इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा में अप्रैल 2026 में हुए कामगारों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत हिरासत में ली गईं 25 वर्षीय आकृति चौधरी को बड़ी राहत प्रदान की है। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उनकी हिरासत को अवैध करार देते हुए इसे तत्काल प्रभाव से रद्द करने का आदेश दिया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि यदि चौधरी किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं, तो उन्हें तुरंत जेल से रिहा किया जाए।
‘मनगढ़ंत कहानी’ पर आधारित थी हिरासत
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने पाया कि प्रशासन ने चौधरी को “मनगढ़ंत कहानी” के आधार पर हिरासत में रखा था। कोर्ट ने कहा कि मामले के रिकॉर्ड में कई ऐसी प्रक्रियागत खामियां हैं, जो गिरफ्तारी और हिरासत की वैधता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती हैं।
गिरफ्तारी और नोटिस में विसंगतियां
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने दावा किया था कि चौधरी को 12 अप्रैल 2026 को सुबह 10:56 बजे नियमानुसार नोटिस जारी कर गिरफ्तार किया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने जनरल डायरी (जीडी) की प्रविष्टियों का विश्लेषण करने के बाद पाया कि नोटिस तैयार होने से पहले ही गिरफ्तारी कर ली गई थी। अदालत ने इसे कानून की प्रक्रिया का उल्लंघन माना।
वीडियो सबूत पेश करने में सरकार विफल
अदालत ने राज्य सरकार से उन वीडियो फुटेज को पेश करने के लिए कहा था, जिनमें यह दावा किया गया था कि चौधरी प्रदर्शनकारियों को पथराव और आगजनी के लिए उकसा रही थीं। सरकार ने वीडियो पेश करने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। खंडपीठ ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि चौधरी पहले ही पांच महीने जेल में बिता चुकी हैं और सरकार के पास कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने हिंसा के लिए लोगों को उकसाया था।

अधिकारियों को मुआवजा देने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केवल हिरासत ही रद्द नहीं की, बल्कि याचिकाकर्ता को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया है। वकीलों के अनुसार, यह मुआवजा उस थाना प्रभारी (SHO) और जिलाधिकारी से वसूला जाएगा, जिनकी भूमिका रासुका की सिफारिश और हिरासत आदेश में रही थी।
दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में स्नातक आकृति चौधरी को नोएडा में कामगारों के विरोध प्रदर्शन के बाद गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद उन पर रासुका लगाया गया था। पिछले करीब पांच महीनों से वह हिरासत में थीं, जिसे चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी। कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला रासुका के उपयोग और गिरफ्तारी की संवैधानिक प्रक्रियाओं के पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जाएगा।




