आशु भटनागर। सुपरटेक ट्विन टावर (Supertech Twin Towers) का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। लंबे इंतजार के बाद, जांच रिपोर्ट सरकार के हवाले हो गई है, जिसमें नोएडा में तैनात रहे 11 अधिकारियों को इस भव्य निर्माण विवाद का दोषी माना गया है। अब सवाल यह है कि शहर की योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही कब सुनिश्चित होगी?
यह मामला केवल दो इमारतों के अवैध निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नोएडा के निवासियों के विश्वास और सुरक्षा से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 28 अगस्त 2022 को इन टावरों को ढहाया गया था, लेकिन इसके पीछे की व्यवस्थागत खामियों की जांच अब जाकर पूरी हुई है।
क्या है पूरा मामला?
सुपरटेक ट्विन टावर (एमराल्ड कोर्ट परिसर में स्थित) को अवैध निर्माण और तकनीकी खामियों के चलते सुप्रीम कोर्ट ने गिराने का आदेश दिया था। इनको ध्वस्त करने तैयारी में करीब एक साल का समय लगा और इन्हें 28 अगस्त 2022 को गिरा गया। लेकिन अब तक इन टावर के निर्माण के लिए जिम्मेदार प्राधिकरण के अधिकारियों पर कार्रवाई नहीं हो सकी। शासन ने सुपरटेक के ट्विन टावर मामले में नोएडा के 11 अधिकारियों की जांच का जिम्मा एसीईओ प्रवीण मिश्रा को दिया गया था। उनका 30 सितंबर 2022 को स्थानांतरण होने के बाद से जांच रुक गई। इस पर नोएडा की ओर से छह माह में तीन बार शासन को पत्र भेजा गया।इसके बाद यूपी सरकार ने सितंबर 2021 में एक चार सदस्यीय जांच समिति गठित की थी। इसी क्रम में नोएडा के तत्कालीन और वर्तमान अधिकारियों की भूमिका की जांच के लिए ग्रेटर नोएडा के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी सौम्य श्रीवास्तव को 23 मार्च 2023 को को जिम्मेदारी सौंपी गई थी। तब से वह जांच कर रहे थे।
अब जांच रिपोर्ट में तत्कालीन प्रबंधक नियोजन मुकेश गोयल, वरिष्ठ प्रबंधक नियोजन रितुराज व्यास, सहयुक्त नगर नियोजक विमला सिंह, प्लानिंग असिस्टेंट अनीता, जून 2021 को रिटायर्ड नगर नियोजक एके मिश्रा, मार्च 2020 को रिटायर्ड विधि सलाहकार राजेश कुमार, मार्च 2020 को रिटायर्ड विधि अधिकारी ज्ञानचंद, सितंबर 2018 को रिटायर्ड परियोजना अभियंता एमसी त्यागी, जुलाई 2020 को रिटायर्ड सहायक वास्तुविद प्रवीन श्रीवास्तव, परियोजना अभियंता बाबूराम, 31 मई 2019 को रिटायर्ड प्लानिंग असिस्टेंट सहायक वास्तुविद टीएन पटेल दोषी पाए गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से अधिकांश अधिकारी 2018 से 2021 के बीच सेवानिवृत्त हो चुके हैं।
एनसीआर खबर विश्लेषण: व्यवस्थागत विफलता का दस्तावेज
एक स्थानीय निवासी और शहरी नियोजन विशेषज्ञ के नजरिए से देखें तो यह रिपोर्ट केवल दोषियों की सूची नहीं है, बल्कि नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर एक कड़ी टिप्पणी है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही टिप्पणी की थी कि “नोएडा अथॉरिटी के चेहरे ही नहीं, उसके मुंह, नाक, आंख सभी से भ्रष्टाचार टपकता है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तरह से तकनीकी मानकों और नियोजन नियमों को नजरअंदाज किया गया, वह गंभीर चिंता का विषय है। रिपोर्ट में जिन 11 अधिकारियों को दोषी ठहराया गया है, उनमें से सात रिटायर हो चुके हैं। यह तथ्य इस बात की ओर इशारा करता है कि जिम्मेदार अधिकारी अपनी सेवा अवधि पूरी करके निकल गए, लेकिन शहर को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
आगे क्या?
अब यह रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार के पास है। सरकार को यह तय करना है कि इन अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाए और भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने के लिए क्या नीतिगत बदलाव किए जाएं।
स्थानीय निवासियों के लिए, यह केवल एक प्रशासनिक फाइल नहीं है। यह इस बात का प्रतीक है कि शहर में हो रहे निर्माण कार्यों पर कड़ी निगरानी जरूरी है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को न केवल दोषियों पर कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि नोएडा प्राधिकरण में जवाबदेही का एक मजबूत तंत्र भी स्थापित करना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी अधिकारी नियमों को तोड़ने की हिम्मत न करे। सरकार की अगली कार्रवाई का इंतजार अब पूरे नोएडा को है।


