आशु भटनागर। सत्ता के गलियारों से में प्रथम कथा दादरी विधानसभा से है जहां चुनावी वर्ष होने के चलते दादरी विधायक तेजपाल नागर और भाजपा जिला अध्यक्ष अभिषेक शर्मा ग्रेटर नोएडा वेस्ट की एक सोसाइटी में बढ़ाए गए मेंटिनेंस शुल्क को कम करवाने के लिए सोसाइटी की जनता के बीच पहुंच गए। चुनावी वर्ष हो तो नेता ऐसे लोक लुभावन कार्य करते ही करते है। विधायक जी भी जनता के बीच पहुंचे और वहां खड़े होकर मेंटेनेंस को पुरानी दरों पर ही करने का वादा कर दिए, खूब तालियाँ बजी, इसके बाद जिला अध्यक्ष उनसे भी दो कदम आगे बढ़े और बोले की दरों में कमी के बावजूद सुविधाओं में कोई कटौती नहीं होगी और अगर एक भी कमी होगी तो आप विधायक जी को बता दीजियेगा। खैर ख्होब तालियाँ बजी जब मजमा समाप्त हुआ तो मेंटेनेंस कंपनी ने जनता को जो मेल भेजा, उसमें लिखा कि प्रमुख सुविधाओं के अलावा बाकी सुविधाओं में कमी की जाएगी। और सम्भवत: ये सही भी है क्योंकि अगर महंगाई बढ़ेगी तो मेंटेनेंस शुरू का बढ़ना तय है और बीते 2 वर्षों में पेट्रोल डीजल से लेकर हर चीज की कीमत बढ़ी है, अप्रैल के बाद सिक्योरिटी गार्डों की सैलरी भी बढ़ाई गई है। अब एक सोसाइटी का मामला पूरे ग्रेटर नोएडा वेस्ट में फैल गया है। लोग दबी जुबान में कह रहे हैं कि विधायक और भाजपा जिलाध्यक्ष अगर सोसाइटियों के मेंटेनेंस तय करवाने लगेंगे तो इन सोसाइटियों का हाल जल्दी ही प्राधिकरण द्वारा चलाई गई जा रही सोसाइटियों जैसा हो जाएगा। महंगे दामों पर इन निजी सोसाइटियों में केवल इसलिए फ्लैट खरीदे थे ताकि उन्हें उच्च स्तर की सुविधाएं और बेहतर रखरखाव मिल सके। बिना पर्याप्त मेंटेनेंस शुल्क के इन सोसाइटियों का प्रीमियम रखरखाव कैसे संभव हो पाएगा, यह एक बड़ा सवाल है। इसके साथ ही, एक दूसरा सवाल भी उतनी ही तेजी से उठ रहा है—क्या दादरी विधायक और भाजपा जिला अध्यक्ष केवल एक सोसाइटी में चुनावी नफा-नुकसान देखकर पहुंचे थे, या वे ग्रेटर नोएडा वेस्ट की सभी सोसाइटियों में मेंटेनेंस शुल्क कम करवाने की कोई व्यापक मुहिम छेड़ेंगे? फिलहाल, इस सवाल का जवाब तो आने वाला वक्त और क्षेत्र के जनप्रतिनिधि ही दे सकते हैं, लेकिन इस घटना ने सोसाइटियों के राजनीतिकरण पर एक गंभीर बहस जरूर छेड़ दी है।
दादरी सत्ता के गलियारों से में दूसरी कथा भी दादरी विधानसभा से ही है विधायक जी के मेंटेनेंस शुल्क को कम करवाने का एक बड़ा कारण शहर में टिकट मिलने से पहले ही जनसभा चुनावी जनसभाएं कर रही कुशल सिंह को लेकर कहा जा रहा है।दादरी में वैसे तो भाजपा से टिकट मांगने वाले दावेदारों की संख्या 50 से अधिक बताई जा रही थी, लेकिन ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के पूर्व जीएम की पत्नी कुशल सिंह की धमाकेदार एंट्री ने इस पूरी रेस की दिशा बदल दी है। हालात यह हैं कि टिकट की औपचारिक घोषणा से पहले ही कुशल सिंह की जनसभाएं बड़ी चुनावी रैलियों का रूप ले चुकी हैं। हर रविवार को सोसायटियों, सेक्टरों और गांवों में होने वाली उनकी बैठकें और जनसंपर्क अभियान स्थानीय निवासियों के बीच भारी चर्चा का विषय बने हुए हैं। परिणाम यह है कि अब दादरी में 50 में से बस पांच दावेदार टिकट की रेस में दिखाई दे रहे हैं इनमें सबसे आगे कुशल सिंह, उनके बाद ब्लॉक प्रमुख विजेंद्र सिंह भाटी, इंदर प्रधान, सतेंद्र अवाना और आखिर में स्वयं दादरी विधायक तेजपाल नागर हैं । टिकट किसे मिलगा वो अलग बात है पर इस रेस में कुशल सिंह ने सबके पासे पलट दिए हैं, दादरी की जनता भी यही मानने लगी है कि टिकट कुशल सिंह का ही हो रहा है। अब उसी प्रतिक्रिया में विधायक तेजपाल नागर भी “डैमेज कंट्रोल” मोड में आ गए हैं। वे लगातार खुद को तीसरी बार टिकट मिलने का दावा कर रहे हैं और इसी दावे के साथ उन्होंने एक बार फिर सोसायटियों और गांवों का तूफानी दौरा शुरू कर दिया है। अचानक बढ़ी सक्रियता को उनकी सीट बचाने की आखिरी जद्दोजहद के रूप में देखा जा रहा है। अब यह देखना ये है कि भाजपा शीर्ष नेतृत्व स्थानीय जनता की इस नब्ज को पहचानकर कुशल सिंह के चेहरे पर दांव लगाता है या फिर मौजूदा विधायक तेजपाल नागर अपनी सीट बचाने में कामयाब होते हैं या फिर कोई तीसरा ही खिलाड़ी सामने आएगा। फिलहाल, दादरी की राजनीतिक पिच पर मुकाबला भाजपा में ही बेहद कड़ा और रोमांचक हो चुका है।
सत्ता के गलियारों से में तीसरी कथा दादरी विधान सभा में टिकट की रेस में देर आयी और पहली ही बाल पर हिट विकेट हो गई महामेधा नागर को लेकर है । कहा जा रहा है कि एबीवीपी से आयी महामेधा नागर ने भी देर से ही सही दादरी से टिकट की रेस में खुद को आगे करना शुरू किया, फिलहाल टिकट की दौड़ में मजबूत दिख रहीं कुशल सिंह के कुशल राजनीतिक ताने-बाने से अलग महामेधा नागर ने दादरी में उसी पुरानी राह को पकड़ लिया है, जिसके लिए समाजवादी पार्टी पर जातिवाद का आरोप लगता रहा है। महामेधा नागर ने दादरी के लोगों के बीच खुद को गुर्जर समुदाय के बड़े हितैषी के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक मांग पत्र सौंपा। लेकिन लखनऊ दरबार में इसी मांग पत्र को उनकी टिकट की दावेदारी के लिए बेहद घातक बताया जा रहा है।दरअसल, इस मांग पत्र के जरिए महामेधा नागर खुद को एक समावेशी, सर्वस्वीकार्य और प्रगतिशील युवा नेता के रूप में पेश करने में चूक गईं। पत्र में सबसे बड़ी चूक यह मानी जा रही है कि उन्होंने आयोगों में पूरे पिछड़े समाज (OBC) के खाली पदों को भरने की व्यापक मांग उठाने के बजाय, केवल अपनी ही जाति विशेष के लोगों को अवसर देने की बात पर जोर दिया। महामेधा के इस कदम की गूंज अब लखनऊ तक सुनाई दे रही है। खबर है कि भाजपा के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नेता दबी जुबान में इस कदम से नाराजगी जता रहे हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अपनी पहली ही बड़ी राजनीतिक पहल में इस तरह का संकीर्ण रुख अपनाकर महामेधा नागर ने फिलहाल अपना राजनीतिक भविष्य और दावेदारी दोनों दांव पर लगा दी है। भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली को करीब से जानने वालों का मानना है कि पार्टी कभी भी किसी एक समाज या जाति विशेष की राजनीति को बढ़ावा देने से बचती रही है। दादरी का पिछला इतिहास भी इस बात का गवाह है। बसपा से भाजपा में शामिल हुए वर्तमान विधायक तेजपाल नागर की सफलता का बड़ा कारण यही रहा कि उन्होंने अपनी छवि को किसी जाति विशेष के घेरे में कैद नहीं होने दिया और ‘सर्वसमाज’ को साथ लेकर चले। ऐसे समय में जब भाजपा विकास और सर्वसमावेशी राजनीति के दम पर चुनाव में उतरने की तैयारी कर रही है, महामेधा नागर का यह ‘जातिगत कार्ड’ पार्टी की रीति-नीति के विपरीत देखा जा रहा है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या महामेधा नागर इस शुरुआती चूक से उबर पाएंगी या फिर लखनऊ का शीर्ष नेतृत्व दादरी के इस सियासी खेल में किसी अन्य कुशल खिलाड़ी पर दांव लगाएगा। इसका फैसला आने वाले दिनों में ही साफ हो सकेगा।








