लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा (नितिन नवीन की नई टीम के संदर्भ में) की टीम के ऐलान के साथ ही उत्तर प्रदेश में संगठन को मजबूती देने के लिए महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। देश के सबसे बड़े राजनीतिक प्रदेश में बीजेपी ने महाराष्ट्र के कद्दावर नेता विनोद तावड़े को प्रभारी और गुजरात के पूर्व विधायक जगदीश पटेल को सह-प्रभारी का दायित्व सौंपा है।
विनोद तावड़े पर क्यों जताया भरोसा?
विनोद तावड़े का नाम यूपी के प्रभारी के तौर पर पिछले काफी समय से चर्चा में था। दिसंबर में जब वे प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी (पंकज चौधरी के स्थान पर नामित) के साथ लखनऊ पहुंचे थे, तभी से यह स्पष्ट संकेत मिलने लगे थे कि पार्टी उन्हें यूपी की कमान सौंप सकती है। तावड़े की राजनीतिक साख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बिहार में नीतीश कुमार को पुनः एनडीए में वापस लाने में उन्होंने ‘पर्दे के पीछे’ से बड़ी भूमिका निभाई थी। उनकी संयमित कार्यशैली और ओबीसी पृष्ठभूमि उन्हें यूपी के जटिल राजनीतिक समीकरणों को साधने के लिए उपयुक्त बनाती है।
कुर्मी वोट बैंक को साधने की कोशिश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विनोद तावड़े और जगदीश पटेल की नियुक्ति के जरिए बीजेपी ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत ‘डबल कार्ड’ खेला है। यूपी में पिछले कुछ समय से कुर्मी समुदाय का एक बड़ा वर्ग पार्टी से छिटकता दिखाई दिया है। लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी की सीटों में आई कमी के पीछे कुर्मी वोटों के ध्रुवीकरण को एक बड़ा कारण माना जा रहा है।
भले ही राज्य में स्वतंत्र देव सिंह, संजय गंगवार, राकेश सचान और अनुप्रिया पटेल जैसे कुर्मी चेहरे मौजूद हैं, लेकिन पार्टी का मानना है कि ये नेता पूरे समुदाय में व्यापक प्रभाव पैदा करने में उतने सफल नहीं रहे जितने की आवश्यकता है। इनमें से कई नेता अन्य दलों से आए हैं, जिससे पार्टी को जमीनी स्तर पर एक मजबूत और स्वीकार्य नेतृत्व की कमी खल रही थी।

पटेल कनेक्शन और ‘पीडीए’ की चुनौती
गुजरात से आने वाले जगदीश पटेल को सह-प्रभारी बनाकर पार्टी ने यूपी के पटेल (कुर्मी) समुदाय के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाने का प्रयास किया है। पटेल सरनेम वाले समुदाय का यूपी में सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रति विशेष लगाव है। जगदीश पटेल का वाराणसी (प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र) में पहले से ही सक्रिय रहना यह दर्शाता है कि बीजेपी इस बार कोई जोखिम नहीं लेना चाहती।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि विनोद तावड़े, जो अब राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर हैं, वे समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले का मुकाबला कैसे करेंगे। 2024 के लोकसभा परिणामों के बाद, जहां वाराणसी जैसी सीट पर भी जीत का अंतर कम हुआ, पार्टी की चिंताएं बढ़ी हैं।
विनोद तावड़े की शांत छवि और जगदीश पटेल का सामुदायिक प्रभाव, क्या ये दोनों मिलकर यूपी में बीजेपी की खोई हुई जमीन वापस ला पाएंगे? यह आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि बीजेपी का यह कदम आगामी चुनावों की तैयारियों का शंखनाद है। फिलहाल सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता और कुर्मी समुदाय इस नई नियुक्ति पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।






