अंजना भागी । मेरी दादी 18वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में जन्मी थीं और 19वीं शताब्दी समाप्त होने से पूर्व स्वर्ग सिधार गईं। वह हमारे परिवार की धुरी थीं ” सम्मान, श्रद्धा और संस्कारों की जीवित प्रतिमा”। जब वह मात्र 7 वर्ष की थीं, तभी उनकी माताजी का देहांत हो गया। उनके पिताजी, जो एक प्राचीन मंदिर के मुख्य पंडित थे, उन्होंने कहा “मेरी बेटी विदुषी बनेगी, इसे मैं पढ़ाऊँगा।”। उस युग में जब बाल विवाह सामान्य था, उन्होंने दादी का विवाह तब किया जब वह पूर्णतः शिक्षित, धर्मग्रंथों की ज्ञाता और गृह-विज्ञान में निपुण हो चुकी थीं।
दादा जी सरकारी सेवा में थे। उनके देहांत के बाद दादी ने अपनी पेंशन को सेवा का साधन बनाया, और यहीं से शुरू हुआ उनका अनोखा “भंडारा”।
भंडारे की उनकी परिभाषा
दादी कहती थीं: “यदि मेरे घर के भंडार से 10-12 लोग भोजन करते हैं, तो उसी भंडार से मैं किसी जरूरतमंद का पेट भर सकूँ — यही भंडारा है।” पर उनका भंडारा केवल हलवा-पूरी तक सीमित नहीं था… गड्ढों का भंडारा
उन दिनों मेरठ में बिजली जाती तो कई-कई दिन नहीं आती थी। सड़क बनती तो टूटकर पड़ी रहती थी। दादी जहाँ मकान बनता, वहाँ जाकर कहतीं — “जो टूट-फूट से बिल्डिंग मटेरियल बचा है, हमें दे दीजिए।” अपने पैसों से मजदूर लगवातीं, तीन पहिए का ठेला मंगवातीं, और पूरे इलाके के गड्ढे भरवातीं। वह कहती थीं — “ये गड्ढे सड़क का मुँह नहीं, दुर्घटना का मुँह हैं… इन्हें भरना भी तो भंडारा है।” धीरे-धीरे लोग स्वयं जुड़ने लगे। दादी मेरठ में सेवा की पहचान बन गईं।
आज का नोएडा
आज नोएडा एक व्यापारिक शहर है। देशभर से आए युवा, महिलाएँ, बुज़ुर्ग — दिन-रात काम करते हैं। दिन में गड्ढे दिख जाते हैं, पर रात में? जब सामने से एलईडी लाइट की रोशनी आँखों पर पड़ती है , गड्ढा दिखाई नहीं देता, और कोई भी घायल हो सकता है

जब सामने से एलईडी लाइट की रोशनी आँखों पर पड़ती है
गड्ढा दिखाई नहीं देता, और कोई भी घायल हो सकता है…घर से “राम-राम” कहकर निकला व्यक्ति कभी सिर फूटे, कभी घायल हो जाए…
फोन टूटे, और उसकी खबर पुलिस के माध्यम से घर पहुँचती है तो?
समस्याओं का समाधान किया जाए तो वे समाप्त भी हो जाती हैं, पर ए.सी. की ठंडक और हीटेड ऑफिस के कमरों से बाहर निकलकर सड़कों को देखना शायद कठिन हो जाता है।
ऐसे में क्यों न हम सब इसे सामूहिक जिम्मेदारी बना लें? एक नया भंडारा क्यों न हम “गड्ढा-मुक्त भंडारा” प्रारंभ करें? जहाँ भी मकान बन रहे हैं, वहाँ से वेस्ट बिल्डिंग मटेरियल एकत्र करें।
चंदा नहीं, सहयोग लें। मजदूर लगाकर बड़े-बड़े गड्ढे भरें। पड़ोस, सेक्टर, कॉलोनी, ब्लॉक — सब मिलकर आगे आएँ। जैसे हलवा-पूरी का भंडारा पेट भरता है, वैसे ही सड़क का भंडारा जीवन बचाता है। और शायद… इससे बड़ा पुण्य भी कोई नहीं।
एक आह्वान “आइए, सड़कों के घाव भरें। गड्ढों के मुँह बंद करें — और अपने शहर को सुरक्षित करें।”
अंजना भागी पत्रकार, समाजसेवी और सेक्टर 11 की पूर्व RWA अध्यक्ष हैं, विभिन्न समाचार पत्रों के लिए नियमित कालम लिखती है।


