NCRKhabar Exclusive : नोएडा, ग्रेटर नोएडा, और यमुना प्राधिकरणों में 40% कम कीमत के खेल से निर्माण और मेंटिनेंस की गुणवत्ता पर नेताओ की शह पर भारी पड़ गए ठेकदार सचिन टिचकुले!

आशु भटनागर
8 Min Read

आशु भटनागर । नोएडा हो या ग्रेटर नोएडा या फिर यमुना प्राधिकरण तीनों ही प्राधिकरण में इन दिनों सड़कों से लेकर पानी की क्वालिटी तक, सफाई से लेकर प्रदूषण को लेकर प्राधिकरणों पर सवाल उठ रहे हैं। प्राधिकरण सही काम करने में कैसे बेबस है इस पर चर्चा करें, उससे पहले इन प्राधिकरण में ठेकेदारों की महिमा पर चर्चा करना आवश्यक है ।

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2004 की फिल्म “खट्टा मीठा”, जो मुंबई महानगरपालिका (BMC) में ठेकेदारी और भ्रष्टाचार के राज को प्रकाश में लाई थी। फिल्म के मुख्य चरित्र, ठेकेदार सचिन टिचकुले ने टेंडर बजटों के महिमा और अधिकारियों के मन में छेड़कर, पास-कराने लगे बिलों की “मैनेजमेंट आर्ट” से सिस्टम के अंदर का सच दिखाया बनाया। आज, वही सच यूपी के नोएडा, ग्रेटर नोएडा, और यमुना प्राधिकरणों में नए रूप में साबित हो रहा है। गौतम बुद्ध नगर जिले के में भ्रष्टाचार के बरगद के पेड़ के समान जड़ों के साथ नेताओ की जटाओ से बहती गंगा की तरह चल रही है और इसीलिए तीनों प्राधिकरणों  में सड़क से लेकर पानी तक पर हाहाकार मचा है।

ठेकेदारी के “वर्तमान संस्करण”: 40% तक कम टेंडर का खेल

आज सचिन टिचकुले का नाम निकाले बिना नोएडा के ठेकेदारी घोटाले की चर्चा अधूरी रह जाती है। पहले ठेकेदारी के सौदे में सामग्री का गुणवत्ता पर पास बिल के लिए अधिकारियों तक पहुंच, पैसे की नोक-जोर चलती थी। आजकल, विमोचन सौदों में 40% कम कीमत पर रजिस्टर हो जाते हैं। ऐसे ठेकेदारों के सामग्री की गुणवत्ता उपेक्षा कर दी जाती है, और निर्माण या मेंटिनेंस कार्य में विकृति देखी जाने लगी है। प्राधिकरणों के अधिकारियों का कहना है कि इस “उल्टा-पुल्टा” प्रणाली में पहले टेंडर कम कीमत पर जीते जाते हैं, बाद में बिल पास कराने की जिम्मेदारी के पीछे “नेता सिफारिश” हावी रहती है।

40% कैसे खेल को समायोजित करने के पीछे ऐसा करने वाले ठेकेदारों के तर्क हैं कि वह जीएसटी में गुणा भाग करके बचा लेते हैं जबकि इस पूरे खेल का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि ठेकेदारी में कल टेंडर में 15% तक की लाभांश होता है ऐसे में यदि कोई ठेकेदार 5 या 10% तक कम करता है तो वह अपना लाभ कम करता है किंतु 40% तक कम जाकर टेंडर डालने का मतलब है कि निश्चित तौर पर कार्य की गुणवत्ता में कमी होगी और भ्रष्टाचार की अधिकता होगी।

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राजनीतिक दलों के नेताओ की संलिप्तता इसलिए कहीं कोई विरोध नहीं, कोई आंदोलन नहीं

सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ अक्सर स्थानीय नेताओं की एक बड़ी फौज हमेशा तैयार रहती है यह नेता कदम कदम सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार पर आवाज उठाते हैं । किंतु इन प्राधिकरणों में वर्तमान स्थिति में, किसी नेता के बगैर कोई प्रयास टेंडर हासिल करने के बारे में करना लगभग असंभव है। इन नेताओं की सिफारिशों के जरिए ही ठेके निकल रहे हैं और कहा जाता है कि इसमें बीजेपी ही नहीं विपक्ष यानी सपा, बसपा, कांग्रेस तक के नेता शामिल हैं आप इन नेताओं को समय समय पर प्राधिकरणों में बैठे या घूमते देख सकते हैं । यहां तक कि कोई अधिकारी यदि कहीं अपनी “ईमानदारी” के चलते अगर न भी करना चाहे तो ऐसे “नेता के आदेश” से असमर्थ हो जाता है। इन नेताओं की विशिष्ट प्रचलित “ऊपर से नीचे” या ” विपक्ष के आन्दोलन की धमकी” के चलते, अधिकारी बिना बेहतरी के कामों का स्वीकृति दे रहे हैं और इसी खेल के चलते नेताओ में यहाँ चुनाव लड़ने और सोशल मीडिया पर अपने अपने नेताओ से करीबी दिखने की होड़ लगी रहती हैं । मुद्दा स्पस्ट है सरकार बने ना बने पर दबदबे का खेल टेंडर में चलना चाहिए।

दलाली के ठेकेदार: छोटे ठेकेदारों की दयनीय स्थिति

इस पूरे खेल में सबसे बुरा प्रभाव किस पर पड़ रहा है? सच यह है कि जनता को कम गुणवत्ता के कार्य को बर्दाश्त करना पड़ता है जिसके कारण सड़क हमेशा टूटी रहती हैं, स्वच्छता दिखाई नहीं देती और निर्माण लंबित होता जाता है । उसके बाद नंबर आता है उन छोटे ठेकेदार का, जो ईमानदारी से काम करना चाहते हैं, ४० प्रतिशत कम वाले खेल के चलते काम न ले पाने को मजबूर हैं और टेंडर प्राप्त करने के लिए लड़ रहे हैं। अधिकारियों ने भी इस प्रणाली के प्रति आक्रोश व्यक्त किया है, क्योंकि इससे कार्यों की गुणवत्ता नीचे जा रही है। हालत यह कि एक राजनीतिक नेता ने कहा था, “जब बलात्कार मजबूरी हो जाए, तो उसका आनंद ले लो।” नेताओं के प्रभाव या दबाव से यह बात आज कई अधिकारियों ने गांठ बांध ली है।

प्रश्न ये है कि आगे क्या?

प्राधिकरण में नेताओं के बढ़ते हस्तक्षेप से तंग आकर हालात ऐसे हुए की नोएडा प्राधिकरण के सीईओ डॉ लोकेश एम ने बिना उनकी अनुमति के तो 6 माह पूर्व किसी भी तरीके के टेंडर्स पर रोक लगा दी थी, जिसको अब सीमित मानको के साथ मेंटेनेंस कार्यों के लिए खोला गया है । रोचक तथ्य यह था कि 6 माह तक टेंडर ना होने के बावजूद नोएडा प्राधिकरण के कार्यों पर कोई फर्क नहीं पड़ा। प्राधिकरण के अधिकारी नेताओं और ठेकेदारों के गठजोड़ ने व्यवस्था को इस आशा में बनाए रखा की कभी ना कभी तो यह फिर शुरू होगा ।

वहीं ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में भी इस कॉकटेल के विरुद्ध छोटे ठेकेदारों ने बगावत के सुर बुलंद किए हैं और उसकी शिकायत विभिन्न स्तरों पर करने शुरूआत की है । कहाँ जा रहा है कि आने वाले दिनों में कोई स्क्रुतिनिंग की कार्यवाही हो सकती है। कहा जा रहा है कि यमुना प्राधिकरण में अभी भी नेताओ की शह पर यह खेल बेखौफ जारी है। कहा जाता है कि वर्तमान सीईओ सेवानिवृती के बाद मिले पुनर्नियुक्ति के अपने बचे 9 महीने के कार्यकाल को पूर्ण करने में आनंद ले रहे हैं ।

ऐसे में बड़ा प्रश्न यही है कि प्राधिकरणों की नाक के नीचे हो रहे इस भ्रष्टाचार पर औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल नंदी  से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक का एक्शन क्या होगा ? क्या वह वाकई नेताओं की हो रही इन कारगुजारियों को नहीं जानते हैं या फिर चूंकि हमाम में सब नंगे हैं इसलिए इस खेल पर रोक लगाने की कोई आवश्यकता नहीं है ।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे