अंजना भागी । यह कहावत आज के समय में पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होती है। घोषणाओं का जादू सर चढ़कर बोल रहा है, पर प्रश्न यह है — जवाबदेही कहाँ है? सच कहाँ है? यदि व्यवस्था केवल “घोषणा पर घोषणा” तक सीमित रह जाए और हर बार यह विश्वास दिलाया जाए कि तस्वीर बदल दी जाएगी, तो नागरिक कब तक प्रतीक्षा करें?
सेक्टर 11 और 12 के बीच की मुख्य सड़क इसका जीवंत उदाहरण है। पहले ही पर्याप्त चौड़ी न होने वाली सड़क को सेंट्रल वर्ज बनाकर दो भागों में बाँट दिया गया। फिर पुरानी सड़क को चौड़ा करने हेतु उसके साथ मिला कर सड़क की एक और सतह डाल दी गई है पुरानी सड़क तो बहुत ऊंची है नई की पहली ही परत है आप सब समझ सकते हैं परिणामस्वरूप आधी सड़क ऊँची और आधी नीची हो गई है। लगभग प्रतिदिन दोपहिया वाहन चालक फिसलते हैं, लोग घायल होते हैं। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि सुरक्षा का गंभीर प्रश्न है।
घायल व्यक्ति जब ज़मीन से उठने की कोशिश करता है, तो सामने उसे चमचमाता प्रवेश द्वार दिखाई देता है — ऊँचे गेट, रोशनी और उनमें सजी तस्वीरें। उस क्षण उसके मन में क्या उठता होगा? क्या यही विकास है?
नोएडा दिन-रात सक्रिय रहने वाला शहर है। रात की शिफ्ट में काम पर जाने वाले और सुबह लौटने वाले नागरिक अंधेरे में इसी सड़क से गुजरते हैं। जब वे ऊँच-नीच सड़क पर गिरते हैं और ऊपर देखते हैं, तो प्रतीकात्मक सजावट दिखाई देती है — पर सुरक्षित मार्ग नहीं।
विकास का प्रमाण पोस्टर, रोशनी या भव्य संरचनाएँ नहीं होतीं। असली प्रमाण वह ज़मीन है जिस पर नागरिक सुरक्षित चल सकें।
हर सेक्टर, सामाजिक संस्था और आरडब्ल्यूए की प्राथमिक जिम्मेदारी पारदर्शी वित्तीय व्यवस्था, स्पष्ट कार्य-विवरण और निवासियों के प्रति जवाबदेही है। यदि खाते में पर्याप्त धनराशि उपलब्ध है, तो पहले ठोस परिणाम दिखने चाहिए — विकास की शुरुआत कार्य से होनी चाहिए, घोषणा से नहीं।

वार्षिक आम सभा (AGM) प्रचार का मंच नहीं, बल्कि जवाबदेही का अवसर है। वहाँ स्पष्ट बताया जाना चाहिए —
कितना धन प्राप्त हुआ,
कहाँ व्यय हुआ,
आगे की प्राथमिकताएँ क्या हैं,
और नागरिकों की सहभागिता कैसे सुनिश्चित होगी।
यदि किसी संस्था की कार्यप्रणाली “लाओ पैसे और लो काम” जैसी हो जाए, तो पारदर्शी प्रक्रिया और स्पष्ट नियमों की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। विश्वास का आधार केवल पारदर्शिता है।
नोएडा के कुछ सेक्टर — 14, 15, 17, 21 और 25 — यह दर्शाते हैं कि विवेकपूर्ण संसाधन प्रबंधन और सामूहिक निर्णय से विकास संभव है, वह भी नागरिकों पर बिना अनावश्यक आर्थिक बोझ डाले।
जहाँ वर्षों तक सीमित लोग पदों पर बने रहें, संवाद की जगह घोषणाएँ हों और परिणामों की बजाय प्रतीक अधिक दिखाई दें, वहाँ नागरिकों में उदासीनता स्वाभाविक है। “एक प्लॉट — एक वोट” जैसे नियम इसी संतुलन को स्थापित करने की दिशा में कदम हैं। कम मतदान प्रतिशत भी कहीं न कहीं विश्वास की कमी को दर्शाता है।
लोकतंत्र में पद सम्मान का नहीं, जिम्मेदारी का विषय है। अधिकार के साथ जवाबदेही अनिवार्य है। स्थानीय संस्थाओं को अधिकार इसलिए दिए गए कि समस्याओं का समाधान जमीनी स्तर पर हो सके — न कि केवल प्रतीकात्मक बदलाव दिखाने के लिए।
सत्य सदैव अकेला होता है। लेकिन यह भी सत्य है कि सत्य के साथ ही नारायण होते हैं इसीलिए सत्यमेव जयते कहा गया है “सत्यमेव जयते” केवल आदर्श वाक्य नहीं, सामाजिक व्यवस्था का मूल है। सुधार टकराव से नहीं, जागरूकता से आता है। व्यक्ति नहीं, व्यवस्था महत्वपूर्ण है। प्रचार नहीं, परिणाम महत्वपूर्ण है।
सामाजिक संस्थाएँ ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ वरिष्ठ नागरिक सम्मानित महसूस करें और आमजन सुरक्षा व संतोष का अनुभव करें। विकास वही है जो नागरिक को सुरक्षित, सम्मानित और संतुष्ट बनाए।
अन्यथा घोषणाओं में तो जैगुआर की टूटी से भी पानी बहता प्रतीत होगा, पर वास्तविकता में नल सूखा रहेगा।
अंततः प्रश्न यही है —
क्या किसी फ्रीहोल्ड प्लॉट वाले खुले सेक्टर को गेटेड सोसायटी में बदला जा सकता है, विशेषकर तब जब वह महत्वपूर्ण सार्वजनिक मार्गों से जुड़ा हो?
सोचने का विषय स्पष्ट है —
विकास प्रतीकों से नहीं, प्राथमिकताओं से पहचाना जाता है।
अंजना भागी पत्रकार, समाजसेवी और सेक्टर 11 की पूर्व RWA अध्यक्ष हैं, विभिन्न समाचार पत्रों के लिए नियमित कालम लिखती है।


