यमुना प्राधिकरण ने पिछले एक दशक में लगभग 3000 औद्योगिक प्लॉट आवंटित किए, लेकिन इनमें से 15 पर ही उधोग लगाये गये पर बाकी पर आज तक निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ। प्राधिकरण और निवेशकों दोनों की त्रुटियों का हवाला देते हुए अधिकारी यह मानते रहे हैं कि विवादित अधिग्रहण और किसानों के आंदोलन ने औद्योगिक विकास को बाधित किया है।
पिछले दस वर्षों में आवंटित इन प्लॉटों में से कई पर GPS डेटा के अनुसार न तो औद्योगिक गतिविधि दिखाई देती है और न ही तयशुदा समय में काम शुरू हुआ। प्राधिकरण ने यह भी स्वीकार किया है कि जमीन अधिग्रहण के दौरान किसानों के साथ विवाद के चलते कई अवसरों पर औद्योगिक इकाइयों की नींव रखने से पहले ही हाईकोर्ट में प्रकरण दायर हो गए या किसान आंदोलित हो उठे।
इन परिस्थितियों में औद्योगिक निवेशकों ने प्लॉट हासिल करते हुए निर्माण के लिए निर्णायक कदम उठाने में हिचक महसूस की। जवाबी कार्रवाई में प्राधिकरण ने समय-समय पर निवेशकों को औद्योगिक गतिविधि आरंभ करने के लिए प्रोत्साहित करते हुए फोन, ईमेल और नोटिस जारी किए। फिर भी कई प्लॉट पर कोई कार्य शुरू न होने पर 21 नवंबर को उन 366 उद्योगपतियों की सूची प्रकाशित की गई, जिन्होंने 60 दिनों के अंदर जवाब नहीं दिया था। इन सभी को 10 दिन अतिरिक्त का अल्टीमेटम दिया गया।
21 नवंबर को प्राधिकरण ने उन 366 उद्योगपतियों की सूची जारी की, जिन्होंने 60 दिनों के अंदर किसी भी तरह का जवाब नहीं दिया। इन सभी को अतिरिक्त 10 दिन की मोहलत दी गई। इसके बाद की स्थिति निम्नलिखित है:
• 76 उद्योगपतियों ने लीज दस्तावेज सबमिट कर दिए।
• 58 ने शीघ्र दस्तावेज प्रदान करने का आश्वासन दिया।
• 45 ऐसे प्लॉट जिन पर अभी भी किसानों के साथ विवाद चल रहे हैं; इन पर अस्थायी राहत दी गई है।
• 130 ऐसे प्लॉट हैं जिनके मालिकों ने अबतक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
ताजा अपडेट के मुताबिक, अब तक 76 निवेशकों ने लीज दस्तावेज जमा कर दिए हैं, जबकि 58 ने जल्द ही दस्तावेज सौंपने का आश्वासन दिया है। वहीं, 45 ऐसे प्लॉट अभी विवादरत हैं, जिन पर किसानों के विरोध या अदालत के केस के चलते उन्हें राहत दी जा रही है। लेकिन 130 उद्योगपतियों ने न तो दस्तावेज जमा किए और न ही कोई प्रतिक्रिया दी। प्राधिकरण सूत्रों का कहना है कि इन 130 प्लॉटों के आवंटन को रद्द करने की औपचारिक प्रक्रिया शीघ्र शुरू कर दी जाएगी।

अधिग्रहण में देरी व किसानों के विरोध ने उनके प्लान्स पर गहरा असर डाला। नियोजन व पारदर्शिता की कमियां इसे बाधित कर रही हैं। जब तक जमीन की स्वामित्व स्थिति स्पष्ट नहीं होती थी, हमने निवेश के जोखिम से बचने को ही बेहतर समझा था
उद्योगपति
प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न उजागर करने की शर्त पर बताया, “हम विकास को गति देना चाहते हैं, लेकिन नियमों और शर्तों का पालन भी आवश्यक है। विवादित मामलों में जहां किसानों का हक्क सुरक्षित करना है, वहीं गैर-जिम्मेदार निवेशकों के लिए कार्रवाई अनिवार्य है।’’
विश्लेषकों के अनुसार, यमुना प्राधिकरण की यह कवायद दोनों पक्षों—किसान और उद्योगों—के संतुलन की दृष्टि से अहम है। निवेशकों को स्पष्ट समयसीमा दी गई है, वहीं विवादित मामलों में कानूनी पेंच सुलझने के बाद ही आगे बढ़ना संभव होगा। आने वाले दिनों में रद्द किए गए प्लॉटों का पुनर्वितरण या सार्वजनिक नीलामी के माध्यम से नए आवंटन की योजना बन सकती है।


