आशु भटनागर: बुधवार को मैंने अपने एक पारिवारिक कार्यक्रम में वयस्त था, अचानक कई फोन लगातार आने लगे ये फोन शहर के कई सोशल मीडिया इन्फ्लुंसर, कथित समाजसेवी और नेताओ के थे I सब बुधवार को एमिटी यूनिवर्सिटी के एक छात्र हर्षित भट्ट की डूबने से हुई मौत पर सिस्टम को कोसते हुए अपना आक्रोश अगले दिन के समाचारों के बीच उनका पक्ष भी लिखने की बात कर रहे थे I आज के समाचार पत्रों ने भी कमोवेश उसी बात पर प्रश्न उठाये हैं, पर क्या ये सच में उतना ही भयावह है या इस सच के पीछे कुछ और भी है ?
परीक्षा खत्म होने की खुशी, दोस्तों के साथ पिकनिक और फिर अचानक एक मातम!
बुधवार शाम एमिटी यूनिवर्सिटी के एक छात्र हर्षित भट्ट की डूबने से हुई मौत ने एक परिवार को उजाड़ दिया। जानकारी के अनुसार 23 वर्षीय हर्षित, जो फिजिकल एजुकेशन का छात्र था, अपने दोस्तों के साथ एक प्रतिबंधित निर्माणाधीन साइट पर गया था। आरोप है कि वहां नहाते समय गहरे गड्ढे में डूबने से उसकी जान चली गई। पुलिस प्रशासन के अनुसार, घटनास्थल के चारों ओर 12 फीट की बैरिकेडिंग की गई थी, जो स्पष्ट करती है कि वह क्षेत्र प्रतिबंधित है। इसके बावजूद दीवारों को फांदकर अंदर जाना और खतरनाक पानी में उतरना, सीधे तौर पर नागरिको द्वारा सुरक्षा मानकों की अनदेखी है।
सिस्टम को कोसने का फैशन?
घटना के सामने आते ही सोशल मीडिया पर एक वर्ग सक्रिय हो गया, जिसने #JusticeForHarshit हैशटैग के साथ तुरंत इसे ‘सिस्टम की विफलता’ करार दे दिया, कुछ ने इसे बिना सोचे समझे युवराज की घटना से भी जोड़ दिया। स्थानीय लोगों की मानें तो वहां सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे। फिर भी, बिना पूरी जानकारी के इसे ‘युवराज वाली घटना’ जैसा रंग देना और सरकार को कठघरे में खड़ा करना क्या उचित है?
सवाल यह उठता है कि क्या हर दुखद दुर्घटना को राजनीतिक हथियार या सनसनीखेज कंटेंट बनाना अब एक बीमारी बन चुका है? मैंने फोटो और वीडियो देखे है, स्थानीय लोगों की बातें सुनीं। बारह फीट की बैरिकेडिंग है। प्रतिबंधित जगह में, शराब पीकर नवयुवक दीवार फाँदे, फिर नहाने उतरे, उसमें से एक की मृत्यु हो गई। यहाँ तो सरकार ने हर प्रयास किए थे, फिर सरकार पर ब्लेम क्यों? आप स्वयं फोटो और वीडियो देखिए और बताइए कि कितने फीट की दीवार होती तो ये नहीं होता!

जिम्मेदारी किसकी?
घटना के कुछ पहलुओं पर गौर करें तो यह मामला और भी पेचीदा हो जाता है। चर्चा है कि छात्रों के बीच आपसी विवाद भी था और मृतक के परिजन इस दिशा में भी जांच की मांग कर रहे हैं। यदि मामला विवाद का है या युवाओं की लापरवाही और नशे का है, तो इसे ‘सिस्टम की नाकामी’ बताकर मूल समस्या से ध्यान भटकाना बेहद खतरनाक है।
कल हमारे पारिवारिक समारोह के साथ उसी प्रांगण में एक बर्थडे पार्टी और भी थी ? 15 वर्ष के किशोर उस पार्टी के मुख्य पात्र थे I अचानक बाकी लडको ने बर्थडे बॉय को गोद में उठा लिया और उसे रेस्ट्रोरेन्ट के बाहर पहले तल पर बनी लाबी में घुमाने लगे I मस्ती के क्षणों में उनका खेल उसे नीचे फेकने जैसा ही था। भगवान का शुक्र था कि कोई दुर्घटना नहीं हुई सब सही निबट गया किन्तु कुछ हो जाता तो यहाँ किसकी गलती होती ? आखिर कोई कितनी बड़ी बैरिकेटिंग बना सकता है ? क्या आम जीवन में आनंद और स्वछंदता की सीमाए निधारित करने का समय नहीं आ गया है ?
सोशल मीडिया पर अपना चेहरा चमकाने और ‘ट्रेंड’ में बने रहने की होड़ में हम यह भूल रहे हैं कि हर बात पर ‘ब्लेम गेम’ खेलने से हम उस ‘शेर आया-शेर आया’ वाली कहानी के चरवाहे जैसे बन रहे हैं। जब कोई वास्तविक प्रशासनिक चूक होगी, तब तक हमारे शोर में उसकी वैधता खत्म हो चुकी होगी और कोई भी हमारी बात गंभीरता से नहीं लेगा।
युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि स्वतंत्रता का अर्थ सुरक्षा के नियमों का उल्लंघन करना नहीं है। वहीं, सोशल मीडिया पर सक्रिय ‘डिजिटल पक्षकारो’ को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या वे सच के साथ खड़े हैं या सिर्फ सनसनी फैलाकर अपनी पहुंच (Reach) बढ़ाने में लगे हैं। कुछ दिन पूर्व गलगोटिया युनिवेर्सिटी के बाहर जिस प्रकार की उग्र प्रदर्शन की घटनाएं सामने आई थी, उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए गौतमबुद्धनगर के सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत ने समाजवादी पार्टी के नेताओं पर शिक्षण संस्थानों के बाहर धरना-प्रदर्शन एवं अभद्रता करने पर रोक लगा दी थी।
दुखद घटनाओं का राजनीतिकरण और प्रशासन पर अकारण दोषारोपण करना न तो मृतक को न्याय दिला सकता है और न ही भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोक सकता है। वक्त आ गया है कि हम ‘ब्लेम गेम’ के शोर को कम करें और व्यक्तिगत जिम्मेदारी व सुरक्षा के प्रति जागरूक होने की संस्कृति को अपनाएं।


