संपादकीय : कोई दीवार से लग के रोता रहा ओर भरता रहा सिसकियां रात भर! युवराज मेहता की मृत्यु केस में पुलिस की नाकामी से बिल्डरों को जमानत बन रहा न्याय पर प्रश्न! क्या पैसे की बदौलत दम तोड़ देगा युवराज की तरह न्याय भी?

NCRKhabar Mobile Desk
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क्या नोएडा के सेक्टर 150 में एक कंस्ट्रक्शन साइट के बेसमेंट में भर पानी में डूब कर युवराज मेहता की मृत्यु के मामले पर लीपापोती शुरू हो गई है ? फिलहाल सरकार से लेकर अदालत में तक के रुख से ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ।चुकी मरने वाला युवराज और पीड़ित पिता एक आम मध्यम वर्गीय परिवार से आता है इसलिए इस केस में आम जनता की नाराजगी के बावजूद अब सब कुछ सामान्य होने लगा है।

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युवराज की मृत्यु के 15 दिन बाद भी ना तो उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा एस आई टी की रिपोर्ट दाखिल करने के बावजूद कोई कार्यवाही होती दिखी, ना ही पुलिस द्वारा बिल्डरों के खिलाफ कोई सख्त कार्यवाही की तैयारी दिख रही है । उससे भी खराब समाचार ये है कि जिन तीन बिल्डरों को पुलिस ने आननं-फानन में गिरफ्तार भी किया था उनमें से दो बिल्डरों को जमानत दे दी गई, जबकि इस क्रम में एक बिल्डर की जमानत पर 2 फरवरी को सुनवाई है ।

बिल्डरों को अदालत द्वारा जमानत दे देना न्याय व्यवस्था पर प्रश्न से अधिक पुलिस की तैयारी पर प्रश्न है। प्रश्न यह है कि विवेचक इतने दिनों में न्यायालय के सम्मुख सही जांच रिपोर्ट क्यों नहीं प्रस्तुत कर सके। पुलिस की लापरवाही ऐसी भी रही की लोटस ग्रीन के मामले में बिल्डर निर्मल सिंह के खिलाफ जारी  नॉन बेलेबल वारंट को भी बचा नहीं सकी। समुचित साक्ष्य के अभाव में न्यायालय ने नॉन बेलेबल वारंट को भी रद्द कर दिया ।

प्रश्न सरकार से लेकर पुलिस तक यह भी है कि पुलिस अभी तक बिल्डरों पर ही मुकदमे क्यों सीमित है इस पूरे प्रकरण में शामिल अन्य स्टेकहोल्डर पर पुलिस द्वारा अभी तक किसी भी प्रकार का मुकदमा क्यों दर्ज नहीं किया गया है या फिर दिखावे के लिए बस बिल्डरों पर हल्के केस में गिरफ्तारियों कर ली गई। हद तो ये भी है कि एसआईटी की जांच रिपोर्ट के बावजूद अगर उत्तर प्रदेश शासन किसी प्रतिक्रिया में दिखाई नहीं दे रहा है तो समुचित दिशा और सबूत के अभाव में न्यायालय के समक्ष बिल्डरों को जमानत देने के अतिरिक्त क्या चारा बचता है ?

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ऐसे में अंतिम सवाल यही बचता है कि इस देश में आम आदमी की मृत्यु पर न्याय अमीर लोगों की ड्योढ़ी पर दम तोड़ देता है और रह जाते है उस पिता की आंख में सूखते आंसू और पूरे विश्व का मजबूत कहने जाने वाला लोकतंत्र और उसका उपहास उड़ाता सिस्टम ओर संभवतः ये चंद पंक्तियां

सांस का बोझ रख के कदमों पर, सिस्टम ने हमें ये दी सौगात।

जख्म के फूल, न्याय  के जंगल, अश्क के दीप, इंतजार की रात।।

एक पिता दीवार से लग के रोता रहा और भरता रहा सिसकियां रात भर ।

आज की रात भी न्याय मिला नहीं, राह तकती रहे खिड़कियां रात भर।।

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