विश्व की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी पहचान बना चुकी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अब एक गहन चिंतन की आवश्यकता महसूस करने की आवश्यकता है। नेताओं का जुड़ाव ज़मीनी हकीकत से कम और डिजिटल अभियानों से ज़्यादा हो गया है। इसका सबसे ताज़ा उदाहरण बीते सप्ताह देश भर में देखी गई गैस की किल्लत और इस पर पार्टी के नेताओं की प्रतिक्रियाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
हालिया गैस संकट के दौरान, आम जनता सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी कतारों में खड़ी पाई गई, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि भाजपा के कितने ही सांसद, विधायक या मंत्री इन लाइनों के आस-पास लोगों का हाल जानने या उनकी मदद के लिए खड़े नहीं दिखे। यह अभाव संवेदनशीलता का स्पष्ट संकेत देता है, जो एक जन-आधारित दल के लिए चिंता का विषय है।

जमीनी स्तर पर जनता से सीधे संवाद और उनकी समस्याओं को सुनने के बजाय, कई नेता सोशल मीडिया, विशेषकर ट्विटर पर सक्रिय रहे। जहां एक ओर देश के कोने-कोने से गैस की कमी कालाबाजारी की खबरें आ रही थीं, वहीं इन नेताओं के ट्विटर हैंडल “सब ठीक है” के संदेशों से भरे हुए थे। यह प्रवृत्ति इस बात की ओर इशारा करती है कि नेताओं का प्राथमिक लक्ष्य अब प्रधानमंत्री और पार्टी नेतृत्व को ऑनलाइन सक्रियता दिखाना बन गया है, न कि जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं का निवारण करना।
पार्टी के भीतर यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना और ‘नमो ऐप’ पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना ही टिकट पाने और राजनीतिक करियर में आगे बढ़ने का सबसे कारगर तरीका है। इस दबाव में, ज़मीनी कार्य और जन-संपर्क का महत्व गौण होता जा रहा है। नेता यह मानते हैं कि नरेंद्र मोदी के नाम पर उन्हें चुनाव में जीत मिल ही जाएगी, जिससे व्यक्तिगत स्तर पर जनता से जुड़ने की आवश्यकता कम महसूस होती है।
यह एक ऐसा चक्र बन गया है जहाँ सांसद, विधायक और मंत्री सभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशाल जनाधार पर निर्भर हो गए हैं। उन्हें लगता है कि जनता उनसे भले ही नाराज़ हो, लेकिन जब वोट देने की बारी आएगी तो ‘मोदी जी’ के नाम पर ही वोट डालेगी, और उनकी जीत सुनिश्चित हो जाएगी। यह सोच पार्टी और जनता के बीच बढ़ते फासले कोबढ़ा रही है ।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब भी जनता की तरफ से वास्तविक समस्याओं का सामना किया जाता है, तो कई बार उन्हें झूठा करार देकर खारिज कर दिया जाता है। १५ वर्ष पूर्व कांग्रेस सरकार का पतन भी ऐसे ही आरम्भ हुआ था। वर्तमान गैस की किल्लत के मामले में भी यह देखा गया कि कुछ नेताओं ने इसे ‘पैनिक बाइंग’ कहकर टालने का प्रयास किया, जबकि ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही थी। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि एक्स(X) पूर्व में ट्विटर का सेंटीमेंट और ज़मीन का सेंटीमेंट कितना अलग है। भाजपा को ये समझना ज़रूरी है कि आम जन जिस दिन तक आपका विकल्प नहीं खोज रहा है नहीं खोज रहा है जिस दिन खोजना शुरू कर देगा आपकी मुश्किल कड़ी हो जायेगी, दुसरे दलों से आये नेताओ का क्या है वो फिर दुसरे दलों में ही चले जायेंगे


