आशु भटनागर। 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही उत्तर प्रदेश राजनैतिक चक्रव्यूह के लिए तैयार हो गया है। समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपनी चुनावी तैयारियों को तेज करते हुए प्रदेश भर में ‘पीडीए रैली’ का आयोजन करने का ऐलान किया है। इस अभियान की शुरुआत 28 मार्च को नोएडा के दादरी से होगी, जहां पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव रैली को संबोधित करेंगे।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, दादरी से शुरू होने वाली यह रैली प्रदेश के सभी जिलों में आयोजित की जाएगी। नोएडा से इस अभियान की शुरुआत को सपा की एक बड़ी रणनीतिक पहल माना जा रहा है। दरअसल, पार्टी इस क्षेत्र को अपना कमजोर गढ़ मानती है और यहां से मजबूती का संदेश देना चाहती है। पर क्या ये सन्देश अखिलेश यादव के लिए कहीं राजनैतिक दुःस्वप्न तो नहीं बन्ने जा रहा है, इस पर चर्चा से पहले समझते है समाजवादी पार्टी की 2027 की चुनावी राजनीती।
पुराने ‘टोटके’ पर भरोसा, विशेषज्ञ खड़े कर रहे सवाल
समाजवादी पार्टी के चुनावी रणनीतिकारो की माने तो पार्टी में नेताओ का तर्क यह है कि 2012 में अखिलेश यादव ने नोएडा से ही अपनी प्रसिद्ध साइकिल यात्रा की शुरुआत की थी, जिसके बाद सपा सत्ता में आई थी। ऐसे में, दो बार लगातार भाजपा से चुनाव हारने के बाद पार्टी उसी ‘टोटके’ के सहारे एक बार फिर नोएडा से अभियान की शुरुआत को शुभ संकेत मान रही है। राजनीतिक विश्लेषक इस कदम को अखिलेश यादव के सलाहकारों का एक ‘अंध विश्वास’ बता रहे हैं।
2024 के बाद 2027 में भी सवर्ण विरोधी पीडीए (PDA) फॉर्मूले से सफलता की चुनौती!
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यादव वोटरों की संख्या काफी कम है, यहाँ मुस्लिम और दलित वोट बैंक निर्णायक है। सपा इसी का फायदा उठाना चाहती है और अखिलेश यादव के सवर्ण विरोधी ‘पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक’ (PDA) फॉर्मूले के तहत इन वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रही है।
इस रैली के जरिए सपा पश्चिमी यूपी में मुस्लिम और दलित वोट बैंक को साधने की तैयारी में है। इसके लिए गुर्जर समाज से आने वाले सपा प्रवक्ता राजकुमार भाटी को पश्चिम की जिम्मेदारी सौंपी गई है। भाटी दावा कर रहे हैं कि इस रैली के बाद 11 अन्य जिलों में भी ऐसी ही रैलियां की जाएंगी।
नेतृत्व का ‘जातिवादी’ दांव और अंदरूनी कलह
बस यहीं पर अखिलेश यादव के लिए राजनीतिक चक्रव्यूह कठिन हो जाता है। राजकुमार भाटी की पहचान सवर्ण विरोधी एक जातिवादी नेता की रही है, देहात मोर्चा से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफर तीन दशक से गुर्जर समुदाय के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। गुर्जर बाहुल्य दादरी में तीन बार चुनाव हार चुके भाटी ने 2024 में ‘पीडीए’ फॉर्मूले के बाद खुद को बहुजन राजनीति में बदलने की कोशिश की है, लेकिन पश्चिम से श्रीगणेश करने वाली इस रैली के सूत्रधार होने के बावजूद वह अभी भी गुर्जर समुदाय के इर्द-गिर्द ही घूमते नजर आ रहे हैं। बीते कुछ माह से वो पीडीए की जगह गुर्जर समुदाय की बात करते ही दिख रहे है। सवर्णों के प्रति उनकी नफरत हंमेशा ही चर्चा का विषय रही है इसे आप नोएडा के सेक्टर 150 में युवराज मेहता काण्ड में दुरी से भी समझ सकते है।
जानकारों की मानें तो पश्चिम में गुर्जरों का एक बड़ा तबका राजकुमार भाटी के खिलाफ है। पार्टी के अंदर ही अतुल प्रधान और पार्टी के बाहर भाजपा में नरेंद्र भाटी और सुरेंद्र सिंह नागर जैसे कद्दावर नेता उनके विरोध में खड़े हैं। वहीं, सहारनपुर के बड़े गुर्जर नेताओं ने भी राजकुमार भाटी को वह महत्व कभी नहीं दिया जिससे उन्हें समुदाय का नेता माना जा सके।
मुस्लिम और दलित नेताओं में असंतोष
सपा की इस ‘पीडीए’ रैली में गुर्जर समुदाय को मिल रही प्राथमिकता के चलते पश्चिम के दलित और मुस्लिम नेताओं में असंतोष है। पश्चिम की सबसे बड़ी और एक मात्र मुस्लिम नेता इकरा हसन के सामने मुस्लिम समाज में एआईएमआईएम (AIMIM) नेताओं को उतारने की चर्चा से हलचल है, बिहार और महाराष्ट के बाद एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश की मुस्लिम सीटो पर पुरे दमखम से उतरने को तैयार है। जिससे मुस्लिम समाज में अखिलेश यादव के प्रति दुरी की सोच बढ़ रही है।
वहीं, दलितों में यादव और गुर्जर समुदाय को लेकर एक ‘दबंग’ समाज की छवि रही है। अधिकांश मामलों में प्रताड़ना करने वाले समुदाय की रही है और पीडीए के दावो के बाबजूद वो उनको स्वीकारने को तैयार नहीं है। ऐसे में, सिर्फ गुर्जर नेताओं के मंच पर दिखाई देने के चलते क्या ‘पीडीए’ सही में काम कर पाएगा, यह एक बड़ा प्रश्न बना हुआ है।
सवर्ण वोटरों की नाराजगी और अखिलेश की मुश्किल
बीते दो हफ्तों में ‘यूजीसी’ और ‘घूसखोरी पंडित’ जैसे फिल्म विवादों के बाद सवर्ण, खासकर ब्राह्मणों की आक्रामकता ने अखिलेश यादव को बैकफुट पर ला दिया है। दरअसल, अखिलेश का ‘पीडीए’ आंदोलन सवर्ण विरोध पर टिका हुआ था। अखिलेश यादव की 2024 की राजनीति ‘पीडीए’ के जरिए सवर्ण विरोधी राजनीति को ही साथ लेकर चल रही थी, जिसमें पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक को सवर्णों के खिलाफ एकजुट किया जा रहा था। लोकसभा चुनावों में भाजपा और सवर्ण दोनों ही इसको समझ नहीं पाए थे।
लेकिन 2027 आते-आते यह समीकरण अब अखिलेश यादव के लिए नुकसानदेह साबित होता नजर आ रहा है। बीते एक हफ्ते में जिस तरीके से पहले यूजीसी और उसके बाद ‘घूसखोरी पंडित’ फिल्म पर सवर्णों के आक्रामक आक्रोश ने उत्तर प्रदेश की राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया है, उसमें अखिलेश यादव बैकफुट पर नजर आ रहे हैं।
अखिलेश की बेबसी इन दोनों ही मुद्दों पर आप ऐसे समझ सकते हैं कि वो दोनों ही मुद्दों पर खुलकर कुछ नहीं कह पाए यूजीसी के मामले पर जहां वह “किसी भी पक्ष के साथ अन्याय ना हो” की बात कह कर बचते दिखे तो “घूसखोर पंडित” फिल्म विवाद पर अखिलेश यादव का यह बयान कि “ऐसे विवाद जानबूझकर भाजपा खड़े कर रही है जिसमें ना समर्थन कर सकते हैं ना विरोध” उनकी मनोस्थिति को दर्शा रहा है ।
पूरे प्रकरण पर उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने जिस तरीके से एफआईआर दर्ज करा कर बाजी मारी है उससे भी अखिलेश यादव पर सवर्णों में कोई विश्वाश नहीं कर पा रहा है।
समाजवादी पार्टी की यह रैली भले ही पिछड़े, मुस्लिम और दलित समाज में समानता और भाईचारे का संदेश दे रही हो, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि जिस तरह से पार्टी नेतृत्व ने गुर्जर नेताओं को प्राथमिकता दी है और सवर्ण वोटरों को नाराज किया है, उससे यह अभियान सपा के लिए सवर्ण विरोधी राजनीती के परिद्रश्य में उलटा पड़ सकता है। अब देखना यह है कि अखिलेश यादव इस रणनीति के जरिए पश्चिमी यूपी के समीकरणों को कितना साध पाते हैं।


