सत्ता के गलियारों में पहली कथा दादरी विधानसभा से है। जैसे-जैसे 2026 अपने समाप्ति की ओर बढ़ता जा रहा है 2027 में विधानसभा चुनाव को लेकर दादरी दावेदारों की संख्या बढ़ती जा रही है। लखनऊ सूत्रों की माने तो भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव में नया प्रयोग करने जा रही है जिसमें 60 पार कर चुके और 2 बार जीत चुके सीटों पर वर्तमान विधायको का टिकट काटा जाएगा। उनकी जगह एक तिहाई महिलाओं और एक तिहाई सीटों पर युवा नेताओ को प्राथमिकता दी जाएगी उसके अलावा दलित और ओबीसी भी भाजपा की प्राथमिकता होंगे। ऐसे में 50 वर्ष से कम होने के नाते नोएडा से पंकज सिंह की सीट तो सुरक्षित रहेगी पर जेवर से वर्तमान विधायक धीरेन्द्र सिंह पर संशय और दादरी विधानसभा के वर्तमान विधायक तेजपाल नागर का टिकट कटना तय माना जा रहा है। इधर दादरी में लगभग तीन दर्जन दावेदारों ने पूरे शहर को अपने बैनर पोस्टर से पाट दिया है। इनमें भी दो महिलाएं कुशल सिंह और महामेधा नागर सबसे आगे चल रही हैं। कुशल सिंह के समर्थकों ने तो कई जगह यह भी दावा कर दिया कि अजीत डोभाल ने उन्हें टिकट दिलाने का वादा कर दिया है। हालांकि अजीत डोभाल भाजपा में टिकट दिला रहे हैं यह अफवाह कहां से आई किसी को नहीं पता। इधर ऐसी अफवाह के आते ही जुलाई में दर्ज हुई कुशल सिंह के खिलाफ एफ़आईआर का समाचार सुर्खियों में आ गया है उधर कुशल सिंह के खिलाफ एफ़आईआर के बाद तेजपाल नगर के समर्थको ने भी कहा कि तीसरी बार विधायक जी ही आयेंगे। पर इस सब से अलग लखनऊ सूत्रों ने एक नई जानकारी दी जिसके अनुसार नोएडा की तरह दादरी में भी एक भाजपा के एक बड़े कद्दावर नेता को उतारने की तैयारी हो रही है । अपनी मिक्स पापुलेशन के कारण भाजपा की सुरक्षित सीट बन चुकी दादरी पर भाजपा अब बड़ा दांव खेलना चाहती है। भाजपा का मानना है तो इससे दादरी की समाजवादी पार्टी इकाई को अपने स्थानीय जातीय वोटर का वोट मिलने की नई आशा जाग जाएगी और समाजवादी पार्टी के एकजाती के स्थानीय वोटो का ध्रुवीकरण ही उसका फायदा है क्योंकि दादरी का समीकरण अब किसी एक जाति के भरोसे जीत हासिल करने का नहीं रह गया हैI 2022 के विधान सभा और 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणामो ने साबत भी किया है। ऐसे में अगर 60 साल से अधिक उम्र और 2 बार के विधायको की टिकट कटनी शुरू हुई तो क्या इस बार दादरी को भाजपा को कोई युवा पैराशूट नेता मिल सकता है।
सत्ता के गलियारों में दूसरी कथा भी दादरी से ही है दरअसल गौतम बुध नगर में परदे के पीछे से दादरी विधानसभा का टिकट मांग रहे सुरेंद्र सिंह नागर को बीते हफ्ते राष्ट्रीय कार्यकारणी से हटाए जाने के बाद बड़ा झटका लगा है । जिसके बाद जिले में नेताओ के बीच चर्चा शुरू हो गयी है कि दादरी में बड़ी रैली करवाना इन दिनों स्थानीय गुर्जर नेताओं के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। असल में 5 माह पहले पहले समाजवादी पार्टी में पश्चिम के बड़े नाम बनते जा रहे पार्टी के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने एक बड़ी रैली करी और उसके बाद वह समाजवादी पार्टी से किनारे लगा दिए गए आज हालात ये है कि कभी प्रतिदिन 3 से अधिक टीवी चैनलों पर दिखाई देने वाले भाटी अब बमुश्किल सप्ताह में 3 बार भी किसी टीवी चैनल पर नहीं दिख रहे है। दूसरा नंबर सुरेंद्र सिंह नागर का बताया जा रहा है जिन्होंने बीते दिनों ही दादरी में प्रदेश अध्यक्ष को बुलाकर बड़ा शक्ति प्रदर्शन किया था किंतु उसके बाद उनको भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से हटाए जाने के समाचार आ गए। अब फिलहाल सुरेंद्र सिंह नागर के समर्थक नेताजी का सम्मान बचाए रखने के लिए कह रहे हैं कि उन्हें आने वाले दिनों में मंत्रिमंडल में बड़ी जगह मिलने वाली है । वहीं नेताजी के विरोधी कह रहे हैं कि लोकसभा चुनाव के समय ही गौतम बुध नगर से दावेदारों डॉक्टर महेश शर्मा और सुरेंद्र नागर से स्पष्ट कह दिया था कि टिकट चाहे जो ले लो मगर मंत्री पद नहीं मिलेगा जिसके बाद सुरेन्द्र सिंह नागर टिकट की रेस से पीछे हट गये थे I अब विधान सभा में दादरी से जीतकर उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री बन्ने का सपना देख रहे सुरेंद्र सिंह नागर राष्ट्रीय कार्यकारिणी से भी हाथ धो बैठे हैं। जिसके बाद कहा जा रहा है कि क्या जेन जी राष्ट्रीय अध्यक्ष की नई भाजपा में अब दूसरे दलों से आए नेताओं का खेल समाप्त होने वाला है, और अगर ये सच हुआ तो क्या यूपी भाजपा में दुसरे दलों से आये कई नेताओ की राजनीती फिर से अपने अपने घर वापसी करती दिखाई दे सकती है।
दादरी के बाद सत्ता के गलियारों से तीसरी कथा नोएडा विधानसभा की है जहां पिछले हफ्ते ही हमने बताया था कि जिले के स्थानीय नेताओं की अक्षमता को देखते हुए समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व नोएडा से किसी बड़े शिक्षाविद ब्राह्मण चेहरे को उतारने की तैयारी कर रहा है जिसके बाद नोएडा विधानसभा के वैश्य समुदाय के नेताओं में खलबली मच गई है दरअसल लंबे समय से वैश्य समुदाय नोएडा की पॉलिटिक्स में अपने आप को प्रासंगिक बनाने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में वह कभी गोपाल कृष्ण अग्रवाल, कभी मनोज गुप्ता, कभी कैप्टन विकास गुप्ता जैसे नेताओं को लेकर सपने बुनता रहता है और दावे करता रहता है। यहां तक कि जब मुख्यधारा के राजनीति में स्थान नहीं मिलता तो वह स्थानीय संगठनों, स्थानीय RWA और व्यापार मंडलों में अध्यक्ष बनाकर खुद के अहम को संतुष्ट करता है। ऐसे में भाजपा में जगह ना देख कर कुछ वर्षों से भाजपा के ही कुछ छूटभैये वैश्य नेताओं ने समाजवादी पार्टी की ओर रुक किया और समाजवादी पार्टी में भी लंबे समय से अखिलेश यादव के प्रिय रहे आश्रय गुप्ता के लिए लाबिंग शुरू की, और आश्रय समाजवादी पार्टी में नोएडा महानगर अध्यक्ष भी बने I उत्साहित हो आश्रय गुप्ता समेत 3 वैश्य नेता नोएडा विधानसभा से टिकट की दौड़ में भी दिखाई देने लगे, परदे के पीछे कैप्टन विकास गुप्ता को सपा में भी लाने की जुगत लगाये जाने लगी, लेकिन जैसे ही शीर्ष नेतृत्व के किसी बड़े ब्राह्मण चेहरे को टिकट दिए जाने की बात सामने आई तो आश्रय गुप्ता ने अध्यक्ष पद पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर लिया, कैप्टन भी भाजपा कार्यक्रमों में दिखाई देने लगे हैं और वैश्य समुदाय के स्थानीय नेताओं में हड़कंप मच गया है। नोएडा की राजनीति में कहा जा रहा है कि पंकज सिंह के कद के आगे कोई वैश्य नेता का उभार संभव ही नहीं है। भाजपा में पंकज सिंह का विकल्प बनेगा नहीं और समाजवादी पार्टी वैश्य नेताओं में किसी को दावेदार मानती नहीं ऐसे में फिलहाल 2027 में नोएडा का चुनाव पंकज सिंह बनाम कोई नहीं बनता दिख रहा है और वैश्य नेता फिर से फोनरवा के स्थानीय RWA पर दावेदारी में लग सकते हैं ।





