञान वाले लोग जो ठहरे। पर सब अपना अपना कर्तव्य तो निभाते हैं। सब इकट्ठे होते हैं। वार्ता करते हैं। पर उसका फल किसी तीसरे के हाथ मे होता है। फल इस पर निर्भर करता है कि यह तीसरा कौन है। इस किसान आंदोलन मे अभी तीसरे की पहचान नहीं हो पाई है। पहचान तो वैसे अभी तक किसानों की भी नहीं हो पाई है।कुछ लोगों को इस किसान आंदोलन मे बदलते भारत के किसान नज़र आते हैं जो किसान के परंपरागत ढांचे मे फिट ही नहीं बैठते।

मै स्वीकार करता हूँ कि मै भी अभी तक भारत के किसानों को कम करके आंक रहा था। यानी उन्हे अंडर एस्टीमेट कर रहा था। किसानों के बारे मे मेरा ज्ञान मुंशी प्रेमचंद तक ही सीमित सीमित था। मुझे लगता था कि वह पूस की रात मे अपने कुत्ते के साथ खेतों मे पानी देने गया होगा और वहीं झोपड़ी मे पड़ा कुड़कुड़ा रहा होगा।पर वह लक्जरी गाड़ियों मे चढ़ कर आ गया। लक्जरी गाड़ियों मे मै उसे पहचान नहीं पाया।

मुझे लगता था कि उसके पास दो जून की रोटी का जुगाड़ भी नहीं होता है। किसी तरह चना चबेना से पेट की आग बुझा लेता है। जब पता चला कि वह छै महीना का राशन साथ लेकर आया है, तो कलेजे को बड़ी ठंढक पंहुची। अभी पिछली खबर तक तो वह कर्ज से डूबा हुआ था। कर्जा अदा न कर पाने के कारण फांसी लगा रहा था। बड़ा संतोष हुआ जानकर कि अब वह उससे बहुत आगे निकाल आया है। मुझे तो लगता है कि भारत का स्वाभिमानी किसान अब कोई सब्सिडी स्वीकार नहीं करेगा। वैसे भी एसयूवी मे चलना और दया की बिना पर सब्सिडी लेना एक साथ शोभा भी नहीं देते।

मुझे लगता है कि किसानों के हित के लिए यह बिल बनाने वालों का किसानों के बारे मे ज्ञान मेरे जैसा ही था। किसानों के बारे मे उनकी जानकारी का स्रोत भी मुंशी प्रेमचंद ही थे। उन्होने भी धनिया और होरी को कंजूस, कसाई और सूदखोर बिचौलियों से बचाने के लिए बिल बना डाला। वह नया भारत बनाने चले थे, पर उन्हे पता ही नहीं था कि दुनिया कितनी बदल चुकी है।

आधे भारत मे प्रेमचंद के हीरा मोती की जगह बड़े बड़े ट्रैक्टर आ गए हैं। होरी का लड़का गोबर अब कनेडा चला गया है। रामधन के लड़के की दोस्ती अंग्रेजों के लड़कों से हो चुकी है। वह अपने लिए नया भारत बनाना चाहते हैं। और बिल बनाने वाले हैं कि पुराने भारत और पुराने भारतीयों को ही झाडपोंछ कर महान बनाने पर तुले हुए हैं। बाकी के बचे आधे भारत मे किसान इन सब बातों से अंजान गेहूं की रोपाई कर रहा है। बच्चे की फीस भरने के लिए सरकारी सहायता की किश्त का इंतजार कर रहा है।

लेख में दिए विचार लेखक के है एनसीआर खबर का उससे सहमत होना आवश्यक नहीं है

NCRKhabar Mobile Desk

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