यमुना प्राधिकरण में विकास का संकट: भूमि अधिग्रहण विवाद से निवेशकों का भरोसा डगमगाया, रोनीजा में अधिग्रहण पर विधायक और प्राधिकरण क्यूँ आये आमने-सामने!

आशु भटनागर
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आशु भटनागर । यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) क्षेत्र में औद्योगिक विकास की महत्वाकांक्षाएं एक बार फिर से गहरे होते भूमि अधिग्रहण विवादों की छाया में धँसती जा रही हैं। हाल ही में रबुपुरा के रोनीजा में जेवर के भाजपा विधायक धीरेंद्र सिंह और YEIDA के बीच एक सीधा टकराव इस बात का स्पष्ट संकेत है कि क्षेत्र के औद्योगिक भविष्य पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं। नोएडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के निर्माण की गति के साथ, YEIDA पर औद्योगिक इकाइयों को सक्रिय करने का दबाव बढ़ा है, लेकिन ज़मीनी हकीकत बताती है कि विवादित भूमि के मालिकाना हक़ को लेकर बनी अनिश्चितता बड़े निवेश को आकर्षित करने की सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है। ऐसे में योगी सरकार की नवंबर में होने वाली 5वीं ग्राउंड ब्रेकिंग सेरेमनी में 5 लाख करोड़ के निवेश का लक्ष्य कहीं ठिठक तो नहीं जाएगा इस पर आगे चर्चा करेंगे।

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पिछले पांच वर्षों में, प्राधिकरण ने लगभग 3200 उद्यमियों को औद्योगिक भूखंड आवंटित किए हैं, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, इनमें से केवल 15 ही चालू हो पाए हैं। यह गंभीर विसंगति क्षेत्र में निवेश की बाधाओं को उजागर करती है। निवेशकों और उद्यमियों का मानना है कि इस धीमी गति का मुख्य कारण प्राधिकरण द्वारा आवंटित भूखंडों पर पूर्ण और विवाद-रहित कब्ज़ा नहीं मिल पाना है।

ज़मीनी विवादों का प्रत्यक्ष प्रमाण: रौनीजा गाँव की घटना

यह स्थिति उस घटना से और भी स्पष्ट हो जाती है जो हाल ही में रौनीजा गाँव में देखी गई। जहाँ यमुना प्राधिकरण ने एक बिल्डर को अतिक्रमण में आई भूमि को किसान से खाली कराकर सौंपी थी, वहीं स्वयं भाजपा के जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह मौक़े पर पहुंचे और कानून का उल्लंघन करते हुए किसानों को उनकी ज़मीन पर फिर से कब्ज़ा दिला दिया। विधायक ने पहले एक अंडरपास के नीचे पंचायत बुलाई, जहाँ उन्होंने किसानों की समस्याओं को सुना। इसके बाद, वे किसानों के साथ खेत पर पहुंचे और प्राधिकरण द्वारा एक सप्ताह पहले बिल्डर को दिए गए कब्ज़े को पलटते हुए किसानों को उनकी ज़मीन पर फिर से काबिज़ करवा दिया। आपको याद दिला दें कि 2011 भट्टा पारसोल में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मोटरसाइकिल पर बैठकर ले जाने वाले धीरेन्द्र सिंह ही आज भाजपा से जेवर विधायक हैं

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किसी भी बिल्डर द्वारा किसानों की ज़मीन पर अवैध कब्ज़े का कोई भी प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। विगत दिनों ATS के पास एक बिल्डर द्वारा ग्राम रौनिजा के किसानों की फ़सल को खुर्द बुर्द कर दिया गया था। किसी भी बिल्डर द्वारा किसानों की ज़मीन पर अवैध कब्ज़े का कोई भी प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

सोशल मीडिया पर जेवर विधायक धीरेन्द्र सिंह द्वारा लिखित बयां का एक अंश

किसानों का आरोप है कि उन्हें अभी तक ज़मीन का उचित मुआवज़ा नहीं मिला है और प्राधिकरण ने उनकी आबादी वाली ज़मीन का अधिग्रहण कर एक बिल्डर को आवंटित कर दिया। उन्होंने बताया कि बिल्डर को कब्ज़ा दिए जाने के दौरान उनकी खड़ी फसल भी नष्ट हो गई। यह घटना एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है: जब ज़मीन प्राधिकरण के नाम दर्ज है और उसे विधिवत आवंटित किया गया है, तो एक निर्वाचित प्रतिनिधि द्वारा बलपूर्वक कब्ज़ा वापस दिलवाना किस क़ानूनी अधिकार के तहत आता है? ऐसे में, निवेशकों को किस तरह का सुरक्षा का माहौल मिलेगा?

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भट्टा पारसौल की स्मृतियाँ और निवेशकों का डर

भाजपा जेवर विधायक के इस कदम ने, भले ही स्थानीय किसानों को तत्काल राहत दी हो, परंतु यमुना क्षेत्र में भूखंड ले चुके उद्यमियों में ‘भट्टा पारसौल’ जैसी पुरानी आशंकाओं को फिर से ताज़ा कर दिया है। ‘भट्टा पारसौल’ का नाम सुनते ही यहाँ के पुराने निवेशक चिंतित हो उठते हैं, जब भूमि अधिग्रहण को लेकर भयानक हिंसा हुई थी और जिसने क्षेत्र के विकास को बरसों पीछे धकेल दिया था और तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार में यमुना प्राधिकरण को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में विलय करने के लिए ही डा अरुण वीर सिंह को सीईओ बनाकर भेजा गया था, वो एक अलग बात है कि नै योगी सरकार में उन्ही अरुण वीर सिंह ने इस क्षेत्र को नै पहचान दे दी । किन्तु उनके बाद उद्यमियों का स्पष्ट कहना है कि यदि यमुना प्राधिकरण से ऐसे समाचार फिर से आने लगेंगे जहाँ विधायक ही प्राधिकरण द्वारा कब्ज़ा ली गई ज़मीन को कानून के विरुद्ध जाकर बलपूर्वक वापस लेते दिखेंगे, तो यहाँ उद्योगों का माहौल नहीं बनेगा। असुरक्षित और अनिश्चित वातावरण में कोई भी बड़ा निवेशक जोखिम उठाने को तैयार नहीं होगा।

पूर्ण कब्ज़े का अभाव: एक कड़वा सच

यमुना प्राधिकरण का एक कड़वा सच यह भी है कि वह आज तक उद्यमियों को 100 प्रतिशत भूमि का कब्ज़ा नहीं दे पाया है। चर्चा तो यहां तक है कि पूर्व सीईओ डॉ. अरुण वीर सिंह और जेवर विधायक धीरेंद्र सिंह के बीच इन्हीं बातों को लेकर लम्बे समय तक ‘शीत युद्ध’ जैसा माहौल भी रहा है। कई औद्योगिक इकाइयों को आवंटित भूखंडों पर छोटे-छोटे विवाद या अतिक्रमण बने हुए हैं, जिससे परियोजनाएं शुरू नहीं हो पा रही हैं।

हालात ये हैं कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से भी पहले स्थापित किए जा रहे ‘अपेरेल पार्क’ में भी आज तक अधिग्रहण पूर्ण नहीं है, जिसके चलते कई उद्यमी यहाँ अब उद्योग लगाने के विचार से डरने लगे हैं। उससे भी बड़ी चर्चा ये है कि बाबा रामदेव के फ़ूड पार्क को भले ही 2026 तक पूर्ण करने की डेडलाइन दी गई हो, पर उनको भी पूर्ण भूमि आज तक नहीं दी गई है। फ़ूड पार्क का ज़िम्मा संभाल रहे एक अधिकारी की मानें तो किसानों के साथ अभी भी छोटे-छोटे भूखंडों को लेकर विवाद हैं और ऐसे ही मामलों के चलते यमुना प्राधिकरण के अधिकारी भी उन पर कुछ कहने से बचते हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि प्राधिकरण की कागजी योजनाएं ज़मीनी हकीकत से कितनी दूर हैं।

ऐसा ही मामला मुख्यमंत्री का सपना कही जाने वाली फिल्म सिटी को लेकर भी है, फिल्म सिटी के विकासकर्ता कम्पनी में शामिल बिल्डर के लोगो ने कई बार शिलान्यास न होने के पीछे भूमि के पूर्ण कब्जे को भी ज़िम्मेदार बताया है I दावा तो यहाँ तक है कि 1000 एकड़ में बन्ने वाली फिल्म सिटी इसिलए अब 231 एकड़ में सिमट कर रह गयी है क्योंकि बाकी 700 एकड़ पर कब्जे को लेकर कई बाधाये हैं वरना पूर्व सीईओ तब इसे भी किसी बड़े स्टूडियो के साथ बाकी फिल्म सिटी को बनवाना चाहते थे।

राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और विकास की बाधाएं

यह पूरा परिदृश्य राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्थानीय जन-प्रतिनिधित्व के बीच खींचतान को दर्शाता है। एक ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 2027 के चुनावों में भारी रोज़गार के सृजन और औद्योगिक विकास का हवाला देकर तीसरी बार सत्ता में आने की रणनीति बना रहे हैं, वहीं धीरेंद्र सिंह भाजपा से ही तीसरी बार विधायक तो बनना चाहते हैं, लेकिन संभवतः वे किसानों के प्रति अपना ‘भट्टा पारसौल’ वाला स्वरूप भी नहीं छोड़ना चाहते। यह द्वंद्व विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा बनकर खड़ा है।

प्राधिकरण के वर्तमान सीईओ राकेश कुमार सिंह भले ही 5 औद्योगिक क्लस्टरों पर नोडल अधिकारी नियुक्त कर उद्योगों को आरंभ कराने की रणनीति अपना रहे हों, या उद्यमियों पर पेनाल्टी लगाकर अपनी पीठ थपथपा लें, पर प्रश्न तर्कसंगत है कि असुरक्षित वातावरण में क्या वास्तव में उद्योग लग सकते हैं? उद्यमियों का स्पष्ट मत है कि जब तक राजनीतिक अस्थिरता और ज़मीनी स्तर पर भूमि विवादों का समाधान नहीं होता, तब तक निवेश आकर्षित करना असंभव है और ये प्रश्न नवम्बर में होने जा रही पांचवी ग्राउंड बेर्किंग सेरेमनी से पूर्व बड़ा हो गया है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को यह समझना होगा कि जब तक राजनैतिक इच्छाशक्ति क्षेत्र के विकास में बाधा बनती रहेगी, तब तक यहाँ उद्योगों को लगाना मुश्किल होगा। केवल घोषणाएं और कागजी योजनाएं काफी नहीं हैं। निवेशकों को एक स्थिर, सुरक्षित और विवाद-रहित वातावरण चाहिए, जहाँ उनके निवेश की सुरक्षा सुनिश्चित हो। विधायक और प्राधिकरण के बीच इस तरह की सार्वजनिक भिड़ंत से क्षेत्र में उद्योगों के आने की संभावना कम होती है और मौजूदा उद्यमियों का मनोबल टूटता है। यमुना प्राधिकरण को अपनी भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाना होगा, और यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन किसानों से ज़मीन ली गई है, उन्हें उचित मुआवज़ा और पुनर्स्थापन मिले। तभी जाकर यमुना क्षेत्र का औद्योगिक सपना साकार हो पाएगा, अन्यथा यह केवल फाइलों तक ही सीमित रह जाएगा।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे