ग्रेटर नोएडा: पिछले एक दशक से ‘खाली आश्वासनों’ की घुट्टी पी रहे ग्रेटर नोएडा वेस्ट के निवासियों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। रविवार को आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में क्षेत्र की करीब 50 सोसायटियों के प्रतिनिधियों ने एक सुर में घोषणा करते हुए कहा कि अब वे केवल वादों से नहीं, बल्कि ठोस धरातलीय कार्रवाई से ही संतुष्ट होंगे। इस संघर्ष को नई धार देने के लिए 26 अप्रैल को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक विशाल धरना प्रदर्शन का आह्वान किया गया है।
‘मेट्रो के नाम पर सिर्फ छलावा’
नेफोवा (NEFOWA) के अध्यक्ष अभिषेक कुमार की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में गुस्सा साफ झलकता था। अभिषेक कुमार ने कड़े शब्दों में कहा, “पिछले 10 वर्षों में हमें मेट्रो के नाम पर केवल चुनावी सब्जबाग दिखाए गए हैं। फाइलों में दौड़ती मेट्रो और ज़मीनी हकीकत के बीच का फासला अब इतना बढ़ गया है कि निवासियों का धैर्य जवाब दे चुका है।”
ट्रैफिक के बोझ तले दब रहा है ‘ग्रेटर नोएडा वेस्ट’
ग्रेटर नोएडा वेस्ट, जो आज दिल्ली-एनसीआर के सबसे तेज़ी से विकसित होते आवासीय केंद्रों में से एक है, वहां के लाखों प्रोफेशनल्स के लिए रोज़ाना का सफर किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। मेट्रो के अभाव में निवासियों को घंटों ट्रैफिक जाम, भारी प्रदूषण और समय की बर्बादी का सामना करना पड़ता है। एक कामकाजी पेशेवर के लिए दिन का बड़ा हिस्सा सड़क पर गुजारना न केवल उत्पादकता को प्रभावित करता है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी भारी पड़ता है।
जनआंदोलन में बदल रही है मांग
पिछले सप्ताह आयोजित ‘सांकेतिक मेट्रो पिलर प्रदर्शन’ की अपार सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि स्थानीय निवासियों का समर्थन इस मुद्दे के साथ मजबूती से खड़ा है। जंतर-मंतर पर होने वाला आगामी प्रदर्शन इस आंदोलन को एक राष्ट्रीय मंच देने की कोशिश है, ताकि सरकार और संबंधित प्राधिकरणों को एक बार फिर याद दिलाया जा सके कि वे जिन करदाताओं की सुविधाओं के प्रति जवाबदेह हैं, वे अब जाग चुके हैं।
अब क्या होगा?
बैठक में मौजूद सभी प्रतिनिधियों ने संकल्प लिया है कि वे प्रत्येक सोसाइटी से अधिक से अधिक लोगों को जोड़ेंगे ताकि 26 अप्रैल को जंतर-मंतर पर हज़ारों की भीड़ सरकार को अपनी ताकत का एहसास करा सके। यह आंदोलन अब केवल एक सुविधा की मांग नहीं, बल्कि निवासियों के ‘अधिकार’ की लड़ाई बन चुका है।
राजनीतिक गलियारों में भले ही यह मामला अभी तक फाइलों की धूल में दबा हो, लेकिन ग्रेटर नोएडा वेस्ट के निवासियों का यह जुझारूपन बताता है कि ‘सुशासन’ के वादे केवल नारों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। क्या यह प्रदर्शन सोई हुई व्यवस्था को जगा पाएगा? यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि ग्रेटर नोएडा वेस्ट अब मेट्रो से कम पर समझौता करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।


