आशु भटनागर। राजधानी से सटे हाईटेक शहर नोएडा के डूब क्षेत्र (फ्लोडप्लेन एरिया) में बीते छह दिनों से जारी ब्लैकआउट ने एक नया सियासी और सामाजिक मोड़ ले लिया है। पावर कॉरपोरेशन द्वारा डूब क्षेत्र की 40 से अधिक कॉलोनियों के लगभग 3,000 से अधिक बिजली कनेक्शन काटे जाने के विरोध में रविवार को पर्थला गांव के पुस्ता रोड पर ‘महापंचायत’ का आह्वान किया गया है। भारतीय किसान परिषद (BKP) के नेतृत्व में होने वाली इस महापंचायत में प्रभावित निवासी और कई अन्य किसान संगठन आगे की रणनीति तय करेंगे।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने नोएडा के प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है—क्या यह आंदोलन सचमुच प्रभावित आम जनता के अधिकारों की लड़ाई है, या फिर इसके पीछे अवैध निर्माण, भू-माफिया और राजनीतिक रसूखदारों के हितों को बचाने का खेल चल रहा है?
छह दिन से अंधेरे में हजारों जिंदगियां, शासन के संज्ञान के बाद कार्रवाई
सहारनपुर में शाकम्भरी देवी से आरम्भ होने वाली हरनंदी (हिंडन) जब नोएडा में आती है तो तंग हो जाती है क्योंकि इसके डूब क्षेत्र में पिछले दो दशक से भी अधिक समय से हजारों की आबादी रह रही है। कहा जाता है कि स्थानीय नेताओ और भुमाफियायो ने यहाँ नदी के क्षेत्र में ही अवैध कालोनियों को काट दिया है। थोड़ी ही बारिश में यहाँ प्रत्येक वर्ष इन घरो में पानी भी भर जाता हैI वो बात भी अलग है कि बीते 2 दशक से ही हरनंदी के मुहानों पर रिवर फ्रंट बना कर नदी को संरक्षित करने का प्लान भी कहीं दबा पड़ा हैI आरोप है कि भुमाफियायो ने अवैध कालोनी काटी तो विद्युत निगम के अधिकारियों, ठेकेदारों और स्थानीय बिचौलियों की मिलीभगत से यहां धड़ल्ले से अवैध बिजली कनेक्शन बेचे जा रहे थे। लोग हर महीने बिजली का भुगतान भी कर रहे थे, लेकिन यह राजस्व सरकारी खजाने के बजाय भ्रष्टाचार की बलि चढ़ रहा था।
उत्तर प्रदेश ट्रांस्फोर्मेशन आयोग के चेयरमेन मनोज कुमार सिंह के जरिये जब यह मामला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संज्ञान में आया, तो विद्युत निगम ने कड़ा रुख अपनाते हुए एक साथ 3,000 से अधिक अवैध कनेक्शन काट दिए। नतीजतन, पिछले छह दिनों से हजारों परिवार भीषण गर्मी और अंधेरे में रहने को मजबूर हैं।

अब भारतीय किसान परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुखबीर खलीफा का कहना है, “बिजली इंसानी जरूरत है। लोग बिजली का पैसा दे रहे थे और वैध कनेक्शन की प्रक्रिया पूरी करने को तैयार हैं। हमने जिलाधिकारी और एमडी के सामने पक्ष रखा है। सरकार को जल्द संज्ञान लेकर प्रक्रिया के तहत कनेक्शन देने चाहिए।”
किसान आंदोलनों की मंशा पर उठते सवाल: अधिकार या ब्लैकमेलिंग?
हालाँकि, इस मामले पर कॉर्पोरेट जगत, प्रबुद्ध वर्ग और सोशल मीडिया पर एक अलग ही जनमत उभर रहा है। कई लोगों का मानना है कि किसान नेताओं द्वारा ऐसे मुद्दों को उठाना दरअसल भू-माफियाओं को राजनीतिक संरक्षण या ‘कवर फायर’ देने जैसा है।
सोशल मीडिया मंच ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर इस मामले पर पहले दिन से आवाज़ उठा रही बड़े बाहुबली नेता ब्रजभूषण सिंह की पुत्री शालिनी सिंह के ट्वीट का उद्धरण (Quote) देते हुए ‘नोएडा अपडेट’ नामक यूजर ने लिखा कि यदि मानवीय संवेदना ही एकमात्र आधार है, तो पूरे नोएडा में अवैध कॉलोनियां कटवाकर लोगों को बसा दिया जाना चाहिए।
नाम न छापने की शर्त पर एक स्थानीय नेता ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा कि यदि निष्पक्ष जांच हो, तो यह बात सामने आएगी कि कल तकऐसे कई लोग जो बिजली कनेक्शन के नाम पर उगाही कर रहे थे, आज वही यहाँ नेताओ की मीटिंग करवा रहे हैं और क्रांति का झंडा उठाए खड़े हैं। कई का दावा है कि डूब क्षेत्र की इन अवैध कॉलोनियों और बहुमंजिला इमारतों में पक्ष और विपक्ष के कई नेताओं के अपने कमर्शियल और आवासीय शेयर हैं, जिसे बचाने के लिए किसान संगठनों का सहारा लिया जा रहा है।
अवैध कालोनियों का कडवा सच और मजदूरों की मजबूरी: वरिष्ठ पत्रकारों का विश्लेषण
वरिष्ठ पत्रकार राजेश बैरागी ने इस जटिल सामाजिक ताने-बाने को रेखांकित करते हुए लिखा है कि इन अविकसित और अनियोजित कॉलोनियों में रहने वाले लोग केवल अपनी और अपने बच्चों की भूख मिटाने के संघर्ष में यहां रहने को मजबूर हैं। वे नोएडा जैसे महानगरों की आर्थिक गाड़ी को चलाने वाले मुख्य पहिए (श्रमिक वर्ग) हैं, और वे केवल मतदाता बनकर रह गए हैं। उनके पास सरकारी दस्तावेज तो हैं, लेकिन नदी के डूब क्षेत्र में बाढ़ के साये में जीना उनकी नियति बन चुकी है। वो प्रशासनिक व्यवस्था का कड़वा सच ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के एक वरिष्ठ अधिकारी के बयान से बताते है। कि “जब भी शाहबेरी या डूब क्षेत्र में अवैध बिल्डिंगों पर बुलडोजर चलता है, तो तुरंत बड़े नेताओं और अधिकारियों के फोन आने लगते हैं—’तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारी बिल्डिंग पर हाथ लगाने की?'”
बड़ा सवाल: समाधान क्या है?
यह मामला कानून के शासन बनाम मानवीय अधिकारों के बीच की एक बेहद बारीक रेखा पर खड़ा है। एक तरफ जहां बाढ़ संभावित संवेदनशील क्षेत्रों में अवैध निर्माण और बिजली चोरी को रोकना प्रशासन की कानूनी जिम्मेदारी है, वहीं दूसरी तरफ हजारों परिवारों को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के अचानक अंधकार में धकेल देना एक मानवीय संकट को जन्म देता है।
रविवार को होने वाली महापंचायत केवल बिजली कनेक्शन की मांग तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह यह भी तय करेगी कि नोएडा का प्रशासनिक तंत्र भू-माफियाओं के गठजोड़ को तोड़ने में कितना सक्षम है और क्या सरकार इन गरीब परिवारों के पुनर्वास या वैध विकल्पों के लिए कोई ठोस नीतिगत रास्ता निकाल पाती है। इस पूरी स्थिति ने नीति-निर्माताओं के सामने कई यक्ष प्रश्न खड़े कर दिए हैं
कानून का नियम बनाम मानवीय जरूरत: क्या अवैध क्षेत्र में बिजली देना अवैध निर्माण को बढ़ावा देना नहीं है?
प्रशासनिक जवाबदेही: 10 साल तक अधिकारियों की नाक के नीचे 3,000 अवैध कनेक्शन कैसे चलते रहे? उन अधिकारियों पर क्या कार्रवाई हुई?
राजनीतिक इच्छाशक्ति: क्या भारतीय किसान परिषद या अन्य नेता केवल राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं, या फिर यह अवैध रियल एस्टेट साम्राज्य को बचाने की एक सोची-समझी ढाल है?
ऐसे में प्रबुद्ध वर्ग का यही मानना है कि नोएडा जैसे अंतरराष्ट्रीय शहर के लिए अनियंत्रित और अवैध शहरीकरण एक बड़ा धब्बा है। सरकार को एक तरफ जहां आम निवासियों को मानवीय आधार पर तात्कालिक राहत (या पुनर्वास) देने पर विचार करना चाहिए, वहीं दूसरी तरफ भू-माफिया और भ्रष्ट तंत्र के इस गठजोड़ पर कड़ी कानूनी स्ट्राइक की सख्त जरूरत है। लखनऊ की गोमती रिवर फ्रंट की तरह हरनंदी रिवर फ्रंट का विकास भी जल्द शुरू होना चाहिए और यहाँ के विस्थापितों को भी लखनऊ की तरह विस्थापन से पहले कोई जनता फ्लैट देने जैसी योजनाये लानी चाहिए I





