गौतम बुध नगर में पुलिस, प्राधिकरण, प्रशासन ही नहीं राजनेताओं की संवेदनाएं भी कितनी शून्य हैं इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की 6 दिन बीतने के बाद भी दादरी विधानसभा क्षेत्र से प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के तीन बार प्रत्याशी रहे राजकुमार भाटी को ना तो युवराज मेहता की मृत्यु पर कोई संवेदना व्यक्त करने का समय मिला है, ना ही उन्होंने जिले में आए अपने एक वरिष्ठ नेता को वहां ले जाने की आवश्यकता समझी । समाजवादी नेताओं का दबी जुबान में कहना है कि राजकुमार भाटी जी मार्च में होने वाली PDA की रैली में लगे हैं और मरने वाला न तो PDA की कैटेगरी में नहीं आता है न ही उनके ग्रामीण वोट बैंक वाले समाज से आता है ऐसे में वहां जाने से पार्टी को कोई लाभ नहो होगा, बाकी खानापूर्ति के लिए जिलाअध्यक्ष सुधीर भाटी के नेतृत्व में पार्टी के संगठन के लोग वहां जा चुके हैं।
दरअसल चार दिन बीतने के बाद जब शोर मचा तो भाजपा के सांसद और क्षेत्रीय विधायक तेजपाल नागर न सिर्फ घटनास्थल पर गए बल्कि पीड़ित पिता से भी मिलने पहुंचे ।उसके बाद दादरी विधायक तेजपाल नागर यही नहीं रुके उन्होंने प्रशासन एनडीआरएफ एसडीआरएफ पर प्रश्न उठाते हुए मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा और यहां पर एनडीआरएफ टीआरएफ की स्थाई नियुक्ति करने की मांग तक रख दी जिसके बाद लोगों ने विपक्ष के प्रत्याशी के अनुपस्थित होने पर प्रश्न उठाने लगे । हद तो तब हो गई जब जिले में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता रामगोपाल यादव एक शादी समारोह में आए किंतु समारोह में उनके साथ दिखाई दे रहे दादरी विधानसभा से पूर्व प्रत्याशी और राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने उन्हें घटनास्थल तक ले जाना भी जरूरी नहीं समझा।
सूत्रों की माने तो समाजवादी पार्टी पीड़ित पिता के एक मीडिया एजेंसी को दिए उस वीडियो के बाद पिता पर ही आक्रामक हो गई जिसमें पिता ने सरकार द्वारा की जा रही कार्यवाहियों पर तसल्ली होने का बयान दिया था और आगे की कार्यवाही के लिए मुख्यमंत्री से मुलाकात होने की इच्छा जताई थी ।
बस यही से समाजवादी पार्टी को लगा कि सरकार के खिलाफ हंगामा मचाने का उनका एजेंडा तो खत्म हो रहा है ऐसे में अब मानवीय संवेदनाओं की भी क्या आवश्यकता है। और संभवत समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने पीड़ित पिता और घटनास्थल पर जाकर प्रशासन पुलिस प्राधिकरण पर उठने वाले सवालों से किनारा कर लिया ।

लेकिन एनसीआर खबर का प्रश्न यह है कि क्या इस जिले में राजनीति भी पीडीए और गैर पीडीए के पीड़ित देखकर होगी? क्या समाजवादी पार्टी शहरी और गैर पीडीए वोटर को अपना मानते ही नहीं है जो उसके दुख-दुख में खड़ा नहीं होना चाहती। और अगर ऐसा है तो अखिलेश यादव कितना भी दावा करें पार्टी आने वाले चुनावों में जीतने का गणित नहीं बैठा पायेगी।


