आशु भटनागर । ग्रेटर नोएडा में उच्च शिक्षा में उच्च मापदंड रखने का दावा करने वाली गलगोटिया यूनिवर्सिटी बीते दो दिनों से चर्चा में है । यूनिवर्सिटी देश में हो रहे विश्व के सबसे बड़े आई सबमिट में अपने स्टॉल पर प्रदर्शित किए गए एक मॉडल पर अपने यहां हुए डेवलपमेंट के झूठे दावे पर फंस गई है । दरअसल जिस डॉग को गलगोटिया ने अपना ओरियन बताया था उसे एक चीनी कंपनी ने यह कहते हुए अपना बताया कि गलगोटिया ने उसे ढाई लाख रुपए में खरीदा है ।
बस इसी के बाद सोशल मीडिया पर गलगोटिया के दावों की हवा निकाल दी गई लोगों ने गलगोटिया को ट्रोल करना शुरू कर दे । पर चीनी उत्पादों को अपना ठप्पा लगाकर भारत में बेच देना भारतीय कंपनियों के नया तो नहीं है। भारत में make in india के नाम पर लावा, इंटेक्स, माइक्रोमैक्स जैसे मोबाइल ब्रांड रातों-रात इसलिए बड़े हो गए थे कि वह चीन से इंपोर्ट करके उन्हें भारत में भेज देते थे। बाद में ओप्पो, वीवो जैसी चीनी कंपनियां भारत में आई तो ये ब्रांड खत्म हो गए।
मिलेनियम ईयर में मुझे याद है नोएडा से संचालित भारत की सबसेबड़ी म्यूजिक कंपनी चीनी कंपनी चैंगहांग से सीडी प्लेयर बनवा कर भारत में बेचती थी। 25 साल बाद भी उसे कंपनी का आज तक कोई मैन्युफैक्चरिंग छोड़िए इलेक्ट्रॉनिक गुड्स का रिसर्च डेवलपमेंट प्लांट भी पूरे भारत में या नोएडा में नहीं है । भारत में बिक रहे आज भी तमाम टीवी,मोबाइल कंप्यूटर पर ब्रांड नाम भले ही कुछ भी हो किंतु उसके कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग चीन में ही है हम बस यहां असेंबल कर रहे हैं।
मैं इस देश में रिसर्च डेवलपमेंट के प्रयास कम क्यों हैं, क्यों हम इनोवेशन में पीछे क्यों हैं इस सब पर बात करके आपका मूड खराब नहीं करूंगा। तो फिर गड़बड़ कहां है दरअसल गड़बड़ इस कॉर्पोरेट झूठ वाली सोच के शिक्षा में आने से है।
ग्रेटर नोएडा के नॉलेज पार्क क्षेत्र में स्थित इन शिक्षण संस्थानों में नैतिकता नाम की कोई चीज संभवत बची ही नहीं है। जिस गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रवक्ता नेहा सिंह AI सबमिट में लोगों को यह बता रही थी कि वह 350 करोड रुपए AI डेवलपमेंट पर लगाने जा रही है । उन्हीं के अपने स्टॉल पर लगाए गए प्रोडक्ट के चाइनीस निकल जाने से भी उनके चेहरे पर शिकन मौजूद नहीं दिखाई देती । शिक्षण संस्थानों की बेशर्मी को आप ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब इस फर्जी दावे की हवा निकलने लगी तब भी गलगोटिया ने डैमेज कंट्रोल के लिए इस प्रोफेसर को अगले दिन स्टॉल पर दोबारा भेज दिया और वही नेहा सिंह बेशर्मी के साथ अपने एक दिन किया पूर्व किए गए दावे को नकारती नजर आई। शिक्षण संस्थानों में प्रोफेसर से लेकर मैनेजमेंट तक किए आदत उस व्यवहार से आती है जहां बच्चों के हर दावे को हर शिकायत को नकार दिया जाता है।
पूरे प्रकरण में राहत की बात इतनी थी कि भारत सरकार में थोड़ी शर्म बची थी इसलिए उन्होंने गलगोटिया यूनिवर्सिटी का स्टाल कल बंद करवा दिया।
ऐसा नहीं है कि शिक्षा के नाम पर समाज सेवा की आड़ में ऐसा करने वाली यूनिवर्सिटी गलगोटिया अकेली है ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अंतर्गत आने वाले नॉलेज पार्क 5 में चल रहे अनेको शिक्षण संस्थान हॉस्टल्स की जांच अगर कर ली जाए तो यहां तमाम घोटाले नजर आएंगे और इन्हें वह लोग कर रहे हैं जो इस देश में बच्चों को नैतिकता और ईमानदारी की शिक्षा देने का वादा करते हैं । ऐसा ही एक उदाहरण ग्रेटर नोएडा के नॉलेज पार्क 2 स्थित एक बड़े मेडिकल इंस्टिट्यूट संस्थान शारदा यूनिवर्सिटी का भी है। इसके बारे में कहा जाता है कि 20 करोड़ रुपए में लगभग 50 एकड़ जमीन एक मेडिकल ट्रस्ट के नाम पर ली गई है जिसमें डेंटल कॉलेज, मेडिकल कॉलेज खोले जाने थे। किंतु शारदा ग्रुप में उसी ट्रस्ट की जमीन पर महंगी सुविधाएं तो फीस वाला शारदा केयर नाम का एक पांच सितारा अस्पताल भी खड़ा कर दिया है। मजेदार बात यह है कि इसको ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने कंप्लीशन भी दे दिया है। अब कंप्लीशन ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों ने क्यों और कैसे दिया होगा इस पर विशेष टिप्पणी की आवश्यकता तो नहीं होनी चाहिए। अब शिक्षा के नाम पर पैसे कमाने का ऐसा खेल ग्रेटर नोएडा की इसी जमीन पर हो रहा है और यही शारदा यूनिवर्सिटी अब ग्रेटर नोएडा के बाद यमुना प्राधिकरण में सस्ते दरों पर 100 एकड़ जमीन के लिए प्रार्थन कर रही है कि वहां भी मेडिकल कालेज बनाना है।
कहा जाता है कि इसी नालेज पार्क में शोध संस्थान के नाम पर बने एक बैंकट हॉल पर प्राधिकरण की नजरे इसलिए नहीं पड़ती है कि वो एक ऐसे कलाकार के नाम है, जिसके संगीत से सपा बसपा, भाजपा सब मदहोश है । विपक्ष के एक बड़े नेता और प्रवक्ता के तो सारे कार्यक्रम इसी बैंकट हॉल में मुफ्त में कर दिए जाते हैं।
इसी नॉलेज पार्क क्षेत्र में चल रहे हॉस्टल्स में होने वाली गुंडागर्दी और उनमें हो रहे बच्चों पर अत्याचारों की कहानी प्रतिदिन अखबारों में छपती हैं किंतु पुलिस और प्राधिकरण दोनों ही शिक्षा के नाम पर हो रहे इन कृत्यों पर आंखें मूंदे रहते हैं।
बीते दिनों ऐसे ही एक हॉस्टल में एक लड़के ने हॉस्टल के संचालकों द्वारा बुलाए बाउंसर की पिटाई से आहत होकर छत से कूद कर आत्महत्या कर ली जिसे बाद में पिता की डांट से आहत होकर आत्महत्या बात कर मामला रफा दफा कर दिया गया पिता आज भी अपनी शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचाने के लिए परेशान घूम रहा है ।

ऐसे में अगर गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीन के द्वारा निर्मित डॉग को अपना बताकर प्रदर्शित कर भी दिया तो इस पर हंगामा मचाने की जरूरत नहीं है। क्योंकि हम और हमारे देश के लोगों का मूल चरित्र ऐसा ही है हम तो वो लोग है चार दिन किसी स्थान पर समाज सेवा करके उस पर कब्जा कर लेते है । सड़क के किनारे फुटपाथ की घास को संरक्षित करने के नाम पर उसे पर बाढ़ लगाकर उसे घेर लेते हैं। इसमें नया कुछ नहीं है शायद इसी लिए शाहरुख खान की फिल्म में ये गाना लिखा गया है
हम लोगों को, समझ सको तो, समझो दिलबर जानी
जितना भी तुम समझोगे उतनी होगी हेरानी
अपनी छतरी तुम को दे दे कभी जो बरसे पानी
कभी नये पैकेट में बेचे तुमको चीज पुरानी
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी,


