आशु भटनागर। वेतन वृद्धि की मांग को लेकर नोएडा के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में सोमवार को कर्मचारियों का विरोध प्रदर्शन हिंसक हो उठा। ऋचा ग्लोबल से शुरू हुई यह ‘चिंगारी’ अब ‘आग का रूप’ ले चुकी है, जिसने स्थानीय निवासियों और यातायात व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया। पिछले तीन से चार दिनों से जारी इस प्रदर्शन ने रविवार को छुट्टी के बाद सोमवार को उग्र रूप धारण कर लिया, जब गुस्साए कर्मचारियों ने कई प्रमुख सड़कों पर जाम लगा दिया और यातायात को पूरी तरह ठप कर दिया।
फेज 2 क्षेत्र में प्रदर्शन ने उस समय हिंसक मोड़ ले लिया, जब आक्रोशित भीड़ ने वहां खड़ी गाड़ियों में आग लगा दी और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। इलाके में भारी पुलिस बल तैनात किया गया है ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके और शांति व्यवस्था बहाल की जा सके। किन्तु आंदोलनकारियो ने उसके बाद भी कई जगह अपना प्रभाव दिखा दिया है। फिलहाल जिला प्रशासन शांति की अपील करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहा है।
प्रदर्शनकारी कर्मचारियों की प्रमुख मांगों में वेतन को 13 हजार रुपये से बढ़ाकर 20 हजार रुपये करना, ओवरटाइम का उचित भुगतान और छुट्टियों के लिए अलग प्रावधान शामिल हैं। कर्मचारियों का कहना है कि मौजूदा वेतन और सुविधाओं में उन्हें जीवन-यापन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
सुनियोजित साजिश की आशंका और पुलिस की जांच
हालांकि, नोएडा से लखनऊ तक को हिला देने वाली इस घटना का एक और पहलू भी सामने आ रहा है। पुलिस और प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यह एक सामान्य श्रमिक आंदोलन से कहीं अधिक, एक सुनियोजित साजिश प्रतीत हो रही है। अधिकारियों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया संकट के चलते बनी अस्थिरता और आर्थिक दबाव के बावजूद भारत में कायम स्थिरता कुछ तत्वों को असहज कर रही है, और वे ऐसी घटनाओं के माध्यम से अशांति फैलाने का प्रयास कर सकते हैं।
सूत्रों की आमने तो वेतन वृद्धि की मांग को लेकर चल रहे इस प्रदर्शन में कुछ उपद्रवी तत्वों द्वारा कर्मचारियों को भड़काया जा रहा है। चर्चा है कि नोएडा पुलिस सभी उपलब्ध वीडियो क्लिप्स का विश्लेषण कर रही है ताकि अशांति फैलाने वाले और हिंसा में शामिल असामाजिक तत्वों की पहचान की जा सके और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सके। वरिष्ठ अधिकारियों ने संकेत दिया है कि यह हिंसा अचानक नहीं हुई, बल्कि इसकी तैयारी पहले से की गई थी, जो एक योजनाबद्ध गतिविधि की ओर इशारा करती है।
एनसीआर खबर को मिली जानकारी के अनुसार, इस हिंसा के पीछे ‘अर्बन नक्सल’ जैसी ताकतों का हाथ होने की आशंका भी जताई जा रही है। ऐसी धारणा है कि जैसे-जैसे नक्सलवाद अपने पारंपरिक गढ़ों से कमजोर हो रहा है, शहरी क्षेत्रों में सक्रिय उनके समर्थक औद्योगिक क्षेत्रों में अशांति फैलाकर देश में अस्थिरता का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
आन्दोलन से प्रभावित वयापरियो ने चिंता व्यक्त की है कि ऐसे आंदोलन की आड़ में देश में आंतरिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास हो सकता है। यह उस समय में जब दुनिया ईंधन संकट और आर्थिक अनिश्चितता से जूझ रही है, इस तरह की घटनाएं देश के आंतरिक माहौल और निवेशकों के भरोसे पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं, जिससे अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। विशेष रूप से उन निर्यातकों का काम बाधित हो सकता है, जो इस कठिन समय में भी देश के लिए व्यवसाय सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं।
हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में, एक व्यक्ति यह कहते हुए सुना गया है कि वह केवल 11 दिन पहले ही नौकरी पर आया था, फिर भी वह इस हड़ताल में शामिल था। यह सवाल उठाता है कि क्या कुछ लोगों को सुनियोजित तरीके से नौकरी पर रखा गया और फिर उन्होंने श्रमिकों को भड़काया। सोशल मीडिया पर ही कुछ ऐसी रेकार्डिंग भी सामने आई है जिनमे बाकायदा नाम लेकर कम्पनियों के विरुद्ध आन्दोलन की प्लानिंग की जा रही है तो कई विडियो में लोग अन्ना आन्दोलन का नाम लेकर अरविन्द केजरीवाल की मुख्यमंत्री की राजनीती की बातें भी करते दिख रहे हैं। पुरे प्रकरण में स्थानीय आन्दोलन कारी, मजदूर संगठन हाशिये पर हैं। प्रशासन को इस बात की भी जांच करने की आवश्यकता है कि आग की तरह फैल रहे इस आंदोलन का कोई संगठित चेहरा सामने क्यों नहीं आया है, और क्यों इसे जानबूझकर ‘स्वतःस्फूर्त’ दिखाया जा रहा है।
ऐसे में प्रशासन और सरकार से अपेक्षा है कि वे इस आंदोलन के परदे के पीछे से संचालित कर रही ताकतों को बेनकाब करें, जो औद्योगिक कंपनियों को मोहरा बनाकर अशांति फैलाना चाहते हैं। स्थानीय निवासियों से भी शांति बनाए रखने और किसी भी प्रकार की भड़काऊ गतिविधियों से दूर रहने की अपील की गई है। स्थिति पर कड़ी नजर रखी जा रही है और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं।


