आशु भटनागर । 2027 के चुनाव में अब बस 1 वर्ष का समय बचा है ऐसे में उत्तर प्रदेश में दो बार से काबिज योगी सरकार के समक्ष अपना रिपोर्ट कार्ड देने की जवाबदेही खड़ी हो गई है । चुनावी वर्ष है तो अब जहां एक और सरकार अपनी योजनाओं को जोर-शोर से बता रही है वही उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा निवेश जाने का दावा करने वाले यमुना प्राधिकरण आंकड़ों में अव्वल किन्तु जमीन पर शून्य दिखाइए दे रहा है। आने वाले कुछ दिनों में हम यमुना प्राधिकरण में विकास का ढोल बजा रही उन सभी योजनाओं की सच सामने लाएंगे जिनको समय से पूरा हो जाना चाहिए था किंतु अब तक सब आंकड़ों में ही हो रहा है ।
इन सब में सबसे पहला नंबर यमुना प्राधिकरण के सबसे पहले क्लस्टर और बहूप्रतीक्षित अपेरल पार्क का है । जो यमुना प्राधिकरण के अधिकारियों कर्मचारियों की लालफीताशाही की भेंट चढ़ चुका है।
2015 में शुरू हुए इस अपेरल पार्क क्लस्टर से लाखों रोजगार सृजन होने के दावे किए जाते रहे हैं। किंतु 10 वर्ष बाद भी स्थिति भयावह है । एनसीआर खबर को मिली जानकारी के अनुसार 175 एकड़ भूमि पर अपेरल पार्क को विकसित किया जाना था। इनमें अलग-अलग आकार के कुल 173 औद्योगिक भूखंड बनाए गए थे। जिन्हें अपेरल पार्क और टेक्सटाइल क्षेत्र से जुड़ी इकाइयों को आवंटित किया जाना था। किंतु 10 वर्षों के बावजूद लंबे इंतजार के बावजूद 156 भूखंड की आवंटित किए जा सके, 17 भूखंडों पर आज तक जद्दोजहद जारी है। हैरानी की बात यह है कि 156 में मात्र 106 इकाइयों के पक्ष में अभी तक लीजडीड निष्पादित की गई है जबकि सिर्फ 89 निवेशकों को कब्जा दिया गया है । लालफीता सही से परेशान उद्यमियों का कहना है कि बड़े-बड़े वादों को जमीन पर उतरने का सच सिर्फ इतना है कि अब तक बस 15 इकाईयो का निर्माण कार्य शुरू हो पाया है ।
प्राधिकरण के अधिकारियों की कार्यशाली किस तरीके से टालमटोल की है इसे आप बीते 8 महीने से प्लॉट कब्जे न मिलने वाले प्लॉट के कब्जे को लेकर उद्यमियों की बेबसी से समझ सकते हैं । जानकारी के अनुसार भूमि पर कब्जा न होने के कारण कई प्लॉट्स को उनकी लोकेशन से शिफ्ट किया गया और इसमें भी उद्यमियों के साथ ही खेल कर दिया गया । उद्यमियों की माने तो प्लॉट शिफ्टिंग के बाद होना यह चाहिए था कि जिस उद्यमी का प्लॉट जिस लोकेशन पर था उसी तरीके की लोकेशन में उसे दिया जाता। किंतु इन उद्यमियों को लकी ड्रा के जरिए दिसंबर के अंतिम दिन फिर से नई लोकेशन पर प्लॉट दे दिए गए जिससे जिन उद्यमियों को कॉर्नर का प्लॉट मिला था उनके प्लॉट बीच में आ गए । उद्यमियों के दावा है कि वह सीईओ के पास समाधान के लिए जाते जरूर हैं किंतु हर बार उनको बस आश्वासन मिलता है और मिल जाती है एक नई तारीख।
प्राधिकरण के सूत्रों का कहना है कि सारे खेल के पीछे असली कारण उद्योगपतियों को समय से भूमि ना दे पाना रहा है । प्राधिकरण ने उद्योगपतियों को प्लॉट पर लौट कर दिए किंतु किसानो के 7% के झगड़ा नहीं निपटा पाया स्थिति इतनी भयावह है कि जेवर से भाजपा के ही विधायक धीरेंद्र सिंह किसानों के मामलों को 2025 में विधानसभा में औद्योगिक विकास मंत्री के समक्ष रखते हैं और उस पर भी ठोस कार्यवाही नहीं हो पाती है। दावा किया जाता है कि प्राधिकरण के सीईओ और जेवर विधायक के बीच शीत युद्ध जैसे हालात है। विधायक आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले किसानो को उनका हक़ दिलाने के लिए बेताब है ताकि उनको वोट मिलने में समस्या न आ सके कितु सफल नहीं हो पा रहे है।
ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि अपेरलपार्क के भरोसे उत्तर प्रदेश के विकास का दावा कर रही सरकार कब तक यहां उद्योगों को लगा पाएगी और कब तक लोगों को रोजगार दे पाएगी । कब अधिकारियों की कार्यशैली में बदलाव होगा सरकार को यह तय करना होगा।


