सत्यम शिवम् सुन्दरम : सोशल मीडिया का “अनदेखा” सच: कभी जो सुझाव थे वो अब “ज़िद” बन कर बुरे लगने लगे है

आशु भटनागर
7 Min Read

आशु भटनागर। आज से बीस साल पहले, जब याहू ग्रुप और गूगल के ऑरकुट के जरिये सोशल मीडिया का जन्म हो रहा था, तो दुनिया भर में आम लोगों के लिए यह अपनी आवाज़ बुलंद करने का एक ज़रिया बन गया। पांच साल बाद, फेसबुक, लिंक्डइन, कोरा और ट्विटर के दौर में यह मंच सिर्फ बातचीत का नहीं, बल्कि ज्ञानवर्धन का भी एक बड़ा केंद्र बनने लगा। यह वो दौर था जब लगा कि अब आम आदमी की बात सुनी जाएगी, उसे महत्व मिलेगा।

- Support Us for Independent Journalism-
Ad image

मगर, आज हकीकत कुछ और ही बयां करती है। youtube, insta के vlog, रील और विडियो के साथ व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया ने आम लोगों को अपनी बात रखने की जो आज़ादी दी है, उसका दुरुपयोग अब सिस्टम पर भारी पड़ने लगा है। अपने-अपने निजी स्वार्थों के लिए लोग जिस तरह से सिस्टम को चुनौती देने लगे हैं, वह अब रोज़मर्रा की बात हो गई है।

“सिस्टम को सलाह देना” और “सिस्टम को हर रोज़ खोज-खोज कर निर्देशित करना” – इन दोनों के बीच का महीन अंतर अब सोशल मीडिया पर धुंधलाता नज़र आ रहा है। जिसे देखो, अपनी सुविधा और अपनी सोच के अनुसार सिस्टम को बदलने के निर्देश देता दिखाई देता है। इस बदलते परिदृश्य को देखकर मुझे एक पुरानी कहानी याद आती है, जो शायद आज की स्थिति को बखूबी समझा सकती है।

चलिए, पढ़िये वो कहानी:

सुबह की सैर के बाद, डॉक्टरों का एक समूह सड़क किनारे एक रेस्टोरेंट में बैठकर चाय का आनंद ले रहा था। तभी उन्होंने देखा कि एक आदमी लंगड़ाता हुआ उनकी ओर आ रहा है।

पहला डॉक्टर बोला, “इसके बाएँ घुटने में गठिया (आर्थराइटिस) है।” दूसरा बोला, “इसे प्लांटर फैशियाइटिस है।” तीसरा बोला, “सिर्फ टखने में मोच है।” चौथा बोला, “देखो, यह आदमी अपना घुटना ठीक से उठा नहीं पा रहा, लगता है लोअर मोटर न्यूरॉन की समस्या है।” “लेकिन मुझे तो यह हेमीप्लेजिया की कैंची जैसी चाल लग रही है…” पांचवां डॉक्टर बोला।

छठा डॉक्टर अपना निदान बताने ही वाला था कि वह आदमी उनके पास पहुँच गया और बड़े ही सरल ढंग से बोला, “क्या यहाँ पास में कोई मोची है जो मेरी चप्पल ठीक कर दे…?”

आजकल सोशल मीडिया और टीवी पर तथाकथित विशेषज्ञ ठीक इसी तरह बातें करते हैं। कोई हवा में तीर चलाकर शहर के सारे जाम खत्म करने का ‘फ्री लेफ्ट टर्न’ का समाधान बताता है, कोई किसी खास स्थान को ‘डस्ट फ्री’ बनाने की मांग करता है, तो कोई सडको के विडियो डाल कर ये बताता है कि सिस्टम बिलकुल नकारा है। ऐसे अनगिनत उदाहरण आपको हर दिन मिल जाएंगे।

लेकिन क्या वाकई ये सब समाधान कारगर होते हैं? या हमें सिस्टम को सलाह देते समय यह भी सोचना चाहिए कि सरकार या प्रशासन जन भावनाओं और आवश्यकताओं के आधार पर बृहत स्तर पर निर्णय लेता है, और उसी से नगर, राज्य या देश का विकास होता है?

अगर हर व्यक्ति अपनी ही ज़िद पर अड़ जाए, तो देश में सिर्फ़ अराजकता फैलेगी। जिस तरह छह डॉक्टरों ने अपनी-अपनी विशेषज्ञता के आधार पर उस लंगड़ाते आदमी के चलने की समस्या का निदान करने की कोशिश की, लेकिन असलियत कुछ और ही निकली। उसी तरह, सोशल मीडिया पर भी हर कोई अपनी व्यक्तिगत समझ और स्वार्थ के आधार पर पूरे सिस्टम को बदलने की सलाह देने लगता है, जबकि समस्या का मूल शायद कहीं और ही छिपा हो।

सोशल मीडिया की यह शक्ति, जो कभी आम आदमी की आवाज़ उठाने का माध्यम थी, आज एक दोधारी तलवार बन गई है। यह हमें अपनी बात कहने का मंच देती है, लेकिन साथ ही यह भी सिखाती है कि हर “सलाह” को “माग” या “ज़िद” में बदलना, और हर “सुझाव” को “अंतिम सत्य” मान लेना, सिस्टम ही नहीं समाज के लिए किस कदर हानिकारक हो सकता है।

हमें यह समझना होगा कि सामाजिक और सरकारी सिस्टम एक जटिल मशीन की तरह काम करते हैं। इसमें हर पुर्जा अपनी जगह महत्वपूर्ण है। किसी एक पुर्जे को अपनी मनमर्ज़ी से बदलने की कोशिश, पूरी मशीन को बिगाड़ सकती है।

“मेरी गाड़ी का बोनट ठीक नहीं है, इसलिए पूरी सड़क को चौड़ा कर दिया जाए” – यह सोच, उस आदमी की सोच से अलग नहीं है एक सडक पर अपनी छड़ी घुमाते हुए चलने की कोशिश करे और ये भूल जाए कि संविधान ने स्वतंत्रता सिर्फ उसे ही नहीं मिल रही है बल्कि ये दुसरे का भी अधिकार है साथ ही अगर आपकी स्वतंत्रता अन्य लोगो की स्वतंत्रता में बाधक बन्ने लगे तो संभल जाना चाहिए।

क्या हमें नहीं सोचना चाहिए कि जो लोग सिस्टम को चलाने का ज़िम्मा संभालते हैं, वे दिन-रात इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि किस तरह समाज का विकास हो, जनहित सर्वोपरि रहे। उनके पास पूरे परिदृश्य को देखने की क्षमता और अनुभव होता है।

हमें अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों और व्यक्तिगत विचारों को पूरे सिस्टम पर थोपने की बजाय, धैर्य रखना चाहिए। अपनी बात को रचनात्मक तरीके से रखना चाहिए, न कि ज़िद के तौर पर।

सोशल मीडिया का इस्तेमाल ज्ञान प्राप्त करने, सही जानकारी फैलाने और जिम्मेदार नागरिक के तौर पर अपनी राय रखने के लिए होना चाहिए, न कि अराजकता फैलाने या सिस्टम को अपनी सुविधा अनुसार झुकाने के लिए।

ऐसे में अगर हम सब मिलकर यह सुनिश्चित करें कि सोशल मीडिया का यह शक्तिशाली मंच, समाज के विकास में सहायक बने, न कि विघ्न। अपनी आवाज़ का इस्तेमाल निर्माण के लिए करें, विनाश के लिए नहीं। क्योंकि अंततः, हम सब एक ही समाज का हिस्सा हैं, और इसकी प्रगति में ही हमारी अपनी प्रगति निहित है।

Share This Article
आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे