राग बैरागी : तीसरा विश्वयुद्ध रूस यूक्रेन के लिए नहीं कुत्तों से प्यार और नफरत की बुनियाद पर लड़ा जाएगा

राजेश बैरागी
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राजेश बैरागी I मनुष्य और कुत्ते के संबंध इस युग के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। गांव गली से लेकर महानगरों की गगनचुंबी इमारतों तक मनुष्यों और कुत्तों के बीच संघर्ष चल रहा है। कुत्तों को पालने, उनके रखरखाव के लिए नियम बनाए जा रहे हैं। देश का सर्वोच्च न्यायालय तक कुत्तों और मनुष्यों के संघर्ष पर चिंता व्यक्त कर चुका है। हाईराइज सोसायटी की ऊपर नीचे ले जाने वाली लिफ्ट दोनों के संघर्ष का अखाड़ा बन गयी हैं। क्या कुत्ते वास्तव में मानव के लिए समस्या बन गये हैं?

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कुछ सुधी पाठकों ने इस ज्वलंत विषय पर मुझसे मेरा नजरिया पेश करने की अपेक्षा की है। मेरी स्मरण शक्ति जहां तक जाती है, वहां तक मैं मनुष्य और कुत्ते के सह अस्तित्व से परिचित होता हूं। महाभारत काल में कुत्ता कई स्थानों पर उपस्थित था। मुंशी प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ कहानी का नायक और झबरा नामक कुत्ता एक दूसरे के पर्याय हैं, बल्कि सर्द रात में नायक कुत्ते को कंबल में अपने साथ सुलाकर ही अपनी जीवन रक्षा कर पाता है। समय के साथ कुत्ते का मनुष्य के जीवन में स्थान और गहरा होता गया। मनुष्य उसपर मकान, दुकान,बंगले की भांति घमंड करने लगा।

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कविवर गिरधर ने महिलाओं के कुत्ता प्रेम से चिढ़कर चार पंक्तियां ही लिख डालीं,-अली भली घूमन चली,कर सोलह श्रृंगार, पिल्ला लीना गोद में,मोटर भयी सवार,मोटर भयी सवार मियां मचावे तौबा तिल्ला,पूत धाय की गोद, बीवी खिलावे पिल्ला।’

स्टेट्स सिंबल बन रहे कुत्तों से चिढ़ना भी एक समस्या है। ऐसे पट्टेधारी कुत्तों के स्वामियों की नासमझ हरकतें भी असहनीय हैं। उनके द्वारा त्यागे जाने वाले मल-मूत्र के लिए कोई अन्य भुक्तभोगी क्यों बने। विशेष नस्ल के हिंसक कुत्तों को सामान्य नागरिकों को पालने की क्या आवश्यकता है? सड़कछाप कुत्ते भी समस्या हैं। दिलचस्प बात यह है कि सड़कछाप कुत्तों को लेकर मनुष्य मनुष्य से लड़ रहा है। यहीं से डॉग लवर्स और डॉग हेटर्स की 21 वीं सदी की सबसे ताजातरीन कहानी शुरू होती है।

कुछ विद्वानों का अनुमान है कि तीसरा विश्वयुद्ध रूस यूक्रेन के लिए नहीं कुत्तों से प्यार और नफरत की बुनियाद पर लड़ा जाएगा। कुत्ता लख चौरासी जीव योनियों में ज्ञात सर्वाधिक वफादार और समझदार जीव है।यह मनुष्य के सबसे निकट भी है। उसकी बढ़ती जनसंख्या से वह खुद परेशान है जैसे मनुष्य अपनी बढ़ती जनसंख्या से है। मनुष्य अपनी बढ़ती जनसंख्या को स्वयं नियंत्रित कर सकता है। कुत्तों को अपनी जनसंख्या नियंत्रण के लिए मनुष्य की सहायता की आवश्यकता है।यह मदद नफरत से नहीं की जा सकती है। इसके लिए कुत्तों के प्रति सहानुभूति और संवेदनशील होना चाहिए। क्या हम ऐसा कर सकते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में मनुष्य और पशुओं के सह अस्तित्व का मर्म छिपा है।

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राजेश बैरागी बीते ३५ वर्षो से क्षेत्रीय पत्रकारिता में अपना विशिस्थ स्थान बनाये हुए है l जन समावेश से करियर शुरू करके पंजाब केसरी और हिंदुस्तान तक सेवाए देने के बाद नेक दृष्टि हिंदी साप्ताहिक नौएडा के संपादक और सञ्चालन कर्ता है l वर्तमान में एनसीआर खबर के साथ सलाहकार संपादक के तोर पर जुड़े है l सामायिक विषयों पर उनकी तीखी मगर सधी हुई बेबाक प्रतिक्रिया के लिए आप एनसीआर खबर से जुड़े रहे l