आशु भटनागर। नोएडा में मजदूर हिंसा पर नोएडा पुलिस कमिश्नरेट और जिला प्रशासन द्वारा मजदूरो और उनके नेताओ पर ताम मुकदमे लगाये गये थे, साथ ही कुछ नेताओ पर NSA भी लगाया गया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले सप्ताह एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसले में उन्ही नेताओ में से एक दिल्ली यूनिवर्सिटी की 24 वर्षीय लॉ स्टूडेंट और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत की गई हिरासत को रद्द कर दिया था, सोमवार को उसी पर विस्तृत फैसला आया। इस फैसले के दौरान अदालत ने नोएडा की नोएडा पुलिस कमिश्नरेट और जिला मजिस्ट्रेट (DM) मेधा रूपम द्वारा NSA का आदेश जारी करने के ढर्रे पर बेहद कड़ा रुख अपनाया। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने चेतावनी दी कि यदि अफसरशाही का यही “तानाशाही रवैया” जारी रहा, तो उत्तर प्रदेश बहुत जल्द एक “ऑर्वेलियन डिस्टोपिया” (एक ऐसा दमनकारी राज्य जहां सरकार का संपूर्ण नियंत्रण हो और नागरिकों की आजादी शून्य हो जाए) में बदल सकता है।
कोर्ट ने नोएडा पुलिस कमिश्नरेट और जिला प्रशासन की कार्यशैली पर स्पष्ट शब्दों में कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के पुलिस अधिकारियो की सिफारिश पर जिला अधिकारी का NSA का आदेश थमा देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
पर क्या इस फैसले की महत्ता केवल एक हिरासत को रद्द करने तक सीमित है? या फिर अदालत ने सरकार, पुलिस और प्रशासनिक तंत्र (IAS-IPS) के अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर जो गंभीर टिप्पणियां की हैं, वे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक बड़े आत्ममंथन का विषय हैं, आज हम उसी पर चर्चा करेंगे।
विरोध-प्रदर्शन: लोकतंत्र का ‘सेफ्टी वॉल्व’, नौकरशाही की असीमित ताकत और किपलिंग की चेतावनी!
उत्तर प्रदेश में बीते १० वर्षो में जहा एक और माफिया राज समाप्त हुआ है और कानून वयवस्था सुदृढ़ हुई है तो दूसरी और लगातार पुलिस और प्रशासन की ज्यादतियों पर भी प्रश्न उठते रहे हैI विपक्ष ही नहीं सामान्य नागरिक भी लगातार लोकतांत्रिक वयवस्था पर नौकरशाही के हावी होने की बात स्वीकारने लगे है I सरकारी सिस्टम से पीड़ित एक आम व्यक्ति के लिए कानून और न्याय अब भी दूर की कौड़ी दिखाई देता हैI मोबाइल खोने की एक साधारण FIR लिखवाने के लिए भी लोगो को सोशल मीडिया पर सहारा लेना पड़ता है। ऐसे में इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है कि हर समाज में सरकारी कामकाज को लेकर असहमति और तनाव होना स्वाभाविक है और नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन की इजाजत देना “प्रेशर कुकर में लगे सेफ्टी वॉल्व” की तरह काम करता है। यधपि इन टिप्पणियों में हाल ही मे काक्रोच जनता पार्टी के नाम पर छात्रो द्वारा नीट पेपर लीक के विरुद्ध जंतर मंतर पर हुए आन्दोलन की छाप भी दिखाई देती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जनता के गुस्से और असहमति को दबाया जाएगा, तो यह दबाव धीरे-धीरे जमा होकर एक दिन उग्र हिंसा का रूप ले लेगा। तब सड़कों पर उतरने वाले जनाक्रोश को संभालना कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए भी नामुमकिन हो जाएगा। इसलिए, विरोध को कुचलने के बजाय उसे लोकतांत्रिक जगह देना ही राज्य की स्थिरता के हित में है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में आईएएस (IAS) और आईपीएस (IPS) अधिकारियों की भूमिका पर बेहद तीखी और वैचारिक टिप्पणी की गई। कोर्ट ने कहा कि कानून ने इन अधिकारियों को असीम शक्तियां दी हैं ताकि वे नागरिकों के अधिकारों, गरिमा और कल्याण की रक्षा करते हुए राज्य की स्थिरता बनाए रखें। लेकिन शक्ति के साथ जिम्मेदारी का होना अनिवार्य है।

नौकरशाही के संवेदनहीन रवैये पर प्रहार करते हुए पीठ ने रुडयार्ड किपलिंग के उस प्रसिद्ध कथन का जिक्र किया (जिसे बाद में स्टेनली बाल्डविन ने भी दोहराया था)—
“बिना जिम्मेदारी के ताकत – सदियों से वेश्या का विशेषाधिकार रही है।”
अदालत ने कहा कि जब अफसरशाही बिना मानवीय संवेदना और जिम्मेदारी के अपनी ताकत का अंधाधुंध इस्तेमाल करती है, तो इसका खमियाजा सीधे तौर पर आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है।
राजनीतिक आकाओं के प्रति नहीं, संविधान के प्रति हो निष्ठा
देखा जाए तो यूपी में 30 वर्षो पहले शुरू हुई राजनैतिक अस्थिरता और निरंकुशता ने IAS‑IPS को राजनेताओ के अनुसार चलने का चलन भी दिया था बाद में पूर्ण बहुमत की सरकारों बढ़ती निष्ठाओ के बीच क्या IAS‑IPS के अधिकारियों को अपने कर्तव्य‑निष्ठा, संवैधानिक निष्ठा और जनता‑सेवा के मूल मंत्र को दोबारा याद करना आवश्यक है ? संभवत हाँ, इसीलिए देश की सबसे कठिन परीक्षा पास करके आने वाले IAS और IPS अधिकारियों को उनकी संवैधानिक शपथ याद दिलाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ये अफसर देश की सबसे बेहतरीन प्रतिभाओं में से हैं। सेवा में आने से पहले वे संविधान के प्रति निष्ठा और बिना किसी भय या पक्षपात के काम करने की शपथ लेते हैं।
इस आदेश के बहाने अदालत ने IAS और IPS अधिकारियों को दो टूक लहजे में याद दिलाया है कि अधिकारियों की पहली और अंतिम निष्ठा भारत के संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी तात्कालिक राजनीतिक कार्यपालिका (राजनीतिक आकाओं) के प्रति। उनकी निष्पक्षता और ईमानदारी उन नागरिकों के प्रति होनी चाहिए जिनकी सेवा का दायित्व उन्हें सौंपा गया है। लोकतंत्र में जनता ही ‘असली मालिक’ है और अधिकारी महज उनके सेवक हैं।
यह फैसला साफ संदेश देता है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर राजनैतिक दबाब में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की बलि नहीं दी जा सकती। यदि नौकरशाही राजनीतिक दबाव में आकर अपनी जवाबदेही भूलती है, तो न्यायपालिका संविधान की रक्षा के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके लोकतान्त्रिक मूल्यों को सुरक्षित करेगी।





