नोएडा में फिर डगमगाई समाजवादी पार्टी की नैया: दावेदारों की होड़ के बीच अपरिपक्व सलाहकारों में फंसे मुकेश शर्मा द्वारा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा बन न जाए बड़ी रणनीतिक भूल?

आशु भटनागर
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आशु भटनागर। दीपावली के इस पावन पर्व पर जहां एक ओर चारों ओर उत्साह और खुशहाली का माहौल है, वहीं दूसरी ओर नोएडा के राजनीतिक गलियारों में समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर उपजा असंतोष पार्टी के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहा है। गौतमबुद्ध नगर जिले में सपा का चुनावी इतिहास कभी बहुत सुखद नहीं रहा है और आगामी चुनावों से ठीक पहले पार्टी के भीतर पनप रहा आपसी भीतरघात एक बार फिर पार्टी की चुनावी नैया डुबो सकता है।

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गौतमबुद्ध नगर में समाजवादी पार्टी अब तक अपना खाता खोलने में भी संघर्ष करती दिखी है। नोएडा विधानसभा सीट से सुनील चौधरी लगातार हार का रिकॉर्ड बना चुके हैं, तो वहीं दादरी सीट से राजकुमार भाटी की स्थिति भी कुछ अलग नहीं रही है। ऐसे में इस बार नोएडा सीट से नए और मज़बूत विकल्पों को लेकर मंथन चल रहा था। समाजवादी पार्टी में नोएडा की राजनीती में अपना नेता बनाने की चाह में अति उत्साहित किन्तु राजनैतिक तोर पर कमज़ोर वैश्य समाज की तमाम कोशिशो के बाबजूद दावेदारों की दौड़ में मुकेश शर्मा, मनोज सिंह चौहान और सुभाष भाटी जैसे नाम प्रमुखता से उभरे।

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जातीय और आर्थिक समीकरणों में नए चेहरे, पर धरातल पर असमंजस

राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो आर्थिक, सामाजिक और जातीय गणित के लिहाज से मुकेश शर्मा और मनोज सिंह चौहान, पुराने प्रत्याशी सुनील चौधरी या अन्य दावेदार सुभाष भाटी की तुलना में अधिक सक्षम और बेहतर विकल्प माने जा रहे थे।

हालांकि, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के समक्ष अपनी दावेदारी पेश करने वाले मनोज सिंह चौहान अभी तक चुनावी धरातल पर खुलकर सामने नहीं आ पाए हैं। दूसरी ओर ब्राह्मण और शहरी सीट होने के चलते सबसे आगे चल रहे मुकेश शर्मा की उपस्थिति लगातार चर्चा का केंद्र बनी हुई है।

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शुरुआती दौर में मुकेश शर्मा की सक्रियता सराहनीय रही। नवरात्रों के दौरान रामलीला आयोजनों, स्थानीय खेल प्रतियोगिताओं, आरडब्ल्यूए (RWA), पुलिस प्रशासन और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के कार्यक्रमों में उनकी निरंतर उपस्थिति ने यह संदेश दिया कि वे भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता और विधायक पंकज सिंह के सामने एक मज़बूत चुनौती पेश कर सकते हैं।

कार्यकर्ताओं की उपेक्षा बन न जाए एक रणनीतिक भूल?

आशाजनक शुरुआत के बावजूद, अब पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के बीच मुकेश शर्मा की कार्यशैली को लेकर भारी निराशा देखी जा रही है। पार्टी के जमीनी नेताओं का मानना है कि मुकेश शर्मा किसी अपरिपक्व सलाहकारों द्वारा चुनावी प्रबंधन या पीआर (PR) एजेंसी के फेर में फंसकर केवल अपनी ‘सामाजिक छवि’ बनाने तक सीमित रह गए हैं।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो चुनाव से ठीक पहले के 6 महीने किसी भी प्रत्याशी के लिए बेहद संवेदनशील होते हैं। सामाजिक छवि पूरे 5 साल काम आती है, लेकिन चुनाव के निकट आते ही एक नेता को अपनी स्पष्ट ‘राजनीतिक उपस्थिति’ और कैडर आधारित पकड़ दर्ज करानी होती है।

पार्टी में ताजा सबसे बड़ा आक्रोश दीपावली के अवसर पर देखने को मिला है। पार्टी में कार्यकर्ताओं और बूथ अध्यक्षों के बीच चर्चा है कि मुकेश शर्मा की ओर से पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को दिवाली पर सामान्य सम्मान या उपहार तक नहीं पहुंचाया गया, जिससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट रहा है।

पार्टी कैडर में इस बात को लेकर तीखी चर्चा है कि जो दावेदार राम कथा जैसे आयोजनों के नाम पर कुमार विश्वास जैसे बड़े मंचों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं, वही चुनावी युद्ध में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहने वाले बूथ कार्यकर्ताओं और नेताओं की दिवाली पर अनदेखी कर रहे हैं। इसे पार्टी के लोग उनकी ‘राजनीतिक अपरिपक्वता’ का स्पष्ट प्रमाण मान रहे हैं।

क्या हो सकता है इसका परिणाम ?

किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनाव जीतने का मूलमंत्र उसके कार्यकर्ता होते हैं। यदि प्रत्याशी केवल पीआर एजेंसियों के जरिए अपनी छवि चमकाएगा और जमीनी कैडर को उपेक्षित रखेगा, तो भाजपा जैसी कैडर-आधारित पार्टी के खिलाफ जीत दर्ज करना लगभग असंभव हो जाएगा।

इस पूरे प्रकरण पर पक्ष जानने के लिए ‘एनसीआर खबर’ ने मुकेश शर्मा की टीम से संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन त्योहार की व्यस्तता के कारण उनसे संपर्क नहीं हो सका।

फिलहाल, दीपावली के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं में बढ़ा यह आक्रोश मुकेश शर्मा की दावेदारी और समाजवादी पार्टी के चुनावी समीकरणों पर क्या असर डालता है, इसका स्पष्ट रूप 15 नवंबर के बाद दिखाई देने की उम्मीद है। लेकिन इतना तय है कि अगर सपा ने समय रहते अपनी रणनीतिक और अंदरूनी कमियों को दूर नहीं किया, तो नोएडा में एक बार फिर इतिहास खुद को दोहरा सकता है और पंकज सिंह जैसे कद्द्वर नेता को हराने की पार्टी रणनीति फिर औंधे मुह गिर सकती है।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे