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संपादकीय : लापरवाही से मृत्यु होने पर भारत में डाक्टरों और अस्पतालों के लिए सख्त नियम क्यों नही है ? सरकार और सिस्टम कब चेतेगा ?

भारतीय संस्कृति में वैद्य को भगवान का रूप माना गया है, भगवान धन्वंतरि का चित्र आपको अक्सर पुराने वैद्य के यहां मिल जाएगा और भारत में नेशनल मेडिकल काउंसिल के लोगो में भी इनको स्थान दिया है । इसीलिए कालांतर में डॉक्टर और अस्पताल इसके पर्याय बन गए । होते भी क्यों नहीं इस देश में डा द्वारकानाथ कोटनीस जैसे उदाहरण है। पर क्या आज भारतीय परिपेक्ष में डॉक्टर इस तन्मयता से अपने मरीज का उपचार कर रहे हैं या फिर चिकित्सा लापरवाही अब एक बड़ा सच बनता जा रहा है ।

दिल्ली में आग लगने से 9 नवजात की मृत्यु और कल दादरी में एक मरीज की उपचार के दौरान मृत्यु के बाद मरीज के परिजनों द्वारा उक्त अस्पताल के डॉक्टर, मालिक और नर्स के खिलाफ दर्ज एफआईआर के समाचार के बाद इस पर विचार करना आवश्यक है । आखिर चिकित्सालय लापरवाही डॉक्टर की जिम्मेदारी है या फिर एक मानवीय भूल है और इसके लिए डॉक्टर, अस्पताल, सरकार और तंत्र में कौन ज्यादा दोषी है ।

यूरोपीय देशों में डॉक्टर द्वारा किसी भी प्रकार की लापरवाही के लिए लाइसेंस निरस्त कर मुकदमा चलाने के नियम है । किंतु भारत में ऐसा नहीं है भारत में कानूनी रूप से संज्ञेय चिकित्सालय लापरवाही के परिणामों को मोटे तौर पर तीन श्रेणियां में रखा जाता है पहले अपराधिक डाइट दूसरा मौद्रिक डाइट तीसरा अनुशासनात्मक कार्यवाही ।

भारतीय परिपेक्ष में मौजूदा दौर में रोगी को उपभोक्ता समझकर इलाज नहीं किया जाता इसीलिए यहां पर रोगी की मृत्यु पर अस्पतालों पर कार्यवाहियां कम होती है। कानूनी तौर पर नागरिक दायित्व यानी मौद्रिक मुआवजे को उचित नागरिक अदालत या उपभोक्ता मंचों के समक्ष उपाय अपनाकर सामान्य कानून के तहत किया जा सकता है इसकी मांग मृत्यु रोगी के परिजनों या स्वयं रोगी( यदि जीवित हो) तो उसके द्वारा की जा सकती है किंतु अनुशासमनात्मक कार्यवाही के तहत परिणाम सख्त होते हैं इसके अंतर्गत भारतीय चिकित्सा परिषद को अनुशासनात्मक कार्यवाही करने का अधिकार है जिसमें व्यवसाय का नाम हमेशा के लिए हटाया जा सकता है।

किंतु वर्तमान परिपेक्ष में अस्पताल एक माफिया की तरह काम करते हैं वह चाहे दिल्ली के अस्पताल में लापरवाही से आग लगने का मामला हो या फिर नोएडा के अस्पतालों में के बेसमेंट में ओपीडी चलाने का मामला हो या फिर दादरी के अस्पताल में लापरवाही से मरीज की मृत्यु का मामला हो ।

मैंने कई सरकारी कानूनविदो से जानकारी ली तो मुझे मल्टीस्पेशलटी अस्पतालों के बेसमेंट में ओपीडी चलाने का कोई औचित्य समझ नहीं आया। पुलिस की एक बड़ी अधिकारी ने बताया कि इस देश में डॉक्टर को वकीलों को पत्रकारों को अपने घर में अपने सलाहकार ऑफिस खोलने का अधिकार है संभावित इसीलिए डॉक्टर की जगह बड़े अस्पतालों ने कानून की आड़ लेते हुए अस्पतालों के बेसमेंट में अवैध ओपीडी खोल दी है।

संभवत अस्पताल प्रबंधन (जो कि अधिकांश मामलों में स्वयं डॉक्टर द्वारा ही किए जाते हैं ) ने यह मान लिया है कि उनके अस्पताल पर कोई प्राकृतिक आपदा नहीं आएगी। ऐसे में जिस बेसमेंट का उपयोग गाड़ियों की पार्किंग के लिए किया जाना था उसमें छोटे-छोटे केबिन बनाकर महंगी ओपीडी के जरिए बड़ी कमाई का साधन बना लिया गया है । क्या इन अस्पतालों को चलाने वाले प्राधिकरण इसके लिए नियमों को लागू कर सकते है ?

समस्या यह भी है कि इसके लिए हमारा सिस्टम कुछ नहीं करना चाहता है। बड़े अस्पतालों पर कार्यवाही करना किसी भी सिस्टम के लिए आज बड़ा चैलेंज है । कोविंड में नोएडा ग्रेटर नोएडा में बड़े अस्पतालों में बेड आरक्षित करने के लिए तमाम आपराधिक तरीके अपनाए थे। जिनमें मरीजों की जगह नकली लोगों को लेटा कर बेड आरक्षित दिखाए जा रहे थे और मोटी फीस के बाद मरीज को जगह दी जा रही थी । दुर्भाग्य यह था कि इस का खुलासा करने वाले डीएम स्वयं अगले दिन किसी बड़े अस्पताल में कोविड टीकाकरण के कार्यक्रम का उद्घाटन कर रहे थे ऐसे में किसी भी अस्पताल के खिलाफ कोई एक्शन नहीं हुआ। सरकार और सिस्टम शायद ही याद रख पाया है कि नोएडा के अस्पतालों में पूरे देश से आए सामान्य लोगों के अलावा कई अधिकारियों और नेताओं तक की भी मृत्यु हुई ।

नोएडा के लगभग सभी प्रमुख अस्पतालों में मार्केटिंग संभाल चुके एक बड़े अधिकारी ने कहां की आज यहां के सभी अस्पताल अपने बड़े-बड़े होर्डिंग या अखबारों में विज्ञापन के जरिए रोगी को उपभोक्ता मानकर अपनाते हैं ऐसे में चिकित्सीय मूल्य कहीं किनारे हो जाते हैं। जबकि आज से 20 साल पहले तक ऐसा बिल्कुल नहीं होता था । तब अस्पताल विज्ञापन नहीं करते थे जब तक अस्पतालो द्वारा विज्ञापन करना बंद नहीं किया जाएगा तब तक इसको व्यवसाय से सेवा मे परिवर्तित नहीं किया जा सकता है ।

यही कारण है कि अस्पताल अब डॉक्टर की जगह माफिया लगने लगे हैं और मरीजों की मृत्यु उनके लिए बस एक और मृत्यु को देखने जैसा हैI किंतु दिल्ली में हुए हादसे के बाद दिल्ली एनसीआर के अस्पतालों की संपूर्ण जांच दिल्ली और एनसीआर के सरकार में बैठे लोगों के लिए एक चैलेंज है और अगर वह इसके लिए अस्पतालों की लॉबी से लड़ पाए तो संभावित आने वाले दिनों में मरीज को प्रबंधन की लापरवाही से के कारण मृत्यु का सामना नहीं करना पड़ेगा भारतीय चिकित्सा पद्धति में माफिया गिरी के स्थान पर पेशेवर महान चिकित्सा के व्यायाम पुन स्थापित होंगे जिसके लिए डॉक्टर और अस्पतालों को भगवान कहा जाना चाहिए।

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