आखिरकार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के निर्देश पर नोएडा प्राधिकरण के सीईओ लोकेश एम को हटा दिया। इसी के साथ लोकेश एम नोएडा के पहले ऐसे सीईओ बने जिनके आने पर प्राधिकरण के कर्मचारियों ने ढोल बजवाए तो उनके जाने पर जनसाधारण ने खुशियां मनाई। उनके साथ-साथ ऐसे कथित समाजसेवियों, भूमाफियाओं और खनन माफियाओं ने भी रूप बदल कर खुशियां मनाई जिनके काम लोकेश एम की वजह से अटक गए थे इनमें वह अवैध कालोनियां, अवैध बिल्डिंग, अवैध अतिक्रमण और धारा 10 के नोटिस भी शामिल हैं जिनको तोड़ने के आदेश लोकेश एम में दिए थे।
पर प्रश्न ये है कि क्या लोकेश एम को हटाया जाना सिर्फ एक युवा इंजीनियर की मौत पर पुलिस दमकल और एनडीआरएफ की विफलता के कारण था । अगर मामला पुलिस दमकल और एसडीआरएफ की विफलता का है तो उसके लिए लोकेश एम की जगह प्रशासनिक अधिकारियो भी जाना चाहिए था, अगर मामला प्राधिकरण था तो बस क्यूँ अकेले गए लोकेश एम और क्या सच में उनको हटाये जाने मात्र से युवा इंजीनियर को न्याय मिल गया है ? क्या सिर्फ सीईओ को हटाये जाने से नोएडा प्राधिकरण की भ्रष्ट कार्यशैली में सुधार हो जाएगा या फिर इसमें एक बड़े बदलाव की भी आवश्यकता है जिसका प्रारंभ सरकार में बैठे औद्योगिक मंत्री से होनी चाहिए जिनके बारे में कहा जाता है कि नोएडा सीईओ कि शक्तियां भी उन्होंने ही ले ली है सीईओ बस स्टाम्प लगाने के लिए है।
असल में महीनो से लोगो में उनके खिलाफ माहौल बीते कई माह से बन रहा था इसके राजनीतिक कारण भी थे और लोकेश एम की अव्यवहारिक कार्यशैली भी थी । लोकेश एम लगातार नोएडा के बड़े राजनीतिक सिंडिकेट के संरक्षण में पनपे भू माफिया के बने हुए सिस्टम को समाप्त करने में लगे हुए थे। पर उनकी कार्यशैली से परिणाम सुखद की जगह दुखद होने लगे थे ।टेंडर रोक देने जैसे अव्यावहारिक निर्णयों का असर यह हुआ कि बीते कुछ माह से उनके अधीनस्थ अधिकारियों ने आम जनता के काम रोकने शुरू कर दिए जिससे जनसाधारण के काम रुकने शुरू हो गए और जनाक्रोश लोकेश एम की तरफ हो गया ।
ऐसे में जब सेक्टर 150 में युवा इंजीनियर की मृत्यु पर स्थानीय प्रशासन, पुलिस दमकल, एसडीआरएफ की विफलता के भी चर्चे होने चाहिए थे,नोएडा प्राधिकरण के पुराने पाप सामने आने शुरू हो गए। स्पोर्ट्स सिटी घोटाले की ‘वो परते एक बार फिर से खुलने लगी जिनका दुःस्वप्न (Nightmare) नोएडा प्राधिकरण को चैन से सोने नहीं देता है और जिसके लिए प्राधिकरण को फटकारते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उनके मुंह से भ्रष्टाचार टपकता है। इस पूरे प्रकरण में वह कैलेंडर कांड भी महत्वपूर्ण कड़ी है जो लोकेश एम की सबसे बड़ी गलती बन गया नहीं तो संभवत उनको जाना नहीं पड़ता ।

ऐसे में प्रशासन, पुलिस और जिले के अन्य प्राधिकरणों में सभी सीईओ के लिए खास तौर पर यमुना प्राधिकरण के सीईओ के लिए यह सीख है कि यहां बने रहने के लिए सख्त व्यवहार की जगह व्यावहारिक होना आवश्यक है अगर आप स्वयं में ईमानदार होने का दंभ पालकर लोगों को अपमानित करने की कार्यशाली अपनाते हैं और जनकल्याण के वो कार्य भी नहीं कर पाते हैं जिसके लिए आपको लाया गया है तो आपका जाना भी तय हैं ।


