आशु भटनागर : कलयुग के इस दौर में जहां राजनीति और सामाजिक विमर्श में अपनी-अपनी जाति के भगवान, नेता और महापुरुष खोजने की होड़ मची है, वहीं इस वर्ष वाल्मीकि जयंती के अवसर पर सोशल मीडिया पर एक नई बहस और विवाद ने जन्म ले लिया है। आधुनिक राजनीति के ‘दलित बनाम ब्राह्मण’ विमर्श के बीच महर्षि वाल्मीकि की मूल पहचान को लेकर सोशल मीडिया पर विचारधाराओं की जंग छिड़ गई है।
एक ओर ब्राह्मणवाद का विरोध करने वाले कुछ गुटों ने वाल्मीकि के ब्राह्मण होने के दावों को ‘कुंठा’ और ‘एजेंडा’ करार देते हुए इसे ब्राह्मणों की ‘मोनोपोली’ (एकाधिकार) बताया है, वहीं दूसरी ओर विद्वानों का तर्क है कि आज की ‘शूद्र बनाम दलित’ की परिभाषा और पौराणिक काल की वर्ण व्यवस्था के सूक्ष्म अंतर को समझे बिना सत्य तक नहीं पहुंचा जा सकता।
शास्त्रों के आईने में महर्षि की पहचान
सोशल मीडिया की टिप्पणियों से इतर, यदि हम वाल्मीकि रामायण और अन्य धर्मग्रंथों के पन्नों को पलटें, तो महर्षि वाल्मीकि के ब्राह्मण होने और उनके उच्च आध्यात्मिक स्तर के स्पष्ट सूत्र मिलते हैं। वाल्मीकि रामायण का प्रारंभ ही देवर्षि नारद और महर्षि वाल्मीकि के संवाद से होता है। महर्षि वाल्मीकि ने जब नारद जी से संसार के सबसे गुणवान पुरुष के बारे में पूछा, तब उन्हें श्री राम का परिचय मिला।
वंश परिचय: प्रचेता के पुत्र ऐतिहासिक और आध्यात्मिक साक्ष्यों के अनुसार, वाल्मीकि जी ने स्वयं अपना परिचय देते हुए ‘अध्यात्म रामायण’ (उत्तरकांड) में कहा है: “प्रचेतसोहं दशमः पुत्रोराघवनंदन” अर्थात, “हे रामचंद्र! मैं प्रचेता का दसवां पुत्र हूं।”
मनुस्मृति (1/35) में प्रचेता का उल्लेख वशिष्ठ, भृगु और नारद जैसे ऋषियों के भाई के रूप में मिलता है। ग्रंथों के अनुसार, घोर तपस्या के दौरान शरीर पर वल्म (दीमक की मिट्टी) चढ़ जाने के कारण ही उनका नाम ‘वाल्मीकि’ पड़ा। वे न केवल एक कवि थे, बल्कि एक भविष्यवेत्ता और राष्ट्र के सांस्कृतिक उत्कर्ष के सूत्रधार भी थे।
श्रीराम के समकालीन और सीता के आश्रयदाता
वाल्मीकि का प्रभु श्री राम के जीवन में केवल एक लेखक के रूप में नहीं, बल्कि एक अभिभावक के रूप में भी योगदान रहा है। उन्होंने सीता परित्याग के समय उन्हें अपने आश्रम में आश्रय दिया और लव-कुश के शिक्षक बने। उन्हीं के मार्गदर्शन में रामायण के गायन की वाचिक परंपरा (कुशीलव) का आरंभ हुआ।
तुलसीदास के रूप में पुनर्जन्म की मान्यता
शास्त्रों में महर्षि वाल्मीकि के महत्व को इस बात से भी समझा जा सकता है कि भविष्य पुराण और शिव संहिता जैसे ग्रंथों में गोस्वामी तुलसीदास को वाल्मीकि का ही अवतार बताया गया है। शिव संहिता, वशिष्ठ संहिता (गीता प्रेस गोरखपुर वेद कथा अंक, पृष्ठ संख्या 285 से लिया गए वाल्मीकिस्तुलसीदासः कलौ देवी भविष्यति। अर्थात, भगवान शंकर ने देवी पार्वती से कहा था कि महर्षि वाल्मीकि ही कलयुग में तुलसीदास के रूप में अवतार लेंगे और रामकथा को जनभाषा (अवधी) में सुलभ कराएंगे। अनुवाद लगभग यही है कि श्री वाल्मीकि मुनि कलियुग में श्री तुलसीदास के रूप में अवतार लेंगे और रामचंद्र कथा को आम भाषा में समझाएंगे।
सर्वलोकोपकाराय एको हरिणामुदा।
वाल्मीकिस्तुलसोस्दासस्तद् रूपेण भविष्यति। ।
(श्री बृहद् ब्रह्म रामायण- 1.78)
अर्थ: श्री हरि की इच्छा से, श्री वाल्मीकि महर्षि सभी लोगों के लाभ के लिए श्री तुलसीदास जी के रूप में प्रकट होंगे।
भाषा काव्यं मानसाख्यं रामायरणमनुत्तमम् ।
करिष्यति जनानां यत्कलौ शीघ्र फलप्रदः ॥
(श्री बृहद् ब्रह्म रामायण 1.79)
अर्थ: श्री गोस्वामी जी श्री मानस रामायण के नाम से श्रेष्ठ भाषा का काव्य प्रसिद्ध करेंगे जो कलियुग में सभी लोगों के लिए शीघ्र फल देने वाला होगा।
वाल्मीकिस्तुलसीदासो भविष्यति कलौ युगे ।
शिवेनात्र कृतो ग्रन्थः पार्वतीं प्रतिबोधितम् ॥
बृहद् ब्रह्म रामायण
श्री याज्ञवल्क्य जी ने कहा कि कलियुग में श्री वाल्मीकि जी गोस्वामी तुलसीदासजी के रूप में अवतार लेंगे, ये श्री गोस्वामी तुलसीदासजी, शिवजी द्वारा पार्वती को ज्ञान देने के लिए रची गई पुस्तक श्री रामचरित मानस को लिखेंगे।
राम भक्ति प्रवाहार्थं भाषा काव्यं करिष्यति।
रामायणं मानसाख्यं तत्ते शंकां निवारयेत् ॥
बृहद् ब्रह्म रामायण
अर्थ:~ 6) उसी किताब के ज़रिए श्री राम की भक्ति का रस बहाने के लिए, यानी उसे बढ़ाने के लिए। श्री तुलसीदास एक काव्य की रचना करेंगे। वह रामायण जिसे मानस कहते हैं, उसके बारे में आपके शक दूर कर दे।
ऐसे में आज के दौर में जब महापुरुषों को जातिगत सीमाओं में बांधने की कोशिश की जा रही है, तब वाल्मीकि रामायण के सूत्र हमें बताते हैं कि महर्षि का व्यक्तित्व किसी एक वर्ग या जाति तक सीमित नहीं था। वे ‘वेद सम्मत’ रामायण के रचयिता थे, जिसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया पर चल रहे विवाद ऐतिहासिक तथ्यों की कमी और वैचारिक पूर्वाग्रहों का परिणाम अधिक प्रतीत होते हैं।
सत्य यह है कि वाल्मीकि की रामायण आज भी मानव जीवन के लिए ‘मंत्रकथा’ है, जो किसी भी राजनीतिक या जातिगत परिधि से कहीं ऊपर है।



