राजेश बैरागी । गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के अतीत और वर्तमान में क्या अंतर आया है?कभी भ्रष्टाचार, कर्ज और बाबू शाही के लिए बदनाम रहे जीडीए का वर्तमान नेतृत्व प्राधिकरण की पुरानी छवि को बदलने में पूरा जोर लगा रहा है। यह कहना अतिश्योक्ति हो सकता है कि सबकुछ बदल गया है, परंतु तकनीक और कड़ी निगरानी से बहुत कुछ बदला जा रहा है।
बीते शनिवार को प्राधिकरण में भ्रमण के दौरान एक बुजुर्ग से अनायास भेंट हो गई। उनकी आंखों में चमक और चाल में तेजी थी।वो प्राधिकरण कार्यालय से निकल रहे। पूछने पर उन्होंने बताया कि उन्होंने एक संपत्ति खरीदी है जिसका नामांतरण पत्र उन्हें मिल गया है। मैंने पूछा आवेदन कब किया था? उन्होंने बताया कि आज सुबह। पहले इस प्रकार के काम में 90 दिन का समय निर्धारित था। जनहित और पहल पोर्टल के माध्यम से लोगों को घर बैठे अपनी संपत्ति से संबंधित सभी जानकारी,देय शुल्क का भुगतान तथा आवश्यक अनुमति तथा स्वीकृति भी ऑनलाइन प्राप्त हो जाती है। डिजिटल तकनीक से प्राधिकरण अपने आवंटियों को घर बैठे अधिकतम सेवाओं को उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहा है।

उपाध्यक्ष अतुल वत्स ने बताया कि जीडीए के द्वारा अभी तक डेढ़ लाख संपत्तियां आवंटित की गई हैं। सभी संपत्तियों के आवंटियों को खरीद-बिक्री, नामांतरण, हस्तांतरण, गिरवी रखने की अनुमति, नक्शा पास कराने तथा प्राधिकरण के शुल्कों के भुगतान के लिए चक्कर लगाने पड़ते थे। उन्होंने अपने डेढ़ वर्ष के कार्यकाल में आवंटियों की समस्याओं और उनके प्राधिकरण में अनावश्यक आगमन को रोकने पर ध्यान केंद्रित किया है। इस प्रयास में अपेक्षित सफलता मिल रही है। हालांकि जीडीए भी अन्य प्राधिकरणों की भांति स्वीकृत पदों के विरुद्ध कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है।


