आशु भटनागर। भारत जैसे तेजी से विकास कर रहे देश में ‘पर्यावरण संरक्षण’ का मुद्दा अक्सर फाइलों के बोझ और आर्थिक लाभ-हानि के आंकड़ों के नीचे दबा हुआ नजर आता है। विडंबना यह है कि सरकारी तंत्र से लेकर गैर-सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थाओं के लिए पर्यावरण की रक्षा की लागत या तो ‘अत्यधिक’ लगती है या फिर ‘अनावश्यक’। जब भी कोई जागरूक नागरिक या पर्यावरणविद प्रकृति के हक में खड़ा होता है, तो विशालकाय संस्थाएं अपने जटिल तकनीकी तर्कों और बजटीय सीमाओं का ऐसा मायाजाल बुनती हैं कि जनहित का मुद्दा उसमें उलझकर रह जाता है।
एनसीआर (NCR) क्षेत्र में स्थित विद्युत उत्पादन का प्रमुख केंद्र ‘दादरी एनटीपीसी’ (NTPC Dadri) वर्तमान में इसी बहस के केंद्र में है। 1980 के दशक में स्थापित यह संयंत्र आज न केवल वायु प्रदूषण बल्कि जल संकट के एक बड़े कारण के रूप में भी देखा जा रहा है। हालिया घटनाक्रमों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की महारत्न कंपनियां अपने आर्थिक मुनाफे को पर्यावरण और जीवन के अधिकार से ऊपर रखने लगी हैं?
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संघर्षों की विरासत
1980 के दशक में जब दादरी में एनटीपीसी के इस भारी-भरकम संयंत्र की नींव रखी गई थी, तब इसे आधुनिक भारत के ‘मंदिरों’ में से एक माना गया था। लेकिन इस मंदिर की वेदी पर स्थानीय किसानों की जमीनें चढ़ाई गईं। दशकों बीत जाने के बाद भी, किसानों के परिवारों का दर्द कम नहीं हुआ है। उचित मुआवजे की कमी और रोजगार के वादों का पूरा न होना आज भी क्षेत्रीय राजनीति और जन-आक्रोश का मुख्य मुद्दा है।
कोयला आधारित यह विद्युत संयंत्र न केवल भूमि अधिग्रहण के विवादों से घिरा रहा है, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में छाई धुंध और जहरीली हवा में भी इसका ‘योगदान’ जगजाहिर है। दादरी और उसके आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों के लिए ‘फ्लाई ऐश’ (उड़ती हुई राख) और जहरीला धुआं दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। दादरी क्षेत्र के निवासियों का दावा है कि इस प्रदूषण के कारण वहां सांस संबंधी बीमारियां, अस्थमा और त्वचा के गंभीर रोगों का जोखिम उच्चतम स्तर पर है।

‘द डार्क साइड ऑफ एनटीपीसी’: सीएसआर (CSR) के पीछे का सच
सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी (CFA) द्वारा 2018 में जारी की गई रिपोर्ट “द डार्क साइड ऑफ एनटीपीसी” (The Dark Side of NTPC) ने इस कॉर्पोरेट दिग्गज की छवि पर कई गंभीर सवाल उठाए थे। एनटीपीसी खुद को विश्व की पांच सबसे बड़ी विद्युत कंपनियों में से एक होने के साथ-साथ एक ‘जिम्मेदार कॉर्पोरेट नागरिक’ के रूप में भी पेश करती है। एनटीपीसी की वेबसाइट के अनुसार, 2011-12 और 2016-17 के बीच इसने अपनी सीएसआर गतिविधियों पर 1,200 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए। हालांकि, भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, पर्यावरण क्षरण, प्रदूषण, श्रमिक सुरक्षा आदि विभिन्न क्षेत्रों में इसके कार्यों का रिकॉर्ड शायद ही कभी सुर्खियों में आता है।
किंतु, प्रश्न यह उठता है कि क्या यह भारी-भरकम राशि वाकई उन लोगों तक पहुंच रही है जो इसके संयंत्रों के कारण अपना स्वास्थ्य और जीवन का आधार खो रहे हैं? रिपोर्ट के अनुसार, भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, पुनर्वास, पर्यावरण क्षरण और श्रमिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में एनटीपीसी का रिकॉर्ड अक्सर सुर्खियों से दूर रखा जाता है या उसे दबा दिया जाता है। सीएसआर की गतिविधियां अक्सर दिखावटी सौंदर्यीकरण तक सीमित रह जाती हैं, जबकि वास्तविक पारिस्थितिक नुकसान (Ecological Damage) की भरपाई के लिए ठोस कदम उठाने में हिचकिचाहट देखी जाती है। इस रिपोर्ट पर हम अपनी आगे के समाचारों में विस्तार से बातें करेंगे किंतु इसी एनटीपीसी पर वायु प्रदूषण के साथ-साथ स्थानीय जल स्तर और प्राकृतिक स्रोतों को भारी मात्रा में प्रयोग करने के आरोप लगते रहे हैं आज हम उस पर चर्चा करेंगे।
जल संकट और एनजीटी (NGT) की दहलीज पर मामला
वायु प्रदूषण के अलावा, एनटीपीसी दादरी पर स्थानीय जल स्तर और प्राकृतिक जल स्रोतों के अत्यधिक दोहन के भी गंभीर आरोप हैं। संयंत्र के संचालन के लिए भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है, जिसके लिए ऊपरी गंगा नहर (Upper Ganga Canal) से स्वच्छ जल लिया जाता है।
यह विवाद 2018 में तब गरमाया जब पर्यावरण कार्यकर्ता अभीष्ट कुमार गुप्ता ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में एक याचिका दायर की। याचिका के तर्क चौंकाने वाले थे।
एक तरफ नोएडा प्राधिकरण शहर के सीवेज (Sewage) को उपचारित (Treat) करने के बाद उसका सही उपयोग करने के बजाय उसे ‘कोंडली नाले’ में बहा रहा है, जो अंततः यमुना को प्रदूषित करता है। दूसरी ओर, एनटीपीसी दादरी औद्योगिक उपयोग के लिए ऊपरी गंगा नहर से उस ताजे पानी का उपयोग कर रहा है, जो वास्तव में पीने के लिए और सिंचाई के लिए आरक्षित होना चाहिए।
आरोप है कि इससे दादरी क्षेत्र का भूजल स्तर लगातार नीचे गिर रहा है और प्राकृतिक जल स्रोत सूख रहे हैं। लगभग 20 लाख से अधिक आबादी वाले नोएडा और ग्रेटर-नोएडा जैसे शहर आज भी हरिद्वार से आ रही गंगा जल पर आश्रित है। एनजीटी ने इस पर सख्त रुख अपनाया और निर्देश दिया कि एनटीपीसी को ताजे पानी के बजाय नोएडा के ‘ट्रीटेड सीवेज वाटर’ (उपचारित जल) का उपयोग करना चाहिए।
Game of Broken Promises: समझौतों का ठंडे बस्ते में जाना
एनजीटी के दखल के बाद, 3 नवंबर 2018 को एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ। इसमें नोएडा प्राधिकरण, एनटीपीसी (विजयलक्ष्मी मुरलीधरन, अपर महाप्रबंधक के माध्यम से) और उत्तर प्रदेश जल निगम शामिल थे। समझौते की शर्तें स्पष्ट थीं नोएडा से दादरी तक एक लंबी पाइपलाइन बिछाई जाएगी। उत्तर प्रदेश जल निगम इस पाइपलाइन के निर्माण और अगले 15 वर्षों तक इसके रखरखाव के लिए जिम्मेदार होगा।एनटीपीसी इस प्रोजेक्ट के लिए वित्त पोषण करेगा और अपनी जल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपचारित जल का उपयोग करेगा।
इसके बाद 2019 के मई में इसके लिए पाइपलाइन डालने का रूट भी तय हो गया। कहा गया कि पाइपलाइन डालने की जिम्मेदारी एनटीपीसी खुद उठाएगी। तत्कालीन मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया गया कि इसके लिए एनटीपीसी को यूपी जल निगम से प्रस्तावित रूट पर पाइपलाइन डालने का अप्रूवल भी मिल गया है। काम शुरू होने के बाद करीब 36 महीने में एनटीपीसी को पानी मिलना शुरू हो जाएगा। सेक्टर-54 एसटीपी से यह लाइन शुरू होगी और सेक्टर-123 के सामने से होते हुए बिसाहड़ा के सामने से निकलकर एनटीपीसी दादरी तक जाएगी। अथॉरिटी के तत्कालीन जीएम राजीव त्यागी ने अनुसार तब एनटीपीसी को यूपी जल निगम से पाइपलाइन डालने के लिए एनओसी भी मिल गई थी। जिसका अथॉरिटी के साथ एमओयू पहले ही साइन हो चुका था।
लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि एनटीपीसी ने इस प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। वर्षों तक मामला लंबित रहा, मामला धरातल की जगह कानूनी दांव पेंच में ही चलता रहा।
वित्तीय अलाभकारी (Financially Unviable): एक सुविधाजनक तर्क?
मार्च 2025 (मामले की सुनवाई के दौरान) में एनटीपीसी ने एनजीटी को जो जानकारी दी, वह चौंकाने वाली थी। कंपनी ने दावा किया कि नोएडा प्राधिकरण के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) से उपचारित जल का उपयोग करना ‘वित्तीय, तकनीकी और परिचालन’ दृष्टि से संभव नहीं है।
एनटीपीसी की ओर से पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना के लिए 1398 करोड़ रुपये के पूंजी निवेश (Capital Investment) की आवश्यकता है। वार्षिक परिचालन और रखरखाव (O&M) पर 129 करोड़ रुपये खर्च होंगे। जिसके बाद कंपनी का तर्क है कि इन भारी लागतों के कारण यह परियोजना ‘आर्थिक रूप से अव्यवहार्य’ (Financially Unviable) हो गई है। लेकिन यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि क्या करोडो का वार्षिक सीएसआर बजट रखने वाली और हजारों करोड़ का शुद्ध लाभ कमाने वाली महारत्न कंपनी के लिए पर्यावरण की रक्षा ‘महंगी’ है? क्या 2018 में समझोता काके 3 वर्ष में पूरा करने की जगह 8 वर्ष तक उसे लटकाया जाना नैतिक कहा जा सकता है ? क्या दिल्ली-एनसीआर के निवासियों के फेफड़ों और दादरी के कम होते जल स्तर की कीमत 1398 करोड़ से कम है?
एनटीपीसी की जवाबदेही का प्रश्न
यह पूरा प्रकरण एक गहरे संकट की ओर इशारा करता है। जब सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां ही आर्थिक लाभ-हानि के तराजू में पर्यावरण को तौलने लगती हैं, तो निजी क्षेत्र से जिम्मेदारी की उम्मीद करना व्यर्थ है। ऊपरी गंगा नहर का पानी एनटीपीसी के लिए ‘मुफ्त’ या बहुत कम लागत पर उपलब्ध है, इसलिए वह उसे छोड़ना नहीं चाहती। लेकिन इस ‘मुफ्त’ के पानी की कीमत आसपास के किसान और ग्रामीण अपने भविष्य को दांव पर लगाकर चुका रहे हैं।
‘द डार्क साइड ऑफ एनटीपीसी’ रिपोर्ट में उठाए गए सवाल आज भी प्रासंगिक हैं। क्या एक सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी की जनता और पर्यावरण के प्रति कोई नैतिक जवाबदेही नहीं है? क्या एनजीटी के आदेशों और आपसी समझौतों को केवल ‘बजट’ का हवाला देकर दरकिनार किया जा सकता है?
एक और एनटीपीसी और सरकार देश की बिजली आवश्यकताओं को पूरा करने में एनटीपीसी के योगदान की बात करते हैं, तो साथ ही मानव विस्थापन, प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य खतरे, वनों का विनाश, जल जैसे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और यहां तक कि कभी-कभी मानव जीवन को खतरे में डालने जैसे मुद्दों पर भी सवाल उठने चाहिए।
एनसीआर क्षेत्र, जो पहले से ही प्रदूषण के गंभीर संकट से जूझ रहा है, वहां इस तरह की संस्थागत उदासीनता खतरनाक है। एनटीपीसी को यह समझना होगा कि सतत विकास (Sustainable Development) केवल वार्षिक रिपोर्टों में चमकने वाले आंकड़े नहीं हैं, बल्कि वे निर्णय हैं जो नदियों को सूखने से बचाते हैं और हवा को सांस लेने योग्य बनाए रखते हैं। यदि आज हमने विकास की इन बड़ी-बड़ी मशीनों की जवाबदेही तय नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए न तो पीने को पानी बचेगा और न ही जीने के लिए स्वच्छ हवा। आर्थिक लाभ तो फिर से कमाया जा सकता है, लेकिन नष्ट किया गया पारिस्थितिकी तंत्र कभी वापस नहीं लौटता।
आखिर कब तक एनटीपीसी ऊपरी गंगा नहर के साफ पानी का उपयोग संयंत्र को ठंडा करने में करती रहेगी आखिर कब तक नोएडा प्राधिकरण शहर के सीवेज (Sewage) को उपचारित (Treat) करने के बाद उसका सही उपयोग करने के बजाय उसे ‘कोंडली नाले’ में बहाता रहेगा आखिर कब हम इस देश में पर्यावरण की चिंता करना शुरू करेंगे या फिर हर साल की तरह दिल्ली एनसीआर में हम AQI 400 पहुंचने के बाद ही जागेंगे और फिर से 4 महीने बाद दोबारा सो जाएंगे





