आशु भटनागर। सत्ता के गलियारों से प्रथम कथा बड़ी दिलचस्प है, गौतम बुद्ध नगर के पुनः जिला प्रभारी नियुक्त हुए कुंवर बृजेश सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के शासनकाल का जश्न मनाने के लिए एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया। हालांकि, नोएडा में आयोजित यह कार्यक्रम मोदी सरकार की उपलब्धियों के गुणगान से कहीं अधिक, ‘लोकतंत्र के चौथे स्तंभ’ के साथ एक नाटकीय संवादहीनता का परिचायक बन गया। मंत्री बृजेश सिंह ने प्रेस वार्ता में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के ‘सेवा, सुशासन और समर्पण’ के 12 वर्षों की अथाह प्रशंसा की। उन्होंने दावा किया कि इन 12 वर्षों में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी शक्ति, सामर्थ्य और अभूतपूर्व नेतृत्व का परिचय दिया है। 2014 में जनता के ‘विश्वास’ और 2019 के ‘बड़े जनादेश’ का उल्लेख करते हुए, मंत्री जी 2024 में सीटों की संख्या में आई कमी पर कोई चर्चा करना भूल गए, या शायद जानबूझकर टाल गए। अन्य प्रशंसाओं के साथ, बृजेश सिंह ने यह बताना नहीं भूले कि सरकार में मंत्रियों के देर से आने की ‘परंपराएं’ अब समाप्त हो गई हैं। उन्होंने दावा किया कि वह पत्रकारों को इंतजार नहीं कराना चाहते थे, इसलिए 11:40 बजे ही नोएडा पहुंच गए। हालांकि, उनके दावे से उलट सच्चाई यह थी कि मंत्री जी नोएडा में तो 11:40 पर उतर गए, किंतु उसके बाद लगभग आधे घंटे तक एक बंद कमरे में किसके साथ क्या मीटिंग करते रहे, यह किसी को नहीं पता। इधर, पत्रकार 11:30 बजे से आकर निर्धारित स्थान पर बैठ चुके थे और मंत्री जी 12:15 बजे बाहर निकलकर ‘समय पर आने’ का दावा कर गए। खैर, समय पर आना या देर से आना नेताओं की आदत का हिस्सा हो सकता है, लेकिन पूरे जिले के पत्रकार मोदी सरकार के 12 वर्ष पूरे होने की खुशी में हुए इस कार्यक्रम में नोएडा की सड़कों से लेकर आम आदमी के लिए महंगे होते पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों पर प्रश्न करना चाहते थे। किंतु, लोकतंत्र के प्रबल समर्थक मंत्री जी ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को अपने पार्टी कार्यकर्ताओं की मीटिंग समझकर एकतरफा वार्ता करके पूरी प्रेस वार्ता को समाप्त कर दिया। पत्रकारों द्वारा प्रश्न पूछने की कोशिश करने पर, उन्हें केवल यह सुनने को मिला: “मैं 19 तारीख को फिर आऊंगा।” बस फिर क्या था, पत्रकारों के बीच यह चर्चा आम हो गई कि यदि मुख्य्म्नात्री जी के अतिप्रिय प्रभारी मंत्री जी का ‘एकल-संवाद’ ही सुनना था, तो प्रेस कॉन्फ्रेंस की आवश्यकता ही क्या थी? एक प्रेस विज्ञप्ति भेजकर भी यही उद्देश्य पूरा किया जा सकता था। पत्रकार अपनी चर्चाओं में व्यस्त थे और संभवत मंत्री जी 12 वर्षों के गुणगान के बाद, आने वाले चुनावों में अपने टिकट के रिन्यूअल के लिए दिल्ली दरबार चले गए, पीछे छोड़ गए कई अनुत्तरित सवाल और ‘संवाद’ के नाम पर एक ‘एकतरफा घोषणा’ की चर्चा।
सत्ता के गलियारों में दूसरी कथा में पिछले 12 वर्षों के शासन में पहली बार ई-बसों के संचालन को लेकर चर्चाएं गर्म हैं। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत नोएडा से लेकर यमुना प्राधिकरण तक ई-बसों को सड़कों पर तो उतार दिया गया, लेकिन उनकी ‘तैयारी’ ने प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी है। सवाल यह है कि क्या यह आम जनता के लिए सुविधा है या महज एक दिखावटी सरकारी कवायद?मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा जोर-शोर से उद्घाटन के बाद पहले दिन तो सबकुछ चमक-धमक वाला रहा, लेकिन दूसरे दिन ही व्यवस्था की कलई खुल गई। परी चौक से सूरजपुर जाने वाले यात्री 90 मिनट तक बसों का इंतजार करते रहे। कुलेसरा से गौड़ सिटी तक के रूट पर यात्रियों को बसें ढूंढे नहीं मिलीं। नोएडा के भीतर भी संचालन की लचर व्यवस्था से आम पेशेवर और छात्र परेशान दिखे। ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी योजना बिना किसी वैज्ञानिक रूट मैपिंग और समय-सारणी के हड़बड़ी में लागू की गई है। इस पूरी योजना का सबसे अजीब पहलू यमुना प्राधिकरण का क्षेत्र रहा। वहां सड़कों पर बसें तो दौड़ रही हैं, लेकिन सवारी नदारद है। चूंकि उस क्षेत्र में अभी आबादी का घनत्व कम है, इसलिए वहां बसें चलाना संसाधन की बर्बादी जैसा है। एक तरफ जहां भीड़भाड़ वाले इलाकों में बसों की भारी किल्लत है, वहीं दूसरी तरफ खाली सड़कों पर बसें खाली दौड़ रही हैं, जो नीतिगत विफलता को दर्शाता है। सिर्फ रूट ही नहीं, ई-बसों की क्वालिटी भी ड्राइवरों और यात्रियों के लिए सिरदर्द बनी हुई है। बैटरी बैकअप को लेकर चालक इतने आशंकित हैं कि वे बिजली बचाने के चक्कर में बसों के डिस्प्ले बोर्ड तक बंद कर दे रहे हैं, जिससे यात्रियों को यह पता ही नहीं चलता कि बस किस रूट पर जाएगी। यदि नई बसों की स्थिति दो दिनों के भीतर ऐसी है, तो भविष्य में इनका रखरखाव कैसा होगा, यह एक बड़ा प्रश्न है।
सत्ता के गलियारों से छनकर आ रही तीसरी बड़ी कथा सीधे नोएडा और यमुना सिटी के निवासियों से जुड़ी है। आगामी 15 जून, सोमवार को नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट (जेवर) के रनवे पर इंडिगो एयरलाइंस की पहली फ्लाइट लैंड करने वाली है। इस ऐतिहासिक पल को लेकर जहां एक तरफ उत्साह है, वहीं दूसरी तरफ नोएडा से लेकर यमुना प्राधिकरण तक के प्रशासनिक अधिकारियों में हड़कंप मचा हुआ है।जहाँ एयरपोर्ट और प्राधिकरण के अधिकारी इसके तकनीकी संचालन और उद्घाटन की तैयारियों पर दिन-रात माथापच्ची कर रहे हैं, वहीं आम जनता के बीच इसकी वास्तविक उपयोगिता को लेकर गंभीर चर्चाएं छिड़ गई हैं। एयरपोर्ट को लेकर किए जा रहे तमाम हाई-प्रोफाइल दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर सूचनाओं का अभाव है। यात्रियों को अभी तक उड़ानों, कनेक्टिविटी और सुविधाओं के बारे में सटीक जानकारी नहीं मिल पा रही है। सबसे बड़ा डर लागत को लेकर है। स्थानीय लोग एयरपोर्ट तक पहुंचने के सफर के खर्च और वहां की महंगी सेवाओं को लेकर आशंकित हैं। विशेष रूप से, अपनी निजी गाड़ी ले जाने पर 2 घंटे की पार्किंग के लिए प्रस्तावित 150 रुपये के शुल्क ने मध्यम वर्ग की चिंताएं बढ़ा दी हैं।जानकारों और स्थानीय निवासियों का स्पष्ट मत है कि यदि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को सफल बनाना चाहते हैं, तो उन्हें इसे दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल (IGI) एयरपोर्ट के मुकाबले ज्यादा किफायती और सुलभ बनाना होगा। लोगों का कहना है कि जब तक यहां सुविधाएं सस्ती और बेहतर नहीं होंगी, तब तक यात्री दिल्ली का रुख करना नहीं छोड़ेंगे। 15 जून को होने वाली पहली उड़ान केवल एक सांकेतिक शुरुआत होगी, लेकिन असली परीक्षा इसके बाद शुरू होगी। क्या प्रशासन अपनी पुरानी ढर्रे की कार्यशैली को त्याग कर जनता को सस्ती और सुगम सेवाएं दे पाएगा? यह सवाल फिलहाल नोएडा के सत्ता के गलियारों में गूंज रहा है।



