नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में मॉनसूनी बारिश की शुरुआत के साथ ही बुनियादी ढांचे की खस्ताहाली एक बार फिर उजागर हो गई है। रविवार दोपहर साउथ कैंपस थाना क्षेत्र के व्यस्त सत्य निकेतन इलाके में एक तीन मंजिला इमारत भरभराकर गिर गई। इस हादसे में करीब आठ लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका जताई जा रही है। घटना के बाद से ही पूरे इलाके में अफरा-तफरी का माहौल है।
राहत और बचाव कार्य जारी
दमकल विभाग को इस हादसे की सूचना दोपहर करीब 1:30 बजे मिली। सूचना मिलते ही पुलिस, फायर ब्रिगेड और आपदा प्रबंधन की टीमें तुरंत मौके पर पहुंचीं और राहत-बचाव कार्य शुरू कर दिया गया। शुरुआती जानकारी के अनुसार, यह इमारत लड़कों के हॉस्टल (पीजी) के रूप में इस्तेमाल की जा रही थी।
स्थानीय लोग भी तत्परता दिखाते हुए बचाव कार्य में प्रशासन का हाथ बंटा रहे हैं। हालांकि, अभी तक किसी जानमाल के बड़े नुकसान की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मलबे को हटाने का काम तेजी से जारी है।
प्रशासनिक नाकामी और राजनीतिक चुप्पी का नतीजा?
सत्य निकेतन की यह घटना केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह दिल्ली नगर निगम (MCD) और स्थानीय प्रशासन की उस गंभीर लापरवाही को दर्शाती है, जिसे हर साल नजरअंदाज कर दिया जाता है। दक्षिण दिल्ली का यह क्षेत्र देश भर से आए छात्रों का प्रमुख केंद्र है। इसके बावजूद, इस क्षेत्र में बिना ‘स्ट्रक्चरल सेफ्टी ऑडिट’ (संरचनात्मक सुरक्षा जांच) के बहुमंजिला पीजी धड़ल्ले से चलाए जा रहे हैं।

दिल्ली में हर साल बारिश के दौरान इमारतों के गिरने, जलभराव और जर्जर ढांचों के ढहने की घटनाएं सामने आती हैं। इसके बावजूद, स्थानीय निकायों और राजनीतिक दलों का ध्यान केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रहता है। जब भी कोई हादसा होता है, तो जांच के आदेश दे दिए जाते हैं, लेकिन जर्जर इमारतों की समय रहते पहचान करने और उन पर बुलडोजर चलाने या उन्हें खाली कराने की कोई ठोस नीति अब तक धरातल पर नहीं दिखती।







