आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश भाजपा की हालिया संगठनात्मक नियुक्तियों ने राज्य की राजनीति में, विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। पार्टी ने छह नए क्षेत्रीय अध्यक्षों की घोषणा की है, जिनमें नवाब सिंह नागर का नाम सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। पश्चिमी क्षेत्र की कमान नवाब सिंह नागर को सौंपकर भाजपा ने न केवल गुर्जर वोट बैंक को साधने का रणनीतिक दांव चला है, बल्कि गौतम बुद्ध नगर की राजनीति के ‘पावर सेंटर’ को भी एक नई दिशा देने के संकेत दिए हैं।
आज चर्चाओ में अवश्य ये कहा जा रहा है कि नवाब सिंह नागर नोएडा के पुराने गुर्जर नेता हैं पर ये भी सच है कि इस जिले में उन्हें कभी वैसा गुर्जर नेता नहीं माना गया जैसा महेंद्र भाटी, नरेंद्र भाटी या सुरेंद नागर को माना जाता है I तब उस दौर में उनके शांत स्वभाव और संघ के प्रति समर्पण को क्षेत्र के गुर्जर समाज के साथ मिलने वाला नहीं समझा गया। उन्होंने पहली बार 1993 में पार्टी के टिकट पर दादरी से चुनाव लड़ा, लेकिन वे समीर भाटी से हार गए. हालांकि, वे लगातार अपने क्षेत्र में एक्टिव रहे, जिसका नतीजा ये रहा कि वे 1996 में पहली बार विधायक बने, इसके बाद 2002 में भी दादरी सीट से विधायक बने।
नवाब सिंह नागर कई बार स्थानीय मुद्दों को लेकर आंदोलनों का नेतृत्व कर चुके हैं। किसान हितों, जिला बहाली और भूमि आवंटन से जुड़े मामलों में उन्होंने कई प्रदर्शन किए, जिसके चलते उन्हें कई बार गिरफ्तार भी किया गया। वर्ष 2014 से 2016 के बीच उन्होंने डीएनडी फ्लाईवे पर टोल वसूली के खिलाफ बड़ा आंदोलन चलाया। उन्होंने धरना-प्रदर्शन, कार रैली और जनजागरण अभियान के जरिए इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया। परिणाम स्वरूप सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद डीएनडी टोल को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिला। नवाब सिंह नागर विवादों में भी रहे है। 2015 में दादरी के बिसाहड़ा गांव में मोहम्मद अखलाक की हत्या के बाद आरोपियों को मासूम कहे जाने पर राजनीतिक विरोध हुआ था। उनके बयान पर विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई थी और उन पर माहौल भड़काने के आरोप लगाए गए थे। वर्ष 2017 में जब भाजपा ने उन्हें दादरी सीट से टिकट नहीं दिया तो उनके समर्थकों ने विरोध प्रदर्शन भी किया था। उस समय पार्टी के अंदरूनी समीकरणों को लेकर भी चर्चाएं हुई थीं पर उस समय भी नवाब सिंह नागर ने आम नेताओ की तरह पार्टी नहीं छोड़ी।
20 साल का वनवास और राजनैतिक पुनर्जन्म
नवाब सिंह नागर का राजनैतिक सफर किसी ‘फीनिक्स’ पक्षी की तरह है, जो अपनी ही राख से फिर जीवित हो उठता है। 90 के दशक में दादरी से दो बार विधायक रहे नागर का राजनीतिक सितारा 2007 के बाद तब धूमिल होता दिखा, जब स्थानीय राजनीति में उन्ही का हाथ थामे चले डॉ. महेश शर्मा का उदय हुआ। कहा जाता है कि डॉ. शर्मा की चमक-दमक के आगे नवाब सिंह नागर कहाँ और कैसे ओझल हो गए थे, स्वयं नवाब सिंह नागर नहीं समझ पाए। जब तक कुछ समझे एक दशक निकल गया। 2017 में जब उन्हें दादरी से टिकट नहीं मिला और मास्टर तेजपाल नागर को वरीयता दी गई, तब राजनीतिक पंडितों ने नवाब सिंह नागर के युग का अंत मान लिया था।

कहते है कि 2017 में जब नबाब सिंह नागर दादरी से टिकट की दौड़ में थे तब डा महेश शर्मा ने अपना हाथ बसपा छोड़ कर भाजपा में आये मास्टर तेजपाल नागर पर रख दिया जिसके बाद ये माना जाने लगा कि इस क्षेत्र में नबाब सिंह नागर का राजनैतिक दौर समाप्त हो गया है I तो कुछ लोगो ने ये भी कहा कि नबाब सिंह नागर कहीं वापसी न कर ले इसलिए डा शर्मा ने दुसरे दल से आये नेता को दादरी खड़ा कर दिया I
लेकिन राजनीति संयोगों का खेल है। दो दशक बाद नवाब सिंह नागर की ‘वापसी’ ने पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। 2024 के लोकसभा चुनावो से पहले दीपावली पर डॉ. महेश शर्मा का स्वयं नवाब सिंह नागर के घर जाकर शुभकामनाएं देना, एक शिष्टाचार भेंट रही, पर शायद सत्ता वापसी का संकेत थी जिसका परिणाम अब सामने देखा जा रहा है।
नोएडा की राजनीति में बदलेगा ‘सत्ता का केंद्र’
नवाब सिंह नागर का क्षेत्रीय अध्यक्ष बनना नोएडा और गौतम बुद्ध नगर की राजनीति के लिए बड़े बदलाव का संकेत है। वर्षों से नोएडा की राजनीति का केंद्र ‘कैलाश पर्वत’ (डॉ. महेश शर्मा के प्रभाव क्षेत्र) के इर्द-गिर्द घूमता रहा है, लेकिन अब यह केंद्र ‘शिवालिक की तलहटी’ (नवाब सिंह नागर के प्रभाव क्षेत्र) की ओर खिसकता दिखाई दे रहा है।
नोएडा विधायक पंकज सिंह की अपनी एक स्थापित कार्यशैली है, लेकिन नवाब सिंह नागर का कद बढ़ने से पार्टी के भीतर नई धुरी का बनना निश्चित है। सवाल यह है कि क्या भाजपा खुद से ही टकराने की स्थिति में आ रही है? क्या जो सत्ता का संघर्ष 20 साल पहले समाप्त माना गया था, वह अब नए स्वरूप में फिर से सिर उठाएगा?
2027 की अग्निपरीक्षा
नवाब सिंह नागर के सितारे फिलहाल बुलंदी पर हैं, लेकिन उनकी असली परीक्षा 2027 के विधानसभा चुनाव में होगी। पश्चिमी क्षेत्र का अध्यक्ष होने के नाते उन पर पार्टी को फिर से विजय दिलाने का भारी दबाव होगा। यदि वे इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा ले जाते हैं, तो 2029 तक उनका राजनीतिक रसूख और अधिक बढ़ जाएगा।
भाजपा ने नागर को जिम्मेदारी देकर समाज में एक संदेश तो दिया है, लेकिन नोएडा की राजनीति में सत्ता के नए केंद्र का उदय पार्टी के लिए एक नई चुनौती भी पेश कर सकता है। क्या नवाब सिंह नागर अपनी नई भूमिका में केवल पार्टी की पुरानी साख बचाएंगे या फिर गौतम बुद्ध नगर की राजनीति का नया ‘पावर हाउस’ बनकर उभरेंगे? यह आने वाला समय ही तय करेगा। फिलहाल, नोएडा की राजनीति के शांत दिख रहे समंदर में एक बड़ी लहर उठने को तैयार है।



