शोषित या पिछड़ा? मंडल आयोग के उन 11 मानकों की पड़ताल, जिनसे तय हुआ ‘ओबीसी’ का भविष्य

आशु भटनागर
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आशु भटनागर। UGC की नयी गाइडलाइन पर विवाद के बाद इन दिनों देश की राजनीति में एक नई चर्चा ने जन्म लिया है—क्या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) SC/ST श्रेणी के समाज की तरह ‘शोषित’ हुआ था या वह केवल सामाजिक तोर ‘पिछड़ा’ है? PDA की रजनीति करने वाले राजनीतिक दल इसे शोषण की कहानी बता रहे हैं, तो कुछ इसे केवल सामाजिक रूप से पीछे रह जाने का मामला बताते हैं जिसके चलते इन समाज में शैक्षिक, आर्थिक और महिलाओं कि स्थिति ख़राब मानी गयी।

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ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ओबीसी जातियों का समूह है या एक सुसंगत वर्ग? क्या इन्हें मिला आरक्षण केवल गरीबी हटाने का प्रोग्राम है या इसके पीछे कोई गहरा सामाजिक तर्क है? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए हमें मंडल आयोग (Mandal Commission) के उन पन्नों को पलटना होगा, जिन्होंने इस वर्ग की परिभाषा तय की थी।

पिछड़ापन बनाम शोषण: क्या है आधार?

भारतीय संविधान के तहत अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) को आरक्षण देने के पीछे मुख्य कारण ‘ऐतिहासिक सामाजिक शोषण’ और ‘अस्पृश्यता’ (छुआछूत) जैसे गंभीर मुद्दे थे। लेकिन जब बात ओबीसी की आई, तो शोषण’ और ‘अस्पृश्यता’ (छुआछूत) की जगह केवल ‘पिछड़ापन’ (Backwardness) को ही आधार बनाया गया। मंडल आयोग ने स्पष्ट किया था कि यह पिछड़ापन अचानक नहीं आया, बल्कि इसके पीछे सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कारण थे। सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर ही कई आर्थिक सक्षम और दबंग जातियां भी इसमें आई। कई राज्यों में कई जातियां सामान्य वर्ग में रही तो दुसरे राज्यों में वो ओबीसी कहलाई। लेकिन इससे क्या वाकई जातियों का सामाजिक पिछड़ापन दूर हुआ या एक नए तरीके के कट्टरवाद का भी जन्म हुआ है जिसने कथित तोर पर इसे अवसरवाद में बदल दिया है ।

मंडल आयोग का ‘नंबर गेम’: 11 मानक और 22 अंक और 11 नंबर ने बना दिया ओबीसी

मंडल आयोग ने किसी भी जाति या वर्ग को ओबीसी (OBC) की सूची में शामिल करने के लिए एक वैज्ञानिक पद्धति अपनाई थी। इसके लिए 11 मानक (Criteria) तय किए गए थे, जिनके कुल 22 अंक निर्धारित थे। जिस भी जाति ने 50 फीसदी अंक यानी 11 नंबर हासिल किए, उसे ‘पिछड़ा’ मान लिया गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन अंकों का बंटवारा ही यह स्पष्ट कर देता है कि ओबीसी आरक्षण का असल आधार क्या है।

  1. सामाजिक मानदंड (12 अंक): सबसे महत्वपूर्ण कड़ी

आयोग ने सामाजिक पिछड़ेपन को सबसे अधिक महत्व दिया। इसके 4 बिंदु थे और हर बिंदु के लिए 3 अंक (कुल 12) निर्धारित थे:

  1. ऐसी जातियां जिन्हें समाज के अन्य वर्गों द्वारा पिछड़ा माना जाता है।
  2. वे जातियां जो अपनी आजीविका के लिए मुख्य रूप से शारीरिक श्रम (Physical Labor) पर निर्भर हैं।
  3. वे वर्ग जहां शादी की उम्र राष्ट्रीय औसत से काफी कम है (ग्रामीण क्षेत्रों में 17 वर्ष से कम उम्र में शादी करने वाले पुरुषों और महिलाओं की संख्या औसत से अधिक होना)।
  4. कामकाजी महिलाओं की भागीदारी का राज्य औसत से 25% अधिक होना (यह इस बात का संकेत है कि आर्थिक मजबूरी के कारण महिलाओं को श्रम करना पड़ रहा है)।

  1. शैक्षिक मानदंड (6 अंक):

इसके 3 बिंदु थे, जिनमें से प्रत्येक के लिए 2 अंक निर्धारित थे:

  1. 5 से 15 साल की उम्र के बच्चों का स्कूल न जाना (राज्य औसत से 25% अधिक)।
  2. मैट्रिक (10वीं) तक न पहुंचने वाले छात्रों का उच्च अनुपात।
  3. महिलाओं की शैक्षिक स्थिति

  1. आर्थिक मानदंड (4 अंक):

आर्थिक स्थिति को सबसे कम वेटेज दिया गया। इसके 4 बिंदु थे और हर बिंदु के लिए मात्र 1 अंक था:

  1. पारिवारिक संपत्ति की औसत कीमत राज्य औसत से 25% कम होना।
  2. कच्चे घरों में रहने वाले परिवारों की संख्या अधिक होना।
  3. पीने के पानी के स्रोत का आधा किलोमीटर से अधिक दूर होना।
  4. कर्ज लेने वाले परिवारों की संख्या राज्य औसत से अधिक होना।

क्या कोई ‘अमीर’ भी ओबीसी हो सकता है?

मंडल आयोग की रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यदि कोई जाति शैक्षिक और आर्थिक दोनों पैमानों पर 100% अंक (6+4 = 10 अंक) हासिल कर ले, लेकिन उसे सामाजिक मानदंड में 0 अंक मिले, तो वह किसी भी स्थिति में ओबीसी का हिस्सा नहीं बन सकती। इसका सीधा अर्थ है कि ओबीसी आरक्षण की आत्मा ‘सामाजिक पिछड़ेपन’ में बसती है। बिना सामाजिक पिछड़ेपन के, आर्थिक रूप से कमजोर होना आपको ओबीसी का दर्जा नहीं दिला सकता।

सब कुछ इतना पवित्र तो फिर UGC के नए नियमो से क्या हुआ खेल

UGC की नयी गाइडलाइन से ओबीसी को लेकर क्रीमिलायेर या सबसे अधिक फायदा लेने वाली जातियों के वर्चस्व पर चर्चा शुरू हुई। दरअसल सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने की लड़ाई जब तक शिक्षा, नौकरी और महिलाओं की स्थिति सुधारने तक केन्द्रित थी तब तक मामला सही चल रहा था I परन्तु राजनैतिक लाभ हानि के दौर में SC/ST के सामान ही ओबीसी वर्ग को अब पिछड़े की जगह शोषित मान कर उन्ही की तरह के मुक़दमे कर देने के कवच ने सामान्य जाति में डर का माहोल बना दिया I इसके पीछे का एक तर्क ये है कि अधिकांश जगह ओबीसी से जुडी जातियां लड़ाकू या मार्शल कौम से संबध रखती है, अधिकांश मामलो में SC/ST पर अत्याचार करने में भी यही जातियां सीधे तोर पर शामिल रही है, ऐसे में अगर ये कवच मिला जिसके चलते अगर इनको भी सामान्य जातियों के बच्चो पर अत्याचार का एक नया टूल मिल जाएगा I वहीं ओबीसी में मुस्लिम वर्ग कि भी जातियां शामिल होने से उनको धर्म परिवर्तन के लिए संरक्षण मिल जाएगा और इस सबका सीधा असर सामान्य वाढ के बच्चो कि शिक्षा और मासिक स्थिति पर पड़ेगा I

इन्ही आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी केंदर सर्कार द्वारा लाये गए इस कानून पर न सिर्फ रोक लगे गयी बल्कि सर्कार को ऐसे एक तरफ़ा नियम बनाने के लिए फटकार भी लगाईं I दरअसल भारत का संविधान सभी को सामान अधिकार की बात करता है ऐसे में अगर किसी भी आधार पर एक बड़े वर्ग को ऐसे नियम का लाभ दे दिया जाए तो उससे दुसरे बाकी वर्गों को नुक्सान होगा I

क्या ओबीसी वर्ग की जातियों का पुन: निरीक्षण हो सकता है समाधान ?

यूजीसी नियमों पर सामान्य वर्ग के साथ ओबीसी वर्ग के बढ़ते संघर्ष के बाद प्रश्न यह भी उठा की क्या जब देश में जातीय जनगणना हो ही रही है तो क्या अब वाकई वो वक्त आ गया है जब इस जातीय जनगणना में यह भी चेक किया जाए कि बीते 35 वर्षों में ओबीसी आरक्षण के फल स्वरुप ओबीसी वर्ग की जातियों में उनकी सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और विशेष तोर पर महिलाओं की स्थिति में कितना बदलाव आया है? क्या इस आरक्षण का फायदा इन जातियों ने अपने सामाजिक उत्थान के लिए प्रयोग किया है या फिर यह महज एक राजनीतिक टूल बनकर रह गया है ।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि देश में पहली बार अब जातीय आधार पर जनगणना होने जा रही है जिसके चलते यह पता लगाना आसान है कि किन जातियों में महिलाओं की स्थिति 35 वर्षों में पूर्व के मुकाबले बेहतर हुई है खास तौर पर मार्शल जातियों से आने वाली जातियों में महिलाओं की शैक्षिक स्थिति अगर मजबूत हुई है तो उन्हें वापस सामान्य वर्ग में लाकर बाकी पिछड़ी जातियों को उसका लाभ देने की कोशिश की जाए। भारत में राजनीतिक दलों समेत भारत सरकार को भी तय करना होगा कि ओबीसी का आरक्षण किसी भी समाज के लिए परमानेंट विधान नहीं है इस सब का उपयोग सामाजिक तौर पर पिछड़े वर्ग और उनकी महिलाओं की स्थिति को सुधार करना है और अगर तीन दशक के बाद भी इसमें सुधार नहीं हो पा रहा है तो फिर इस सिस्टम में बदलाव के साथ कुछ ऐसे उपाय किए जाएं जिससे इस वर्ग की महिलाओं के सामाजिक स्तर में खास तौर पर महिलाओं के सामाजिक स्तर में बदलाव देखने आरंभ हो।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे