पानी, प्रदूषण और प्राधिकरण इन दिनों बेहद चर्चा में है। इंदौर में दूषित पानी कांड के बाद तो पूरे दिल्ली एनसीआर में प्राधिकरणों नगर निगमो पर लगातार प्रश्न उठाए भी जा रहे हैं।
नोएडा में भी इतने सबके बावजूद समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। मामला चाहे सड़कों के निर्माण का हो पानी की सप्लाई का हो, पार्कों के रखरखाव कहो या फिर सड़कों की साफ सफाई का हो, सभी जगह अधूरापन स्पष्ट दिखाई देता है । तमाम जगह ठेकेदार बस बांड बनाने के चक्कर में लगे हैं। काम की प्रामाणिकता और क्वालिटी दोनों ही शून्य है यहां तक कि लंबे इंतजार के बाद ट्रायल के खोले गया उत्तर प्रदेश ब्रिज कॉरपोरेशन द्वारा बनाए गया एलिवेटेड रोड भी अक्षमताओं से भरा है । पूरे शहर में सड़कों की रिसर्फेसिंग के बाद उनके निर्माण की क्वालिटी पर लगातार प्रश्न उठते है। शहर की सड़क गए वाकई आम जनता के लिए उस स्तर की नहीं है जिसके लिए नोएडा जाना जाता था।
बीते छह माह से नोएडा प्राधिकरण में भ्रष्टाचार पर लगाम कसने में लगे नोएडा प्राधिकरण के सीईओ डॉ लोकेश एम के प्रयास रंग ला रहे हैं । नोएडा में भी तो 6 माह से सभी प्रकार के टेंडर्स पर रोक लगी है जो नव वर्ष में मेंटेनेंस कार्यों के लिए अब खोली गई है इसके साथ ही नए वर्ष में अब तक सीईओ ने चार अक्षम और भ्रष्टाचारी अधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है प्राधिकरण में लगातार कर्मचारियों को दिखावे की जगह परिणाम के लिए निर्देशित किया जा रहा है।
पर प्राधिकरण और उसके अधिकारियों पर चर्चाओं के बावजूद क्या सिर्फ प्राधिकरण ही शहर की गंदगी के लिए दोषी है? क्या नोएडा शहर में आकर बसे और क्रांति कर रहे लोगों से यह प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए इस शहर में गंदगी को अवस्थित तरीके से फैलने वाले लोग कौन है क्या वह दिल्ली से आकर यहां गंदगी करते हैं या फिर वो यही के सामान्यजन हैं।

प्रतिदिन समस्याओं को लेकर सोशल मीडिया पर फोटो डालने वालों के बीच 7x का एक फोटो एनसीआर खबर को ऐसा भी मिला जिसमें क्रांतिकारियों ने प्रश्न भले ही कुछ और उठाया किंतु उसके साथ ही उन्होंने यह भी दिखाया कि इन्हीं सोसाइटी में रहने वाले लोग अपने घरों के बचे हुए खानों को ग्रीन बेल्ट और खुले मैदानो पर फेंक कर चले जा रहे हैं जो उनके द्वारा डाले गए फोटो में ही स्पष्ट दिख रहे हैं ।
और यह स्थिति कमोबेश पूरे शहर में है एक-एक करोड़ के फ्लैट में रहने वाले बड़ी-बड़ी आईटी कंपनियों से लेकर फाइनेंशियल कंपनियों में काम करने वाले लोग जब अपने घर के बच्चे कूड़े को सड़कों पर ऐसे ही फैक जाए तो उस पर भी प्रश्न उठाने आवश्यक है। प्रदूषण सिर्फ धूल से नहीं फैल रहा है, प्रदूषण प्लास्टिक की पन्नियों में लिप्त इन कूड़ो से भी फैल रहा है जो लगातार बढ़ते जाते हैं और बाद में प्राधिकरण के नाम पर लिख दिए जाते हैं ।
एक अन्य उदाहरण को माने तो ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के जल विभाग का दावा है कि उनके यहां पानी की सप्लाई सही है। पानी का टीडीएस भी कंट्रोल किया गया है उसमें गंगाजल में लाया जा रहा है किंतु सोसाइटियों में लोगों के घरों में अभी भी 500, 1000 और 2000 टीडीएस का पानी स्वयं लोगों ने वीडियो बनाकर दिखाएं हैं प्राधिकरण के अधिकारी इस पर कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं। एनसीआर खबर को सूत्रों से यह भी पता लगा की नोएडा की कमोबेश सभी सोसाइटियों में पानी के यूं जीआर और एसटीपी दोनों ही क्षमताओं से कम बनाए गए है ।ऐसे में इन हाई रिस्क सोसाइटी में अक्सर पानी के पीने की समस्याएं होती हैं जिससे बचने के लिए समाधान के लिए सोसाइटियों के बिल्डर और AOA ने भूजल दोहन के लिए मोटर लगा दिया और प्राधिकरण द्वारा दिए गए पानी के साथ मिलकर सोसाइटी में सप्लाई कर दिया जाता है । इसके बदले में प्राधिकरण के ही अधिकारियों को मोटी मंथली भी दी जाती है ऐसे में प्राधिकरण के साफ पानी के बावजूद आम लोगों तक वापस वही पानी पहुंचता है और सोशल मीडिया पर सवाल चलते रहते हैं ।
इससे नोएडा में संस्थाओं पर्यावरण और सामाजिक संस्थाओं के नाम पर बन गए प्रेशर ग्रुप या फिर यूं कहें ब्लैकमेलर की चांदी हो जाती है, सोशल मीडिया पर शोर मचाना आसान हो जाता है ।
किंतु अगर नोएडा के निवासियों को नोएडा स्वच्छ रखना है स्वच्छ हवा में सांस लेना है या स्वच्छ पानी की अपेक्षा करनी है तो प्राधिकरण के अधिकारियों पर सख्ती के साथ-साथ अपने जीवन में भी परिवर्तन लाना आवश्यक है। एक स्वच्छ शहर सिर्फ चांद अधिकारियों के सहारे नहीं बन सकता है अगर जन सामान्य की भागीदारी उसमें ना हो। ऐसे में लगातार सोशल मीडिया पर प्रेशर ग्रुप बनाकर काम करने वाले पर्यावरण समाज सेवियों और सामाजिक संस्थाओं को यह तय करना पड़ेगा कि क्या वह सिर्फ सवाल उठाने के लिए हैं या फिर जन सामान्य में जागृति और उनके द्वारा की जा रही गंदगी को रोकने के लिए कोई स्पष्ट कार्यक्रम बनाने की भी पहल करने की कोशिश करेंगे क्योंकि बदलाव अपने घर से आरंभ होगा और उसे हमें स्वयं भी करना होगा।


