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साई बाबा एक मुस्लिम फकीर, उनके नाम पर हो रहे पूजा-पाठ और आरती हवन को तुरंत रोक देना चाहिए: धीरज फूलमती सिंह

साई बाबा एक मुस्लिम फकीर!

यह बात कोई आठ साल पुरानी है। द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अचानक से हिदुत्व के शांत सरोवर में साई बाबा नाम का एक कंकड फेंक दिया था,इस वजह से सरोवर में हलचल पैदा हो गई थी। अब वह पोखर अशांत हो गया था।


उन्होने बाकायदा सार्वजनिक बयान दिया था कि “शिर्डी के साई बाबा मुस्लिम फकीर थे,उनका हिदुत्व से कोई लेना देना नही है। उनकी पूजा-पाठ और आरती बंद होने चाहिए। ” उन दिनों शुरुआत में यह बयान द्वेष भावना से ओतप्रोत लगा,हिदू समाज ने ही इस बात का घोर विरोध किया। यह बडे अचरज की बात थी कि साई बाबा के समर्थन में हिदूओ ने अपने धर्म के सर्वोच्च पद शंकराचार्य के खिलाफ लामबंद हो गये।

शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी के खिलाफ कार्रवाई करते हुए साई बाबा ट्रस्ट ने मानहानि का मुकदमा लेकर अदालत की शरण में गया। शंकराचार्य के खिलाफ मिडिया में गलत बयानी होने लगी,इस जगह कोई साधारण जीव होता तो वह कब का हथियार डाल चूका होता लेकिन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की हिम्मत और जीवटता को दाद देनी पडेगी कि आम माहौल उनके विरुद्ध होने के बावजूद भी वे अपनी बात और बयान पर अडिग रहे,टस से मस नही हुए। कभी हार ना मानी।


शंकराचार्य की इतने दिनों की मशक्कत के बाद कई अखबारों में छपी खबर और कुछ गुगल लिंक के मुताबिक आज यह साबित हो गया है कि साई बाबा एक मुस्लिम फकीर थे जो अफगानिस्तान से भारत में आकर बस गये थे। यह बात जैसे ही साबित हुई है तो शिर्डी साई बाबा ट्रस्ट के पदाधिकारियों को सार्वजनिक रूप से माफ़ी मागने को मजबूर होना पडा है। मुंबई साईधाम चैरिटेबल ट्रस्ट के प्रमुख रमेश जोशी ने द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के उपर सर्वोच्च न्यायालय में केस दायर किया था। साई बाबा से संबंधित सबूत सार्वजनिक होने के बाद आज उनको प्रेस कांफ्रेंस करके माफी मांगने की जरूरत और मजबूरी दोनो ही आन पडी है। अन्यथा झूठ और मनगढंत कहानी के फेर में उनको ही मुक़दमे और सजा का सामना करना पडता।


मेरा व्यक्तिगत तौर पर साई बाबा से कोई द्वेष नही है,ना कोई विरोध है लेकिन मैं इस बात के जरूर खिलाफ हूँ कि उन्हे हिंदू संत प्रचारित किया जाता है। ऐसा भी नही है कि मैं शिर्डी के साई बाबा के दर्शन करने कभी उनके मंदिर नही गया! मैं तो कई दफा गया हूँ,रात-रात भर बाकायदा कार चला कर वहाँ गया हूँ लेकिन तब शायद मैं भी आम हिदूओं की तरह नादान था,नासमझ था। सच्चाई से वाकिफ नही था,अंजान था।


साई बाबा से मेरा कोई निजी बैर नही है,वे भारत के सम्मानित बुजूर्ग है,उनका आदर करना मेरा संस्कार है,हम आम भारतीय अपने बुजुर्गवार का दिल से सम्मान करते है,वैसे ही अब भी मैं साई बाबा का सम्मान करता हूँ,उसमें कोई हर्ज नही है लेकिन उनको भगवान मानने से मेरा इनकार है।


मेरा विरोध इस बात से है कि एक मुस्लिम फकीर का मंदिर कैसे हो सकता है ? एक मुस्लिम फकीर की समाधी कैसे हो सकती है ? मुस्लिम फकीर की तो मजार होती है,क्योंकि मुस्लिम फकीरों को तो कब्र में दफनाया जाता है ? जहाँ एक मुस्लिम पीर-फकीर की कब्र होती है,वह तो या एक मजार हो सकती है या फिर एक दरगाह तो फिर साई बाबा मंदिर क्यों अस्तित्व में है ? मैं ऐसा इस लिए कह रहा हूँ कि ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नही हे कि साई बाबा ने हिदुं धर्म को अपनाया था या हिदुत्व की दीक्षा ली थी,या फिर हिदु साधू ही वे बने थे या ऐसा भी कही जिक्र नही मिलता है कि उन्होने अपने मुसलमान होने का त्याग या इस्लाम धर्म का परित्याग किया था। इस का सीधा मतलब होता है कि वे आजन्म मुस्लिम ही बने रहे।


जब वे आजन्म एक मुसलमान ही रहे तो हिदू मंदिरो में उनकी मूर्ति क्यों कर स्थापित होती है? उसकी प्राण प्रतिष्ठा का क्या मतलब है ? उनके नाम के साथ साई राम या साई श्याम कहने और जोडने का क्या तूक है ? क्या यह सब पैसे कमाने के लिए किया जा रहा है ? क्योंकि मैंने ऐसा सुना है कि भारत के अन्य साई मंदिरो को अपने प्राप्त दान का कुछ अंश शिर्डी के मूल साई बाबा मंदिर को देना पडता है। इस बात में कितनी सच्चाई है,मैं नही जानता।

साई सच्चरित्र साई भक्तो और शिर्डी साई संस्थान द्वारा बताई गई साई बाबा के बारे में सबसे उचित पुस्तक है। इस किताब के अनुसार साई बाबा ने एक बार जिक्र किया था कि वे मुसलमान है। और तो और पुस्तक के पेज नंबर 17,28,29,40,58, 78,120,150,174 और 183 पर ऐसा उल्लेख मिलता है कि वे हमेशा “अल्लाह मालिक” बोला करते थे। इस पुस्तक के अनुसार साई बाबा ने कभी भी किसी हिदू देवी और देवताओ का नाम नही लिया है और ना ही कभी भी “सब का मालिक एक बोला है।” जब कि ऐसा आम तौर पर प्रचारित किया जाता है कि “सब का मालिक एक है।” ऐसा बोलते थे…खैर यह सब अभी विवादित विषय है।


साई बाबा जिसमे रहते थे,वह एक मस्जिद थी,वे किसी मंदिर में निवास क्यों नही किये ? यह कैसे संभव है कि एक मुस्लिम फकीर मस्जिद में रहकर नमाज न अदा करता हो या अल्लाह के आगे सजदा ना करता हो ? क्या वे”सब का मालिक एक” ऐसा कह कर वे इस्लाम धर्म के एकेश्वरवाद का प्रचार करते थे ? हिदुत्व में भी एकेश्वरवाद है लेकिन सामान्य हिदुत्व इस पर कम ही विश्वास करता है। चलो मान लेते है कि वे इस्लाम धर्म का प्रचार-प्रसार नहीं करते थे लेकिन वे थे तो एक मुस्लिम फकीर ? क्यों कि उन्होने हिदुत्व में अपना धर्मांतरण नही किया था तो फिर कम से कम एक धर्म को तो मानते थे ? अगर ऐसा नही है तो क्या वे किसी धर्म को नही मानते थे,मतलब क्या वे नास्तिक थे ? अगर वे नास्तिक थे तो उनके नाम के साथ बाबा या हिदूओ के भगवानों का नाम क्यों जोडा गया ? उनके नाम पर मंदिर क्यो । एक नास्तिक के अनुयायी धार्मिक क्यों है ? बस ऐसे ही कई सवाल मेरे मन में पैदा हो रहे है।


क्या यह संभव है कि साई बाबा के बहाने हिदुत्व की मूल संरचना को धीरे-धीरे प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है ? हिदुत्व की जड को कमजोर कर इस विशाल पेड को गिराने की किसी छुपी योजना पर अमल किया जा रहा है। जब यह साबित हो गया है कि साई बाबा एक मुस्लिम फकीर है तो उनके नाम पर हो रहे पूजा-पाठ और आरती हवन को तुरंत रोक देना चाहिए। मानता हूँ कि पहले एक हिदू इस सच्चाई से अनभिज्ञ था लेकिन अब तो सच्चाई सबके सामने आ गई है तो फिर उसी ढर्रे पर चलने का क्या तूक है ? अब तो राह और नियम बदले जा सकते है।


मुझे तो इस बात को सोच कर ही आश्चर्य होता है कि साई बाबा एक मुस्लिम फकीर है,ऐसा दशकों से भारतीय जनमानस को शंका थी तो फिर उनके नाम से मंदिर क्यों बनाये गए? सिर्फ मूर्ति छोडिए, उस मंदिर में हिदूओ के भगवानों से भी ज्यादा बडी और भव्य मुर्तियां साई बाबा की स्थापित है। हिदु धर्म को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती का शुक्र गुजार होना चाहिए कि समय रहते उन्होने आम सनातनियो को चेता दिया। अभी भी बहुत कुछ बिगाड नही हुआ है। समय रहते सबको संभल जाना चाहिए। सावधान हो जाना चाहिए। भारत में बुजुर्गवार का सम्मान होना चाहिए,यही हमारी संस्कृति है लेकिन पूजा-पाठ और आरती तो सिर्फ भगवान की ही होनी चाहिए।

धीरज फूलमती सिंह

लेख में दिए विचारो से एनसीआर खबर का सहमत होना आवश्यक नही है

NCRKhabar Mobile Desk

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