नोएडा इंटरनेशनल एअरपोर्ट के उद्घाटन के बाद स्थानीय किसान भी अपने मुद्दों की भी चर्चा करने लगे है । यमुना विकास प्राधिकरण (यीडा) क्षेत्र के हजारों किसानों के लिए अपने हक के भूखंडों का सपना अभी भी फाइलों और विकास कार्यों की सुस्ती के बीच फंसा हुआ है। कुछ माह पूर्व प्राधिकरण ने किसान संगठनों के दबाव में आकर आरक्षण पत्र (Reservation Letters) तो जारी कर दिए थे, लेकिन स्थानीय संगठनो का दावा है कि 11 गांवों के लगभग ढाई हजार किसानों को अपने सात प्रतिशत आबादी भूखंडों पर कब्जे नहीं मिला है और उसके लिए अभी और कितना लंबा इंतजार करना होगा ये भी पता नहीं चल रहा है। आरोप है स्थानीय विधायक भी किसानो के मामले पर साथ देने की जगह उस खोखले विकास के दावे करते दीखते हैं जो ज़मीन पर कहीं नहीं है । वहीं यमुना प्राधिकरण के सीईओ राकेश कुमार सिंह भी अपने 9 माह के कार्यकाल में भी इसके लिए कुछ नहीं कर पाए है I
क्या है मामला?
यमुना प्राधिकरण अपनी विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए किसानों की सहमति से उनकी भूमि का अधिग्रहण करता है। मुआवजे के अतिरिक्त, किसानों को उनकी अधिग्रहित जमीन का सात प्रतिशत हिस्सा ‘आबादी भूखंड’ के रूप में वापस दिया जाता है, ताकि वे अपना घर बना सकें। प्राधिकरण अब तक 29 गांवों की जमीन ले चुका है, लेकिन इन भूखंडों को विकसित कर किसानों को सौंपने की प्रक्रिया कछुआ गति से चल रही है।
आंकड़ों के अनुसार, 11 गांवों के कुल 2465 भूखंड नियोजित तो कर लिए गए हैं, लेकिन वे अभी भी ‘अविकसित’ श्रेणी में हैं। इनमें से अधिकांश भूखंडों पर तो अभी विकास कार्य शुरू तक नहीं हो पाया है। प्रभावित गांवों की सूची में अच्छेजा बुजुर्ग, मोहम्मदपुर गूजर, रौनीजा, जगनपुर अफजलपुर, निलौनी शाहपुर, भट्टा, पारसौल, डूंगरपुर रीलखा, मिर्जापुर, चांदपुर और रामपुर बांगर शामिल हैं।
इन गांवों की जमीन पर प्राधिकरण ने सेक्टर 18, 20, 32 और 33 जैसी महत्वपूर्ण आवासीय और औद्योगिक योजनाएं बनाई हैं। जहाँ एक तरफ बाहरी आवंटियों को कब्जे दिए जा रहे हैं, वहीं मूल किसान अपनी ही जमीन के विकास की राह देख रहे हैं।
किसान संगठनों के भारी विरोध और निरंतर मांग के बाद, प्राधिकरण ने 6260 किसानों को आरक्षण पत्र तो वितरित कर दिए, जिससे कागजी तौर पर उनकी उम्मीदें जागीं। लेकिन विडंबना यह है कि जब तक परियोजना विभाग इन भूखंडों पर सड़क, नाली, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित नहीं करता, तब तक किसान वहां कब्जा नहीं ले सकते।
प्राधिकरण का पक्ष इस मामले पर प्राधिकरण के अधिकारियों का कहना है कि नियोजन (Planning) की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। परियोजना विभाग को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि इन नियोजित भूखंडों को जल्द से जल्द विकसित किया जाए। अधिकारियों के अनुसार, विकास कार्य पूरे होते ही कब्जा हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।
स्थानीय निवासियों और किसानों की मांग स्थानीय किसानों का कहना है कि उन्होंने क्षेत्र के विकास के लिए अपनी उपजाऊ जमीन दी है, लेकिन जब उनके घर और भविष्य की बारी आती है, तो प्राधिकरण ढिलाई बरतता है। किसानो संगठनो की मांग है कि जिस तत्परता से प्राधिकरण औद्योगिक और आवासीय सेक्टर विकसित कर रहा है, उसी गति से किसानों के सात प्रतिशत भूखंडों का विकास भी होना चाहिए।
अब सवाल यह है कि क्याप्राधिकरण के सीईओ अपनी सुस्ती त्यागकर इन भूखंडों को समय पर तैयार करवा पायेंगे, या फिर किसानों का यह इंतजार और लंबा खिंचेगा? स्थानीय निवासियों की नजरें अब प्राधिकरण की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।


