नोएडा प्राधिकरण में चर्चित मुआवज़ा घोटाले की विस्तृत जानकारी : जानिए कैसे 117 करोड़ रुपये के मामले में CEO स्तर तक पहुँची जांच

आशु भटनागर
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आशु भटनागर । नोएडा में 20 किसानों को 117 करोड़ रुपये का अतिरिक्त मुआवज़ा देने के मामले ने एक बार फिर प्रशासनिक भ्रष्टाचार की परतें खोल दी हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में गंभीरता से जांच का आदेश दिया गया है, जिसमें पिछले 15 वर्षों में तटस्थता से तैनात सभी मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (CEO) की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। इस संदर्भ में, अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारियों (ACEO) और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ भी जांच की संभावना बढ़ गई है, जिससे मामला और भी पेचीदा बन रहा है। आइए जानते हैं आखिर क्या है नोएडा प्राधिकरण का मुआवजा घोटाला, सुप्रीम कोर्ट ने क्या कुछ आदेश दिए

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प्रमुख CEOs (2010-2025):

  •  रमा रमण (Rama Raman): 2010 के आस-पास नोएडा प्राधिकरण के CEO बने।
  • संजीव स (Sanjeev Saran): 2013 में नोएडा प्राधिकरण के CEO बने।
  • मोनिंदर सिंह (Moninder Singh ) 2014 में नोएडा प्राधिकरण के सीईओ बने।
  • मोनिका सहगल गर्ग (Monica Sehgal Garg): इन्हें नोएडा प्राधिकरण के CEO का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था।
  • रमा रमण (Rama Raman): 2015 के आस-पास नोएडा प्राधिकरण के CEO बने।
  • पी के अग्रवाल (PK Rama Raman): 26 अगस्त 2016 को नोएडा प्राधिकरण के CEO बने।
  • दीपक अग्रवाल (Deepak Agarwal): 20 दिसम्बर 2016 को नोएडा प्राधिकरण के CEO बने।
  • पंकज कुमार (Pankaj Kumar): 2017 के शुरुआती महीनों में प्रमुखता से थे और प्राधिकरण के विकास कार्यों में सक्रिय थे।
  • अमित मोहन प्रसाद (Amit Mohan Prasad): पंकज कुमार के बाद सीईओ बने और 2017 के मध्य तक रहे।
  • अभिषेक प्रकाश (Abhishek Prakash): अमित मोहन प्रसाद के बाद आए और 2017 के अंत तक रहे।
  • मनोज कुमार सिंह (Manoj Kumar Singh): 2017 के अंत और 2018 की शुरुआत में अध्यक्ष के साथ सीईओ का अतिरिक्त कार्यभार संभाला।
  • रितु माहेश्वरी (Ritu Maheshwari): 2019 के आस-पास नोएडा के CEO बनी।
  • डॉ. लोकेश एम (Dr. Lokesh M): जुलाई 2023 में इन्होंने CEO का कार्यभार संभाला और वर्तमान में (2025 तक) कार्यरत हैं।

क्या है मुआवजा घोटाला?

अदालत के समक्ष लाए गए मामले में कानूनी अधिकारी दिनेश कुमार सिंह और सहायक कानूनी अधिकारी वीरेंद्र सिंह नागर शामिल थे, जिन्होंने भूमि अधिग्रहण मामले में गलत तरीके से 7.28 करोड़ रुपये का मुआवजा मंजूर किया था। फिर जब जांच पड़ताल की गई तो सामने आया कि किस तरह मुआवजा घोटाला किया गया।

नोएडा में वर्ष 1982 में जमीन अधिग्रहण की एक बड़ी प्रक्रिया हुई थी। जमीन मालिक को उसकी 10-15 बीघा जमीन के लिए शुरुआती मुआवजा 10.12 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से दिया गया। इस बात से जमीन मालिक खुश नहीं था। उसने 1993 में गाजियाबाद की जिला अदालत का दरवाजा खटखटाया।अदालत ने दर बढ़ाकर 16.61 रुपये प्रति वर्ग गज भुगतान करने का आदेश दिया. इस आदेश के अनुसार मालिक को भुगतान कर दिया गया।

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साल 2015 में, जमीन मालिक की कानूनी वारिस रामवती ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में फिर से मुआवजे का दावा दायर किया। मगर, इस बार अदालत ने उनकी याचिका खारिज कर दी। उसी वर्ष नोएडा प्राधिकरण ने भूमि मालिकों के लंबित दावों का निपटारा करने के लिए एक नई नीति बनाई और दर 297 रुपये प्रति वर्ग गज तय कर दी। इसी नीति का दुरुपयोग करते हुए, नोएडा ऑथोरिटी के दो अधिकारियों (कानूनी अधिकारी दिनेश कुमार सिंह और सहायक कानूनी अधिकारी वीरेंद्र सिंह नागर) ने कथित तौर पर रामवती के खारिज दावे को लंबित दिखाकर 7.28 करोड़ रुपये की राशि जारी करवा ली। बस यहीं से मुआवजा घोटाला शुरू हुआ ।

जांच में सामने आए तथ्य

जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि नोएडा प्राधिकरण ने 1,198 मामलों में बढ़ा हुआ मुआवजा दिया, जिसके विपरीत कोर्ट ने केवल 1,167 मामलों में ऐसा आदेश दिया था। इसके अलावा, यह भी पता चला कि कुल 20 ऐसे मामलों में अधिकारियों ने गैरकानूनी तरीके से ज्यादा मुआवजा वितरित किया। समिति ने यह भी संकेत दिया कि यह मामला केवल एक उचित प्रक्रिया की गलती नहीं, बल्कि अधिकारियों और लाभार्थियों के बीच की सांठगांठ का नतीजा हो सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप

मामले के गंभीर होते ही सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त को उत्तर प्रदेश के डीजीपी को निर्देश दिया कि वे एक तीन सदस्यीय विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन करें। इस एसआईटी को यह अधिकार दिया गया कि यदि प्रारंभिक जांच में घोटाले के प्रमाण मिलते हैं, तो वे एफआईआर दर्ज कर कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कुछ कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसंबर को को एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए नोएडा प्राधिकरण में चल रही जांच की धीमी गति पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि विशेष जांच दल (SIT) को पहले ही पर्याप्त समय दिया जा चुका है, और अब मामले को तेज़ी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। कोर्ट ने SIT को दो महीने का अतिरिक्त समय देते हुए खेद जताया कि जांच में तेजी लाने की कोई स्पष्ट योजना नहीं दिखाई दे रही है।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को सूचित किया कि नोएडा प्राधिकरण की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय की आवश्यकता है। अदालत ने इस निवेदन को स्वीकार किया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि जांच निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ बिना किसी दबाव के होना चाहिए।

इस सुनवाई में किसानों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे ने भी अपनी चिंताओं को व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि अदालत के पहले आदेश में किसानों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया था, जबकि नवीनतम आदेश में इस सुरक्षा का उल्लेख गायब था। इस पर CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि किसानों को मिलने वाली सुरक्षा में कोई बदलाव नहीं होगा और उन्हें किसी भी प्रकार की जबरदस्ती का सामना नहीं करना पड़ेगा।

जांच की स्वतंत्रता और लक्ष्य

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि SIT को जांच में पूर्ण स्वतंत्रता दी जाएगी, जिससे वह अधिकारियों की भूमिका, संपत्तियों, बैंक खातों और फैसलों की जांच कर सके। यह मामला केवल मुआवजे की बढ़ोतरी का नहीं है, बल्कि इसमें गहरी संस्थागत खामियों की पहचान करने का भी कार्य है। पहले से यह संज्ञान लिया जा चुका है कि जमीन अधिग्रहण और मुआवजा प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियाँ देखने को मिली थीं, जो सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करती हैं।

कोर्ट ने SIT को निर्देश दिया कि नोएडा प्राधिकरण के सभी अधिकारियों और कानूनी अधिकारियों की संपत्तियों की जांच की जाए, और यदि आवश्यक हो तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए राज्य सरकार से अनुमति मांगी जाए।

प्रशासनिक सुधार की आवश्यकता

घोटाले की प्रवृति और प्रशासनिक खामियों को ध्यान में रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने केवल जांच तक सीमित रह कर नहीं, बल्कि प्रशासनिक सुधारों के भी निर्देश दिए हैं।

  1. नोएडा अथॉरिटी को महानगर निगम की तरह पुनर्गठित किया जाए.
  2. अथॉरिटी में एक मुख्य सतर्कता अधिकारी (CVO) की नियुक्ति अनिवार्य की गई.
  3. नोएडा की जनता की शिकायतों को प्रभावी रूप से सुनने के लिए सिटीजन एडवाइजरी बोर्ड (CAB) बनाने का आदेश दिया गया.
  4. सभी निर्माण परियोजनाओं को आगे बढ़ाने से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और सुप्रीम कोर्ट की ग्रीन बेंच से अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया.

अदालत ने यह भी कहा कि सभी निर्माण परियोजनाओं को आगे बढ़ाने से पहले पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) और सुप्रीम कोर्ट की ग्रीन बेंच की अनुमति लेना अनिवार्य होगा। ये सभी सुधार इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, जिससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि आमजन के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित होगी।

आगे क्या होगा?

SIT को दो महीने के भीतर पूरी जांच कर रिपोर्ट पेश करनी है। अगर मिलीभगत का प्रमाण मिलता है, तो बड़े स्तर पर गिरफ्तारी और कार्रवाई संभव है। यह मामला नोएडा अथॉरिटी के अंदर कई सालों से चली आ रही लापरवाही और भ्रष्टाचार की गहरी परतों को उजागर करता है।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे