आशु भटनागर । उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधान सभा के लिए जहाँ म्यख्य्मंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार इन दिनों बड़े निवेश के तमाम MOU के जरिये प्रदेश के विकास को बता रही है वहीं सरकार द्वारा हाल ही में घोषित ‘AI इकोसिस्टम’ प्रोजेक्ट ने देश के तकनीकी और राजनीतिक गलियारों में एक बहस छेड़ दी है। दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘Puch AI’ नाम के एक स्टार्टअप के साथ ₹25,000 करोड़ का MoU (समझौता ज्ञापन) साइन किया है, जिसका उद्देश्य राज्य को ‘AI प्रदेश’ बनाना है। किन्तु इन घोषणा के तुरंत बाद ही इस कंपनी का प्रोफाइल और डील का पैमाना जांच के घेरे में आ गया, जिससे यह प्रोजेक्ट अब चर्चा से ज्यादा विवाद का विषय बन गया है।
क्या है पूरा मामला?
यूपी सरकार की योजना इस निवेश के जरिए प्रदेश में AI पार्क, डेटा सेंटर, AI यूनिवर्सिटी और अत्याधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे उत्तर प्रदेश को टेक्नोलॉजी हब बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम बताया। लेकिन जैसे ही यह खबर सार्वजनिक हुई, सोशल मीडिया और टेक कम्युनिटी ने स्टार्टअप ‘Puch AI’ की असलियत खंगालनी शुरू कर दी।

विवाद की जड़: क्या है Puch AI की हकीकत?
तथ्यों के सामने आते ही सवाल उठने लगे कि क्या एक नई और अनुभवहीन कंपनी ₹25,000 करोड़ के मेगा-प्रोजेक्ट को संभालने में सक्षम है? रिपोर्ट्स के अनुसार, Puch AI एक साल पुरानी कंपनी है, इसके सीईओ सिद्धार्थ भाटिया है और वार्षिक रेवेन्यू महज 50 लाख रुपये के आसपास बताया जा रहा है।
कंपनी के फाउंडर का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड भी चर्चा में रहा है, जब उन्होंने ‘Perplexity’ को 20 बिलियन डॉलर में खरीदने का दिखावटी प्रस्ताव दिया था, जिसे लेकर वे पहले ही विवादों में रह चुके हैं। टेक एक्सपर्ट्स का मानना है कि इतनी बड़ी राशि का निवेश और प्रोजेक्ट एग्जीक्यूशन एक ऐसे स्टार्टअप के लिए असंभव है, जिसके पास अभी तक कोई बड़े स्तर का इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पूरा करने का अनुभव नहीं है।
सियाराम सोनी नामक एक यूजर ने लिखा है कि सिद्धार्थ भाटिया ‘Puch AI’ के CEO हैं, और उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के साथ 25,000 करोड़ रुपये का MOU साइन किया है। यह भ्रष्टाचार के स्तर को दर्शाता है; उनकी कंपनी की नेट वर्थ 50 लाख रुपये से भी कम है, लेकिन सिस्टम में मौजूद रसूखदार लोगों के प्रभाव के चलते उन्हें 25,000 करोड़ रुपये का कॉन्ट्रैक्ट मिल गया। उन्होंने Google के मुफ़्त ‘Gemma’ टूल का इस्तेमाल करके एक AI ऐप बनाया, और अब उसे ‘Make in India’ के नाम से बेच रहे हैं; सरकार में IT मंत्री और IT के प्रधान सचिव के साथ उनका सीधा क्या लेना-देना है?
इस पूरे प्रकरण की गंभीरता तब और बढ़ गई जब मुख्यमंत्री के X (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट के नीचे ‘Community Notes’ (फैक्ट-चेक लेबल) जुड़ गया। इस लेबल में कंपनी की कम क्षमता और हालिया विवादों का उल्लेख किया गया, जो किसी भी सरकारी डील के लिए एक दुर्लभ और शर्मनाक स्थिति है।

मुख्यमंत्री ने दी सफाई
सोशल मीडिया पर बढ़ते दबाव और सवालों के बीच, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि ₹25,000 करोड़ का MoU कोई ‘तत्काल भुगतान’ नहीं है, बल्कि यह एक ‘प्रस्तावित निवेश’ (Proposed Investment Commitment) है। सरकार का तर्क है कि ऐसे समझौतों का उद्देश्य राज्य में निवेश को आकर्षित करना है, जिसे चरणों (Phases) में लागू किया जाएगा। सरकार ने दोहराया कि वे राज्य में नई तकनीक और स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

Puch AI का क्या है कहना ?
कंपनी की तरफ से भी सफाई दी गई कि उनका मकसद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को आम लोगों तक पहुंचाना है। उनका मॉडल ट्रेडिशनल AI कंपनियों से अलग है। जहां बड़े एंटरप्राइज सॉल्यूशन के बजाय WhatsApp, वॉस और लोकल लैंग्वेज के जरिए AI को डेमोक्रेटाइज किया जाएगा. कंपनी का दावा है कि वह यूपी में AI पार्क और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के लिए पार्टनर्स के साथ काम करेगी, और यह कोई अकेले कंपनी का प्रोजेक्ट नहीं होगा।
टेक इंडस्ट्री की राय: बड़ा दांव या कच्ची तैयारी?
इस डील पर टेक जगत बंटा हुआ है। एक वर्ग का मानना है कि भारत को AI रेस में बने रहने के लिए बड़े और साहसी निर्णयों की आवश्यकता है। वहीं, अनुभवी प्रोफेशनल्स इसे ‘सस्ते प्रचार’ (PR Stunt) के रूप में देख रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि AI का भविष्य सिर्फ घोषणाओं से नहीं, बल्कि मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सिक्योरिटी और बेहतरीन एग्जीक्यूशन मॉडल से बनता है। किसी ऐसी कंपनी के साथ इतने बड़े समझौते पर हस्ताक्षर करना, जिसके पास जमीन पर काम करने का अनुभव कम हो, न केवल सरकारी साख पर सवाल उठाता है, बल्कि राज्य के निवेश वातावरण (Investor Climate) पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है।
ऐसे मे इस विवाद के बाद देखा जाए तो भले ही उत्तर प्रदेश सरकार का उदेश्य पवित्र है, किन्तु ‘Puch AI’ के साथ हुई यह डील ‘ड्यू डिलिजेंस’ (Due Diligence) की कमी को दर्शाती है। ये डील ये भी बता रही है कि किस तरह यूपी में सरकार द्वारा अधिकारियो के चयन में क़ाबलियत की जगह पसंद को प्रश्रय देने से परिणाम अब प्रतिकूल होने लगे है I
यूपी के सबसे बड़े इन्वेस्टमेंट हब युमना प्राधिकरण में भी बीते एक वर्ष में कई ऐसे MOU बताये जा रहे हैं जिनको लेकर प्रश्न उठ सकते है। शीर्ष अधिकारियो की नकारात्मक कार्यशैली से कई प्रोजेक्ट धरातल पर उतर ही नहीं पा रहे हैं। ऐसे में यदि योगी सरकार सच में उत्तर प्रदेश को AI हब बनाना चाहती है, तो उसे कागजी अधिकारियो को एक्सटेंशन देने के स्थान पर योग्यता को रखने की आवश्यकता है ताकि ऐसे MoU से आगे बढ़कर पारदर्शी बिडिंग प्रोसेस और स्थापित कंपनियों के साथ जुड़ने योजनाये शुरू की जा सके। फिलहाल, यह डील एक बड़े तकनीकी सपने के बजाय एक ‘ऑपरेश्नल रिस्क’ (Operational Risk) ज्यादा नजर आ रही है। क्या यूपी सरकार इस विवाद के बाद अपनी रणनीति बदलेगी? यह समय ही बताएगा।


