आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश की राजनीति में जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनावों की सुगबुगाहट तेज हो रही है, वैसे-वैसे सियासी समीकरणों की बिसात भी बिछने लगी है। पिछले लेख में हमने बताया था कि सियासी समर में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पास एक ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ है, जिसकी काट फिलहाल किसी भी विपक्षी दल के पास नजर नहीं आ रही है। यह ब्रह्मास्त्र कोई और नहीं, बल्कि सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। फिर इस महासमर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने मुख्य चुनौती कौन पेश करेगा, इस पर भी राजनीतिक विश्लेषक हरिशंकर शाही की राय स्पष्ट है। उत्तर प्रदेश की सियासत का इतिहास गवाह है कि समाजवादी पार्टी (सपा) और उसके सर्वोच्च नेता अखिलेश यादव को कभी भी कम आंकने की भूल नहीं की जा सकती। सपा के पास सत्ता के बड़े से बड़े सूरमाओं को ‘धोबी पाट’ मारने का लंबा अनुभव है।

2012 का वो करिश्मा: जब अखिलेश ने अकेले पलटी थी बाजी
साल 2007 से 2012 के बीच उत्तर प्रदेश में मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की पूर्ण बहुमत वाली सरकार थी, जो ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिंग के मजबूत गठजोड़ पर टिकी थी। उस प्रचंड सत्ता को ध्वस्त करने में अखिलेश यादव ने मुख्य भूमिका निभाई थी। मुलायम सिंह यादव का नाम और साया जरूर पीछे था, लेकिन अखिलेश ने जमीन पर उतरकर जो साइकिल यात्राएं कीं और जनता का विश्वास जीता, उसी के दम पर सपा ने 2012 में पूर्ण बहुमत हासिल किया।
यह एक ऐसा राजनीतिक करिश्मा था, जिसे देश की दूसरी पीढ़ी के कई बड़े नेता, जिनमें कांग्रेस के राहुल गांधी भी शामिल हैं, आज तक अपने दम पर दोहरा नहीं पाए हैं।
समर्पित कैडर: सपा की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी
समाजवादी पार्टी मूल रूप से एक कार्यकर्ता-आधारित (कैडर-बेस्ड) पार्टी है। सपा के जमीनी कार्यकर्ताओं की एक खास मानसिकता होती है—उन्हें पता होता है कि जिस दिन पार्टी सत्ता में आएगी, सत्ता का प्रभाव सीधे उन तक पहुंचेगा। चुनावी भाषा में कहें तो “हर कार्यकर्ता खुद को अखिलेश महसूस करता है।”

यही सत्ता की हनक कई बार सपा के लिए प्रशासनिक स्तर पर नुकसानदेह साबित होती है और जनता में नाराजगी भी पैदा करती है, लेकिन चुनाव लड़ने के लिहाज से यही कार्यकर्ताओं का समर्पण पार्टी की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। सपा का कार्यकर्ता हर मोर्चे पर लाठी खाने और जूझने के लिए तैयार रहता है।
विरोधी वोटों की पहली पसंद
उत्तर प्रदेश जैसे राजनैतिक रूप से सजग राज्य में भाजपा और विशेषकर योगी आदित्यनाथ के ‘प्रखर हिंदुत्व’ वाले चेहरे के सामने विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा अखिलेश यादव ही हैं। चूंकि राज्य में कांग्रेस और बसपा फिलहाल उस स्थिति में नहीं दिख रही हैं जहां वे भाजपा को सीधे शिकस्त दे सकें, इसलिए भाजपा और योगी विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण स्वाभाविक रूप से सपा के पक्ष में होता दिख रहा है।
मुस्लिम मतदाताओं के पास ओवैसी की एआईएमआईएम या कांग्रेस जैसे विकल्प जरूर हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ की प्रशासनिक सख्ती (जैसे मदरसों और मस्जिदों पर कार्रवाई) के बीच, मुस्लिम समुदाय रणनीतिक रूप से अखिलेश के पीछे जा रहा है। अखिलेश भी खुलकर इस समुदाय के साथ खड़े दिखाई देते हैं। चाहे उनकी पत्नी डिंपल यादव पर उठे सवालों के बाद मौलानाओं का बचाव करना हो या भाजपा के आरोपों के बीच चुप्पी साधकर मुस्लिम नेतृत्व को संरक्षण देना, अखिलेश ने इस मोर्चे पर अपनी प्रतिबद्धता साफ रखी है।
नया सोशल इंजीनियरिंग: ‘अहीर, मुस्लिम और ब्राह्मण असंतोष’ का गठजोड़
सपा का परंपरागत वोट बैंक ‘माई’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण रहा है। यादव (अहीर) समुदाय आज भी अखिलेश यादव के साथ चट्टान की तरह खड़ा है। यहाँ तक कि सरकारी सेवाओं में मौजूद इस बिरादरी के लोग भी परोक्ष रूप से सपा के पक्ष में लॉबिंग करते दिखते हैं। दलितों को जोड़कर अखेश 2024 के चुनाव में भाजपा को अपना करिश्मा दिखा चुके है।
लेकिन इस बार अखिलेश की नजर योगी सरकार से कथित तौर पर नाराज ब्राह्मण मतदाताओं पर भी है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ब्राह्मण समाज का एक धड़ा, जो पारंपरिक रूप से खुद को धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था के शीर्ष पर देखता है, वर्तमान सत्ता के कुछ समीकरणों से असंतुष्ट है। अखिलेश इस असंतोष को भुनाने की कोशिश में हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने कुछ ऐसे धार्मिक चेहरों और ‘शंकराचार्य’ का भी परोक्ष समर्थन हासिल किया है, जो भाजपा विरोधी रुख रखते हैं। अखिलेश इस बार ‘ब्राह्मण-मुस्लिम-यादव-दलित’ का एक नया और अप्रत्याशित गठजोड़ तैयार करने में जुटे हैं।
मीडिया का परोक्ष समर्थन और ऐतिहासिक संबंध
अखिलेश यादव की एक और बड़ी ताकत मीडिया जगत में उनका प्रभाव है। समाजवादी पार्टी का इतिहास पत्रकारों और मीडिया घरानों को उपकृत करने का रहा है। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने लखनऊ के पॉश इलाके गोमतीनगर में बाकायदा ‘पत्रकारपुरम’ बसाकर पत्रकारों को भूखंड बांटे थे। सपा सरकारों के दौरान ट्रांसफर-पोस्टिंग और सरकारी विज्ञापनों के पैकजो व पदों के वितरण का एक ऐसा नेटवर्क रहा है, जिसने पत्रकारों के एक बड़े वर्ग को आर्थिक और सामाजिक रूप से लाभ पहुंचाया। यही कारण है कि आज भी मुख्य मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अखिलेश यादव के प्रति नरम रुख रखता है और उनके नैरेटिव को आगे बढ़ाने में मदद करता है। यही नहीं अखिलेश अंधाधुंध सरकारी खजाना बांटने में भी पीछे नहीं रहते हैं। लैपटॉप बाटने से लेकर बेरोजगारी भत्ता से लेकर कई वादे करके चुनाव जीतना उनका तरीका रहा है। अभी ही महिलाओं को 40 हजार देने की घोषणा कर दी। जिसकी काट में, आनन-फानन में योगी आदित्यनाथ सरकार को 50 हजार बांटने की घोषणा करनी पड़ी।
2027 का उत्तर प्रदेश का रण बेहद दिलचस्प होने वाला है। एक तरफ जहां भाजपा का मजबूत संगठन और योगी आदित्यनाथ का ब्रांड है, वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव का जमीनी कैडर, मजबूत अल्पसंख्यक-यादव आधार, ब्राह्मणों में सेंध लगाने की रणनीति और मीडिया का एक वर्ग है। निश्चित रूप से, आने वाले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी भाजपा को एक बेहद कड़ी और कांटे की टक्कर देने जा रही है।
(अगले विश्लेषण में हम अन्य विपक्षी दलों में बसपा की ताकत और उनकी रणनीतियों की समीक्षा करेंगे।)




