आशु भटनागर। हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणामों के बाद भारतीय राजनीति में एक नई हलचल देखने को मिल रही है। तीन राज्यों, विशेषकर पश्चिम बंगाल में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी कार्यालय पर दिए अपने संबोधन में स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि भाजपा का अगला बड़ा एजेंडा 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी लगातार दो बार सत्ता में है, जिसे चुनौती देने के लिए समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। बंगाल में ममता बनर्जी की जीत की आस लगा रहे अखिलेश यादव को ममता बनर्जी के हारने से बड़ा झटका लगा है । सोमवार को बंगाल में ममता बनर्जी के चुनाव हारने के बाद मंगलवार को सुबह ही अखिलेश यादव को हनुमान जी याद आ गई और उन्होंने बड़े मंगल के दिन सबसे पहले लोगों को शुभकामनाएं दी। इसको ममता बनर्जी के एंटी जय श्री राम, एंटी हिन्दू राजनीती का सबक भी माना जा रहा है ।सोशल मीडिया पर लगातार डॉ लक्ष्मण यादव, राजकुमार भाटी, सूर्य समाजवादी जैसे लोगों को पार्टी से दूर रखने की प्रार्थना अखिलेश यादव से की जा रही है ताकि इनके चलते समाजवादी पार्टी में आने वाला हिंदू वोट ना छिटक जाए ।

किंतु इस सबके बीच सबसे बड़ा फैक्टर कांग्रेस के राहुल गांधी जिन पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है दरअसल बंगाल में ममता बनर्जी की हार के पीछे जो एक बड़ा कारण कोई नहीं देख पा रहा है वह कांग्रेस और राहुल गांधी भी है पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की हालिया राजनीतिक चुनौतियों और वहां कांग्रेस द्वारा अपनाई गई रणनीति ने उत्तर प्रदेश की राजनीति के समीकरणों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। 2024 में लोकसभा चुनावों के समय ही ममता बैनर्जी ने जिस तरह इंडिया ब्लाक से खुद को अलग किया था और कांग्रेस को चुनोती दी थी तभी से राहुल गांधी ने क्षेत्रीय दलों की ब्लैकमेलिंग को समाप्त करने की रणनीति बना ली थी
बंगाल का ‘प्रयोग’ और राहुल गांधी की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राह में जो बाधाएं आईं, उनमें कांग्रेस की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यद्यपि कांग्रेस ‘इंडिया’ (INDIA) ब्लॉक का हिस्सा है, लेकिन बंगाल में पार्टी ने ममता बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ा। पुरे चुनाव में बंगाल कांग्रेस ने जिस तरह टीएम्सी के गुंडाराज को बताने में बीजेपी के साथ खड़े दखाई देने से भी परहेज नहीं किया । इस स्थिति ने विपक्षी मतों का विभाजन किया, जिससे को तो कांग्रेस को 2 सीट मिल गयी पर ममता बनर्जी अपनी स्थिति को सुरक्षित न रख सकीं।
जानकारों का तर्क है कि राहुल गांधी की यह रणनीति सोची-समझी हो सकती है। पिछले दो दशकों में कांग्रेस ने अपनी राष्ट्रीय जमीन का एक बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय दलों को गंवाया है। राहुल गांधी की वर्तमान राजनीतिक रणनीति का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व को कम करके कांग्रेस को पुन: ‘राष्ट्रीय विकल्प’ के रूप में स्थापित करना है। इसके लिए समसे पहले राज्यों के चुनावों में ऐसे सभी क्षत्रपो की हार होना आवश्यक है। भाजपा का भय दिखा कर इसको आसानी से किया भी जा सकता है ।

अखिलेश यादव के लिए ‘दोधारी तलवार’
उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव एक कठिन राजनीतिक दौर से गुजर रहे हैं। दो बार चुनाव हार चुके पिछले अखिलेश यादव दो वर्षों से ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के सहारे अपनी राजनीति को धार देने में लगे हैं, जिस कांग्रेस को वो अपना सहयोगी मां रहे थे वो आने वाले दिनों में उनके लिए चुनोती बन सकती है कांग्रेस से मिलना या दूर होंना. यही अखिलेश के सामने अब एक धर्मसंकट की स्थिति है।
गठबंधन का संकट: यदि समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करती है, तो इतिहास गवाह है कि कांग्रेस अपने लिए सीटों का बड़ा हिस्सा मांगेगी, जिससे समाजवादी पार्टी का आधार (कैडर) प्रभावित होता है। इसके साथ ही अगर कांग्रेस उतनी सीट नहीं जीत पाई तो जहाँ एक और भाजपा को फिर से फायदा होगा वहीं तीसरी बार भी अखिलेश सर्कार बनाने से चूक जायेंगे।
अकेले लड़ने का संकट: यदि अखिलेश यादव अकेले चुनाव में उतरते हैं, तो बंगाल की तरह ही कांग्रेस उनकी मुस्लिम वोट बैंक में सेंधमारी कर सकती है, जिसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिलने की संभावना होगी और यहाँ भी समाजवादी पार्टी की सत्ता में वापसी मुश्किल हो जायेगी।
‘विन-विन’ की स्थिति में राहुल गांधी?
राहुल गांधी की रणनीति क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को चरणबद्ध तरीके से कम करने की दिखाई दे रही है। बिहार में राजद के साथ संबंधों के उतार-चढ़ाव और अब बंगाल में टीएमसी के विरुद्ध आक्रामक रुख के बाद, संकेत मिल रहे हैं कि राहुल गांधी का अगला निशाना उत्तर प्रदेश है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि राहुल गांधी इस बात को भली-भांति समझते हैं कि एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस की प्रासंगिकता तब तक बनी रहेगी जब तक वह क्षेत्रीय क्षत्रपों को अपने दायरे में रखेगी या उन्हें कमजोर करके अपनी जगह बनाएगी।
आने वाले दिनों में यदि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच वाकयुद्ध या मतभेद खुलकर सामने आते हैं, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। अखिलेश यादव के लिए चुनौती केवल योगी आदित्यनाथ और भाजपा की मजबूत पकड़ ही नहीं है, बल्कि ‘इंडिया’ ब्लॉक के भीतर ही अपने सहयोगी कहे जाने वाले राहुल गांधी की बदलती राजनीतिक चालें भी हैं। यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव अपनी पार्टी के आधार को बचाते हुए इस ‘राजनीतिक चक्रव्यूह’ से बाहर निकलते हैं या राहुल गांधी की दीर्घकालिक रणनीति उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की राजनीतिक जमीन को संकुचित करने में कामयाब होती है।


