बिसरख कोतवाली क्षेत्र के एक निजी अस्पताल में मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ मात्र 10 दिन की एक नवजात बच्ची को 2.65 लाख रुपये में बेचने की कोशिश की जा रही थी। शनिवार को एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU), बाल कल्याण समिति (CWC) और पुलिस की संयुक्त टीम ने एक बड़े जाल बिछाकर नवजीवन अस्पताल की मालकिन यशिका, लैब टेक्नीशियन गजेंद्र और सफाई कर्मचारी रंजीत को रंगे हाथों दबोच लिया।
स्टिंग ऑपरेशन से हुआ खुलासा इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब नोएडा के एक व्यक्ति ने चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098 पर संपर्क किया। उस व्यक्ति ने बताया कि उन्होंने सोशल मीडिया पर बच्चा गोद लेने की इच्छा जताई थी, जिसके बाद बिसरख स्थित नवजीवन अस्पताल की एक नर्स ने उनसे संपर्क किया। नर्स ने बच्ची उपलब्ध कराने के बदले 2.65 लाख रुपये की मांग की।

अधिकारियों ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जाल बिछाया। संबंधित व्यक्ति के माध्यम से आरोपियों को शनिवार शाम 4 बजे बिसरख के कुलेसरा में बुलाया गया। जैसे ही लैब टेक्नीशियन गजेंद्र और सफाई कर्मचारी रंजीत बच्ची को लेकर पहुंचे, सादे कपड़ों में तैनात पुलिस टीम ने उन्हें धर दबोचा।
अस्पताल की भूमिका पर उठ रहे सवाल प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि इस सौदेबाजी में अस्पताल प्रशासन की गहरी संलिप्तता थी। पकड़े गए आरोपियों से पूछताछ के बाद अस्पताल की मालकिन यशिका को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस अब उस नर्स की तलाश कर रही है जिसने पहली बार सौदा तय किया था।
बाल कल्याण समिति (CWC) ने नवजात बच्ची को अपनी सुरक्षा में ले लिया है। बच्ची के कथित माता-पिता की पहचान कर ली गई है और उन्हें 23 मार्च को पेश होने के लिए कहा गया है। पुलिस इनके दावों की पुष्टि के लिए डीएनए (DNA) टेस्ट भी कराएगी।
पुलिस की कार्रवाई जारी एसीपी पवन कुमार ने बताया कि “सीडब्ल्यूसी की तहरीर पर मामला दर्ज कर लिया गया है। अस्पताल के पिछले कुछ वर्षों के रिकॉर्ड और डिलीवरी रजिस्टर खंगाले जा रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या पहले भी ऐसे सौदे हुए हैं।” फिलहाल, तीनों आरोपियों से पूछताछ कर गिरोह के अन्य सदस्यों का पता लगाया जा रहा है।
संपादकीय दृष्टिकोण
स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर ‘कलंक’ यह घटना न केवल आपराधिक है, बल्कि समाज और चिकित्सा जगत के लिए एक गंभीर चेतावनी भी है। जिन अस्पतालों को जीवन बचाने का केंद्र माना जाता है, वहां के कर्मचारियों और मालिकों का बच्चों की तस्करी में शामिल होना बेहद चिंताजनक है।
यह मामला दर्शाता है कि निजी अस्पतालों में किस तरह नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को केवल इस एक मामले तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि क्षेत्र के अन्य निजी क्लीनिकों और अस्पतालों के रिकॉर्ड की भी सघन जांच होनी चाहिए। आपको बता दें कि बीते दिनों नोएडा के ही एक अन्य अस्पताल फेलिक्स अस्पताल के AGM को भी सीबीआई ने मरीजो को रेफरल के लिए रिश्वत देते पकड़ा था I उससे पहले किडनी रैकेट काण्ड में भी कई बड़े और नामी अस्पतालों का नाम सामने आया था।
सीबीआई की जांच के अनुसार, मामला एटा स्थित ईसीएचएस पॉलीक्लिनिक में तैनात मेडिकल ऑफिसर डॉ. आशीष शाक्य (सेवानिवृत्त मेजर) और फेलिक्स अस्पताल प्रबंधन के बीच साठगांठ से जुड़ा था। आरोप है कि डॉ. शाक्य ने अस्पताल प्रबंधन के साथ मिलकर एक योजनाबद्ध तरीके से मरीजों को बिना किसी ठोस चिकित्सीय आवश्यकता के फेलिक्स अस्पताल रेफर किया। इस अनैतिक प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य अस्पताल को सरकारी भुगतान वाले अधिक से अधिक मरीज उपलब्ध कराना था, जिसके बदले में डॉ. शाक्य को मोटा कमीशन दिया जाता था। सीबीआई द्वारा साझा की गई जानकारी के मुताबिक, यह कार्रवाई 15 मार्च को अंजाम दी गई। घटनाक्रम की शुरुआत 11 मार्च को हुई थी जब डॉ. शाक्य ने अपनी बकाया रिश्वत की राशि की मांग की थी। 14 मार्च को दोनों पक्षों के बीच नोएडा में मुलाकात तय हुई। 15 मार्च को जैसे ही सेक्टर 137 स्थित अस्पताल के कॉन्फ्रेंस रूम में एजीएम बिजेंद्र सिंह ने डॉ. आशीष शाक्य को 3 लाख रुपये की नकद राशि सौंपी, पहले से जाल बिछाकर बैठी सीबीआई की टीम ने दोनों को दबोच लिया। मौके से रिश्वत की पूरी राशि बरामद कर ली गई है। सीबीआई के सूत्रों का संकेत दिया था कि यह मिलीभगत केवल इन दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं हो सकती। जांच एजेंसी अब अस्पताल के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा कर रही है। यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि यह ‘रैकेट’ कब से चल रहा था और अब तक इस माध्यम से कितने मरीजों को अवैध रूप से रेफर कर सरकारी धन का गबन किया गया है। आपको बता दें फेलिक्स हॉस्पिटल को डॉक्टर डी के गुप्ता और उनके धर्मपत्नी रश्मि गुप्ता द्वारा संचालित किया जाता है


