आशु भटनागर । 50 वर्ष के युवा नगर नोएडा में लगभग 40 वर्ष पुरानी व्यापारियों की कथित तौर पर सबसे बड़ी संस्था नोएडा एंटरप्रिनियोर्स एसोसिएशन या एन ई ए के प्रत्येक 2 वर्ष में होने वाले चुनावों का शंखनाद नए साल के आरंभ के साथ ही हो गया। चुनाव की घोषणा के साथ ही बीते 14 वर्षों से अध्यक्ष की कुर्सी पर विराजमान विपिन मल्लन अपने पैनल के 165 सदस्यों के साथ एक बार फिर से मैदान में आ गए । चुनावी औपचारिकताओं के दौर में बाकायदा एक चुनाव कार्यालय खोलने का भरपूर दिखावा किया जा रहा है।
यही नहीं लोगों को यह लगे कि किसी संस्था का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से हो रहा है इसके लिए बाकायदा विपिन मल्हन के पैनल की ओर से नोएडा फेस वन में सडको को पैनल के पोस्टर से पाठ दिया गया है। अखबारों में विज्ञापन देकर एक चुनाव कार्यकारिणी घोषित की गई है, चुनाव की तारीख घोषित की गई है । नामांकन और नाम वापसी से लेकर चुनाव तक की तैयारी के दिखावे भी पूरे हैं किंतु पहले दिन इतने बड़े धमाके के साथ पैनल की घोषणा करने के बाद प्रश्न यह है कि क्या इस चुनाव में भी विपिन मल्हन के पैनल के सामने कोई अन्य प्रत्याशी खड़ा हो पाएगा या फिर यूं कहें कि क्या कोई प्रत्याशी खड़ा हो भी सकता है तो इसका जवाब सीधा-सीधा ना में है । और यहीं से नोएडा की सामाजिक संस्थाओं में अक्सर लोकतंत्र को माखौल तंत्र बनाने की चर्चा पर शुरू हो जाती है।
अध्यक्ष मिलता नहीं या अध्यक्ष के आने के रास्ते बंद है!
दरअसल एन ई ए में अगर आप कभी भी किसी पदाधिकारी या कार्यकारणी सदस्य से बात करेंगे तो वह एक ही बात कहेगा विपिन मल्हन के सामने कोई अन्य व्यक्ति उनके तरह काम करने के लिए आ ही नहीं सकता है या फिर विपिन मल्हन ने NEA में 14 वर्षों में इतने काम करें हैं कि उनके सामने कोई खड़ा होने की सोचता नहीं है । पर क्या सच सिर्फ इतना ही है । इससे पूर्व 2 वर्ष पूर्व हुए चुनाव में भी विपिन मल्हन और वीं के सेठ पैनल निर्विरोध ही निर्वाचित हुआ था । बीते 14 वर्षों में लगभग हर बार ऐसा ही होता है
तो क्या विगत 14 वर्षों में नोएडा के एंटरप्रेन्योर्स की आवाज कहे जाने वाले इन ई ए में कोई अन्य आवाज उठाने वाला नहीं बचा या फिर नोएडा एंटरप्रिनियोर्स एसोसिएशन में बीते 14 वर्षों में ऐसा गणित बना लिया गया है जिससे किसी और पैनल के खड़ा होने या फिर सामने आने की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है।

दरअसल नोएडा एंटरप्रिनियोर्स एसोसिएशन के सदस्य और कार्यकारिणी के बीच का गणित अगर समझे तो इससे सारा खेल समझ आ जाता है । अन्य सदस्यों से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान में एन ई ए में लगभग दो से ढाई हजार के बीच सदस्य हैं । संस्था के बायलॉस के अनुसार प्रत्येक 15 सदस्य पर एक कार्यकारिणी मेंबर बनाया जाता है । जिसके चलते वर्तमान चुनाव में अध्यक्ष उपाध्यक्ष कोषाध्यक्ष के बाद 165 कार्यकारिणी सदस्य चुने जाएंगे जो कई राज्यों की विधानसभा सदस्यों से अधिक है और यही से इस पूरे चुनाव का खेल विपिन मल्हन और वीके सेठ के पैनल के पक्ष में हो जाता है ।
लोगों का कहना है प्रत्येक 15 नए सदस्य पर एक कार्यकारिणी मेंबर का चयन ही NEA में लोकतंत्र का खत्म करने वाला प्रमुख कारक है दरअसल इसी नियम के चलते जो भी पैनल सत्ता में है उसके लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की संभावना बन जाती है क्योंकि अन्य कार्यकारिणी मेंबर्स के नाम पर अन्य के वर्तमान पैनल के विरोध में उठने वाले स्वर को मैनेज कर लिया जाता है या फिर जो भी लोग एन ई ए में आगे आकर काम करने के लिए बढ़ते हैं उनको कार्यकारिणी सदस्य के तौर पर लॉलीपॉप देकर मैनेज कर लिया जाता है । इसका उदाहरण विगत पांच बार से इन कार्यकारिणी मेंबर्स में सतत बदलाव के तौर पर देखा जा सकता है, दावा है कि लगभग 30% मेंबर्स को हर बार बदल दिया जाता है ।
लोगों का आरोप है कि सदस्यों के मनोबल को तोड़ने का दूसरा काम भी विपिन मल्हन और वीं के सेठ पैनल बखूबी करता है । पैनल ऊपर से तो यह कहता हुआ नजर आता है कि हम हर बार चाहते हैं कि चुनाव हो, नए लोग आगे आए, वो वह चुनाव लड़े और विपिन मल्हन और वींके सेठ से यह जिम्मेदारी ले लें किंतु किसी नए ग्रुप को खड़े न होने देना ही इस पैनल की विशेषता भी है।
इसको ऐसे समझते हैं कि यदि आपको पता है कि विरोध में कोई आना ही नहीं है तो कार्यालय खोलने से लेकर प्रचार करने की इतनी जल्दी बाजी क्यों दिखाई जाती है। आरोप है कि हर बार पैनल की घोषणा के कार्यक्रम को इतना भव्य बनाया जाता है और सामने किसी अन्य प्रतिद्वंदी के आए बिना ही पूरे शहर को प्रचार से ऐसा पाट दिया जाता है कि सामने कुछ देखना बंद हो जाता है लोगों का कहना है कि पूरे खेल में प्रति व्यक्ति चुनाव लड़ने के लिए नामांकन का खर्च ही ₹5000 है। ऐसे में वर्तमान में देखें तो 165 मेंबर्स पर यह शुल्क लगभग 8 लाख बैठता है वही ₹200 प्रति फॉर्म के दर से₹35000 के फॉर्म बिकते हैं इसके बाद लगभग 15 लाख रुपए से ज्यादा का खर्च पैनल की घोषणा और प्रचार में खर्च होता है जिसके जरिए पूरे शहर में पोस्टर लगाए जाते हैं स्थानीय मीडिया में विज्ञापन चलाए जाते हैं, लोगों को ऑब्लाइज किया जाता है और अंततः नामांकन ना होने के बाद निर्विरोध घोषणा कर दी जाती है।
ऐसे में प्रचार की भव्यता से लेकर पैनल के बड़े होने तक विपक्ष से किसी के खड़े होने की संभावनाएं खत्म हो जाती हैं और हर बार की तरह यही पैनल सामने रह जाता है एन ई ए के कई सदस्यों ने नाम ना बताने की शर्त पर बताया कि अगर वर्तमान में विगत 14 वर्षों से नेतृत्व संभाल रहे लोग अगर दूसरों को मौका देने के लिए इतने ही ईमानदार हैं तो अपने ही पैनल के सदस्यों में से किसी भी सक्षम व्यक्ति को एक बार अध्यक्ष उपाध्यक्ष और कोषाध्यक्ष बनाकर क्यों नहीं देखते । आखिर क्यों हर बार विपक्ष ना होने का अफसोस जाता कर वह स्वयं को ही फिर से मनोनीत क्यों करवा लेते हैं ।
ऐसे में आने वाले समय में यह संस्था भले ही नोएडा ग्रेटर नोएडा और यमुना प्राधिकरण क्षेत्र में एंटरप्रेन्योर्स को अपनी विस्तार योजना बता रही हो। इसके दुष्परिणाम यह हो सकते हैं कि आने वाले समय में संस्था के सदस्य धीरे-धीरे अन्य संस्थाओं या नई संस्थाओं के ओर मुड़ जाएं क्योंकि रुके हुए पानी अक्सर पीने लायक नहीं रहते। दशको तक लोकतंत्र के नाम पर एक ही नेतृत्व संस्थाओं की चमक दमक तो दिखा सकता है किंतु उनको उद्देश्य विहीन कर देता है । यधपि इन सब बातों का नोएडा एंटरप्रिनियोर्स एसोसिएशन के चुनाव पर कोई फर्क पड़ेगा यह कहना मुश्किल है फिर भी सच को लिखना आवश्यक है ताकी भविष्य में कोई ये न कहे कि संस्थाओं के आपातकाल के उस दौर में कोई सच बोलने वाला भी नहीं था ।


