नोएडा के सेक्टर-168 के पास 16 जनवरी की रात एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की पानी में डूबने से हुई दर्दनाक मौत के मामले में जांच का दायरा अब एक बड़े प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा कर रहा है। शासन के आदेश पर गठित विशेष जांच दल (SIT) आज अपनी विस्तृत रिपोर्ट शासन को पेश करेगी, जिसके बाद दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
सूत्रों के मुताबिक, SIT की जांच में यह स्पष्ट हो गया है कि युवराज की मौत एक सामान्य हादसा नहीं, बल्कि नोएडा प्राधिकरण और पुलिस प्रशासन के सिस्टमेटिक फेल्योर (व्यवस्थागत विफलता) का नतीजा है। जांच रिपोर्ट में कई अहम खामियां और अधिकारियों की उदासीनता को उजागर किया गया है।
रेस्क्यू में देरी पर उठे सवाल
SIT ने इस मामले में नोएडा प्राधिकरण समेत तीन विभागों से 22 से अधिक सवाल पूछे हैं। जांच का सबसे अहम बिंदु यह है कि घटना के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन में करीब 2 घंटे की देरी क्यों हुई? इस सवाल का जवाब देने में अधिकारी असमर्थ नजर आए। जांच में पाया गया कि घटनास्थल पर पुलिस के बाद अग्निशमन विभाग की टीम पहुंची, लेकिन कर्मचारियों ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि उन्हें तैरना नहीं आता और उनके पास आवश्यक उपकरण भी नहीं हैं।
अधिकारियों की उदासीनता की पराकाष्ठा
जांच रिपोर्ट में जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों की लापरवाही भी उजागर हुई है, नोएडा की जिलाधिकारी मेधा रूपम, जो जिले की डिजास्टर मैनेजमेंट हेड भी हैं, ने घटना के बाद कोई विभागीय एक्शन नहीं लिया। हैरानी की बात यह है कि घटना से एक दिन पहले ही उन्होंने आपदा प्रबंधन को लेकर एक बैठक की थी, इसके बावजूद वह एसआईटी के साथ मौके पर चौथे दिन पहुंचीं और उन्होंने पीड़ित परिवार से बात तक नहीं की।

नोएडा शहर के रखरखाव की जिम्मेदारी प्राधिकरण के सीईओ की होती है। जांच में पाया गया कि जिस प्लॉट के पास हादसा हुआ, उस रोड के कट की फाइल अप्रूव होने के बाद भी काम आगे नहीं बढ़ाया गया। सीईओ ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों से इसका फॉलो-अप नहीं लिया, जो उनकी प्रमुख जिम्मेदारी थी।
ट्रैफिक और ड्रेनेज सिस्टम की खुली पोल
जांच में प्लानिंग और हेल्थ के अतिरिक्त दो अन्य विभागों की भूमिका भी संदिग्ध पाई गई है, नोएडा ट्रैफिक सेल के जीएम एसपी सिंह की भूमिका अहम मानी जा रही है। एनटीसी (नोएडा ट्रैफिक कंट्रोल) की जिम्मेदारी ब्लैक स्पॉट को चिह्नित करना और वहां रिफ्लेक्टर, साइन बोर्ड और सुरक्षा मानकों को लागू करना था, जो नहीं किया गया। जल सीवर के जीएम आरपी सिंह की जिम्मेदारी नोएडा की ड्रेनेज व्यवस्था को दुरुस्त रखना था। जांच में पाया गया कि जिस प्लॉट में हादसा हुआ, उसमें करीब 12 सोसाइटी के 10 हजार से ज्यादा लोगों के सीवर का पानी जमा हो रहा था, जिसकी निगरानी नहीं की गई।
पुलिस रिस्पांस पर भी सवाल
हादसे के बाद सबसे पहले पुलिस मौके पर पहुंची थी। हालांकि, डायल-112 का रिस्पांस टाइम विजिबिलिटी के अनुसार सही था, लेकिन स्थानीय थाना प्रभारी (एसएचओ) सर्वेश सिंह मौके पर नहीं पहुंचे। न ही उन्होंने अपने स्तर से रेस्क्यू ऑपरेशन की सही मॉनिटरिंग की या वरिष्ठ अधिकारियों को तत्काल सूचना दी।
आगे की कार्रवाई
SIT की रिपोर्ट मिलने के बाद शासन इस मामले में कड़ा रुख अपना सकता है। रिपोर्ट में जिन अधिकारियों को दोषी माना गया है, उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई और एफआईआर दर्ज करने की तैयारी है। नोएडा के निवासियों को अब इस रिपोर्ट के आधार पर होने वाली कार्रवाई का इंतजार है, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही से किसी और की जान न जाए।


