आशु भटनागर । नोएडा के चर्चित सेक्टर 150 में युवराज मेहता की मृत्यु के लगभग 13 दिन बाद उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के सबसे बड़े समाजवादी नेता अखिलेश यादव नोएडा आए । अखिलेश यादव के नोएडा आगमन की सूचना नोएडा के निवासियों को हुई तो लगा कि अखिलेश यादव युवराज मेहता के पिता से उनका दुख बांटने आ रहे होंगे, किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ । 5 दिन पूर्व उनके चाचा रामगोपाल यादव की तरह ही वह भी अपने कार्यकर्ताओं के घरों तक गए, उनके और उनके परिवारों के साथ फोटो खिचवाये और उसके बाद यहां से निकल गए ।

अखिलेश यादव नोएडा निवासियों से ही नहीं, नोएडा के पत्रकारों से भी दूरी बनाते दिखाई दिए। इसके बाद यह प्रश्न उठा कि आखिर यह नोएडा में अखिलेश यादव की कोई सोची समझी रणनीति थी या फिर कोई ऐसी मजबूरी थी जिसके चलते हर बार की तरह अखिलेश यादव एक बार फिर नोएडा के शहरी सवर्ण निवासियों से दूर दिखाई दिए । दरअसल गौतम बुध नगर जिले में अक्सर समाजवादी पार्टी पर ये आरोप लगते रहते हैं कि यहाँ वह सिर्फ यादव, गुर्जरों और ग्रामीण समाज के नेताओं की पार्टी बनकर रह गई, जबकि नोएडा का परिवेश लगातार शहरी होता जा रहा है और पार्टी उस पर कभी भी कोई ध्यान नहीं देती है । गौतम बुध नगर जिला संगठन में शहरी प्रतिनिधित्व शून्य है शहरी प्रतिनिधि के नाम पर सेक्टर में रहने वाले जाति विशेष के स्थानीय लोगों को ही पद दे दिए जाते हैं। जबकि नोएडा महानगर में बीते दो बार से शहरी चेहरे को अध्यक्ष बनाया तो पहली बार में ही लगभग 25 हजार वोटो की बढ़ोतरी भी हुई जिसे अब फिर से जातीय संकीर्णता में इग्नोर किया जा रहा है।
ऐसे में नोएडा के सेक्टर 150 में युवराज मेहता की मृत्यु के बाद अखिलेश यादव द्वारा दिए गए बयानों से ऐसा लग रहा था कि संभवतः अखिलेश यादव शहरी सवर्ण समाज के साथ कोई संवाद करने की कोशिश करेंगे । घटना के चार दिन बाद घटनास्थल पर गए समाजवादी पार्टी के जिला अध्यक्ष सुधीर भाटी ने दावा भी किया था कि जल्द ही अखिलेश यादव युवराज मेहता के पिता से मुलाकात करेंगे ।

फिर ऐसा क्या हुआ कि अखिलेश यादव नोएडा क्षेत्र में तो आए किंतु युवराज के पिता से मिले बिना चले गए। क्या इसका कारण युवराज और उसके पिता का सवर्ण होना था क्या अगर पीड़ित अखिलेश यादव के पीडीए फार्मूले में आने वाली जातियों खासतौर पर गुर्जर और यादव समुदाय से होता तो भी अखिलेश यादव इतनी ही दूरी बनाते ?



इस पूरे घटनाक्रम से मायूस पर बचाब में आये पार्टी के सवर्ण नेताओं की माने तो बीते कुछ दिनों में यूजीसी में ओबीसी को शामिल करने के बाद स्वर्ण द्वारा किए गए विरोध को देखते हुए अखिलेश यादव ने अपने कोर वोटर के साथ रहना ही उचित समझा है और फिलहाल स्वर्ण समाज से दूरी बना ली है। वहीं नाम न छापने की शर्त पर कुछ सपा कार्यकर्ताओं का यह भी दावा है कि चूंकि नोएडा में अखिलेश यादव के निर्देश पर 2027 के शंखनाद के लिए गुर्जर महापंचायत को पीडीए रैली में बदलने का जुम्मा एक ऐसे नेता को दिया गया है जिसकी सवर्णों से के प्रति नफरत आम है तो उक्त नेता ने अखिलेश यादव को वहां जाने की सलाह नहीं दी।

सुच कुछ भी हो पर इसका आंकलन आप ऐसे भी कर सकते हैं कि 3 दिन पहलेयूजीसी के नियमों के प्रति सवर्णों के प्रतिकार पर मीडिया के प्रश्नों पर बचते हुए अखिलेश यादव कुछ भी स्पष्ट कहने से बचते रहे, उन्होंने सिर्फ निर्दोषों को बचाने की बात कही । ऐसे में 28 मार्च को पीडीए के नाम पर होने वाली गुर्जर महापंचायत से महज 50 दिन पूर्व अखिलेश यादव का नोएडा आकर गुर्जर समाज के नेताओं के यहां तक जाना उनकी रणनीति और राजनैतिक मजबूरी दोनों को दर्शाता है ।
ऐसे में यह प्रश्न अब इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पीडीए में पी का मतलब कभी पिछड़ा कभी पीड़ित बताने वाले समाजवादी अगर पीड़ित में स्वर्ण या ओबीसी और दलित का भेदभाव करने लगे हैं तो राजनीतिक तौर पर यह उस सोच का विस्तार है जिसमें पार्टी एक खास वर्ग को अछूत मनाना शुरू कर चुकी है।
तो क्या भाजपा से खार खाए बैठे स्वर्ण को अपने साथ लेने न लेने की गलती अखिलेश यादव को रणनीतिक तौर पर आगे जाकर भारी पड़ सकती है जिसका असर उन्हें फिलहाल भले ही महसूस ना हो पर उन्हें 2027 में दिखाई पड़ेगा ?
इसका उत्तर भले ही भविष्य में छिपा है पर अगर हां में हुआ तो संभवतः उसके बाद भाजपा पर वोट चोरी और डाटा चोरी के आरोप लगाने के अलावा उनके ऐसे विशेष सलाहकार कोई और सलाह दे नहीं पाएंगे। क्योंकि किसी भी देश की राजनीति उसके नेताओं के समावेशी सोच से जागृत होती है अगर नेता ही की सोच ही संक्रीण हो जाएगी तो समाज का बिखराव और नेता की हार दोनों तय हैं।


