आशु भटनागर: नवरात्रों और दशहरा का पर्व, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, इस वर्ष भी पारंपरिक भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। जहाँ करोडो भक्त माँ भगवती के नौ रूपों की आराधना में लीन रहे, करोडो लोगों ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के आदर्शों और चरित्र की पूजा की और दशहरे पर रावण दहन किया। ऐसे में, यह देखना महत्वपूर्ण है कि वामपंथी विचारधारा से भ्रमित समाज का एक छोटा वर्ग किस प्रकार महिषासुर जैसे राक्षसों में अपने पूर्वजों की छाया देखता है और कथित तोर पर रावण की जन्मभूमि पर जाकर रावण जैसे पात्रों से आत्म-साक्षात्कार बता रावण के चरित्र का गलत चित्रण कर उसे सही साबित करने का कुत्सित प्रयास करता है।
यह एक विडंबना ही है कि जहाँ एक ओर समाज सकारात्मकता और धार्मिकता की ओर अग्रसर होता है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग नकारात्मकता और अराजकता की ओर आकर्षित होते हैं। जैसा कि तुलसीदास जी ने कहा है, “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।” इसी कहावत को थोड़ा और व्यापक रूप दें तो, यह समझना आसान हो जाता है कि हमारे आंतरिक विचार ही हमें विशेष ऊर्जाओं की ओर आकर्षित करते हैं। सकारात्मक ऊर्जा हमें ईश्वर और उसके आदर्शों की ओर ले जाती है, जबकि नकारात्मक ऊर्जा हमें राक्षसों की ओर खींच सकती है और उनमें अपने आदर्श या ईष्ट ढूंढने की प्रवृत्ति को जन्म दे सकती है।
यहाँ यह तर्क दिया जा सकता है कि जैसे अयोध्या अपने लिए राम का चुनाव करती है, उसी प्रकार महिषासुर और रावण जैसे राक्षस भी अपने ‘प्रचारक’ या ‘समर्थक’ स्वयं चुन लेते हैं। यह एक चिंताजनक किन्तु सहज प्रवृत्ति है कि जहाँ अधिकांश लोग सकारात्मकता की ओर झुके हुए हैं, वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो रावण जैसे पात्रों को सही ठहराने का प्रयास करते हैं, उसके अपराधों को सामान्य मानते हैं और उन्हें वाल्मीकि रामायण से लेकर रामचरितमानस तक में स्वयं को सही साबित करने वाले तर्कों के माध्यम से महिमामंडित करते हैं।
पुरे परिपेक्ष्य में अक्सर ऐसे भ्रमित बुधिजिवियो की चर्चाएँ इस बिंदु पर आकर रुक जाती हैं कि रावण ने सीता को छुआ नहीं तो उसका दहन क्यूँ, या उसने अपने बाहुबल से सब कुछ जीता तो उसको बुरा क्यूँ कहा जा रहा है?
किन्तु आधुनिकता की दौड़ में बुद्धिजीवी बने चेतनाशून्य कुछ लोग “वाल्मीकि रामायण” या तुलसीबाबा रचित “श्रीरामचरित मानस” को न पढ़ने के कारण ये समझ नही नहीं पाते है कि सीता के रूप में रावण ने पहली बार किसी स्त्री का अपहरण नहीं किया था बल्कि हजारो वर्षो के अपने जीवन काल में उसने असंख्य स्त्रियों का अपहरण, बलात्कार किया यहाँ तक कि जब उसने अपने ही सौतेले भाई और ऋषि विश्रवा के पुत्र कुबेर के पुत्र नलकुबेर की पत्नी के साथ उसे अप्सरा कह कर सही मानते हुए बलात्कार किया तब नल कुबेर ने श्राप दिया कि अगर इसके बाद वो किसी भी स्त्री के साथ बलात सम्बन्ध बनाएगा तो उसके सर के १० टुकड़े हो जायेंगे और वो मृत्यु को प्राप्त होगा I ब्रह्मा जी से इस श्राप के सही होना जान रावन ने उसके बाद स्त्रियों का दमन छोड़ा। और इसी लिए सीता का अपहरण करने के बाबजूद उसने उन्हें अपनी रानी बन्ने के लिए दबाब बनता रहा।
परंतु, इन सब पर विचार करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि रावण नकारात्मक ऊर्जा वाले लोगों को किस प्रकार अपने पक्ष में भ्रमित करता है। “वाल्मीकि रामायण” के अनुसार, खर-दूषण की १४,००० राक्षसों की सेना को भगवान राम द्वारा नष्ट किए जाने के बाद, शूर्पणखा द्वारा रावण को दी गई सूचना के उपरांत, रावण ने मारीच से सहायता मांगी।
“वाल्मीकि रामायण” के अरण्य कांड के ३६वें सर्ग में, रावण मारीच के पास पहुँचकर श्री राम के चरित्र को अनर्गल आरोपों से बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता है और सीता के अपहरण में सहायता की माँग करता है। यह ध्यान देने योग्य है कि ऐसे ही तर्कों के माध्यम से रावण से आत्म-साक्षात्कार करने वाले लोग उसकी महिमा का गान करते हैं। रावण ने मरीच से भगवान श्री राम के विषय में क्या कहा, यह उस नराधम की दुष्ट मानसिकता को दर्शाता है।
रावण कहता है ‘तात मारीच ! मैं सब बता रहा हूँ। मेरी बात सुनो । इस समय मैं बहुत दुखी हूँ और इस दुःखको अबस्था में तुम्हीं मुझे सबसे बढ़कर सहारा देनेवाले हो॥ १॥
“तुम जनस्थानको जानते हो, जहाँ मेरा भाई खर, महाबाहु दूषण, मेरी बहिन शूर्पणखा, मांसभोजी राक्षस महाबाहु त्रिशिरा तथा और भी बहुत-से लक्ष्य वेधने में कुशल शुरबोर निशाचर रहा करते थे॥ २-३॥
“वे सभी राक्षस मेरी आज्ञासे वहाँ खर बनाकर रहते थे और उस विशाल वनमें जो धर्मांचरण करनेवाले मुनि थे, हें सताया करते थे॥४॥
“बहाँ खर के मन का अनुसरण करनेवाले तथा युद्ध विषयक उत्साहसे सम्पन्न चौदह हजार शुरवीर राक्षस रहते थे, जो भयंकर कर्म करनेवाले थे॥ ५॥
जनस्थान में निवास करनेवाले जितने महाबली राक्षस थे, वे सब-के-सब उस समय अच्छी तरह सन्नद्ध होकर युद्धक्षत्रमें रमके साथ जा भिड़े थे॥ ६॥
“वे खर आदि राक्षस नाना प्रकार के अख-शस्त्रों का प्रहार करनेमें कुशल थे, परंतु युद्धके मुहाने पर रोष में भरे हुए श्रीरामने बिना कोई कठोर वचन बोले (अमुक्त्वा परुषं किंचित्), सीधे अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर युद्ध शुरू कर दिया (शरैर्व्यापारितं धनुः)॥ ७॥ ।
“पैदल और मनुष्य होकर भी रामने अपने दमकते हुए. बाणोंसे भयेकर तेजबाले चौदह हजार राक्षसोंका विनाश कर डाला और उसी युद्धमें खरको भी मौतके घाट उतारकर दूषण को भी मार गिराया। साथ हों त्रिशिर का वध करके उसने दण्डकारण्य को दूसरों के लिये निर्भय बना दिया॥
“उसके पिताने कुपित होकर उसे पत्नीसहित घरसे निकाल दिया है। उसका जीवन क्षीण हो चला है। यह क्षत्रियकुल- कलंक राम ही उस राक्षस-सेना का घातक है॥
“वह शीलरहित, क्रूर, तीखे स्वभाववाला, मूर्ख, लोभी, अजितेन्द्रिय, धर्मत्यागी, अधर्मात्मा और समस्त प्राणियोंके अहित में तत्पर रहनेबाला है। जिसने बिना किसी बैर-विरोध के केवल बलका आश्रय ले मेरी बहिनके नाक-कान काटकर उसका रूप बिगाड़ दिया, उससे बदला लेनेके लिये मैं भी उसको देवकन्याके समान सुन्दरी पत्नी सीता कों जनस्थानसे बलपूर्वक हर लाऊँगा। तुम उस कार्यमें मेरी सहायता करो ॥ १९ ॥
“हे महाबली राक्षस! तुम्हारे जैसे पास रहने वाले सहायक के रहते और अपने (कुंभकर्ण आदि) भाइयों के बल पर, मैं यहाँ (युद्ध भूमि में) देवताओं को भी कुछ नहीं समझता (यानी देवताओं की भी परवाह नहीं करता)। इसलिए तुम मेरे सहायक बनो, क्योंकि तुम इस कार्य में पूरी तरह समर्थ हो।”॥ १५ ॥
इसके विपरीत, मारीच रावण को भगवान श्री राम के बारे में सच्चाई बताता है और इस योजना को अपने विनाश का कारण बताता है। रावणके मुख से श्री रामचन्द्र जी को चर्चा सुनकर मारीच का मुँह सूख गया। वह भय से थर्रा उठा। वह अपलक् नेत्रों से देखता हुआ अपने सूखे ओठों कों चाटने लगा। उसे इतना दुःख हुआ कि वह मुर्दा-सा दिखायी देने छगा। उसी अवस्था में उसने रावण की ओर देखा॥ उसे महान् वन में श्री रामचन्द्र जी के पराक्रमका ज्ञान हो चुका था; इसलिये वह मन-हो-मन अत्यन्त भयभीत और दुखी हो गया तथा हाथ जोड़कर रावण से यथार्थ वचन बोला। उसकी वह बात रावण के तथा उसके अपने लिये भी हितकर थी॥
“वाल्मीकि रामायण” के अरण्य कांड के ३७वें सर्ग में मारीच रावण को समझाते हुए कहता है कि ‘राजन् ! सदा प्रिय वचन बोलनेवाले पुरुष तो सर्वत्र सुलभ होते हैं; परंतु जो अप्रिय होनेपर भी हितकर हो, ऐसी बात के कहने और सुननेवाले दोनों हो दुर्लभ है॥ २॥ “तुम कोई गुप्तचर तो रखते नहीं और तुम्हारा इृदय भी बहुत ही चञ्जल है; अत: निश्चय हो तुम रामचन्द्र जी को बिलकुल नहीं जानते। वे पराक्रमोचित गुणोंमें बहुत यढ़े-चढ़े तथा इन्द्र और वरुणके समान हैं॥३॥ “तात | मैं तो यहीं चाहता हूँ कि समस्त राक्षसोंका कल्याण हो। कहीं ऐसा न हो कि श्रीरामचन्द्र जों अत्यन्त कुपित हो समस्त लोकोंको राक्षसोंसे शुन्य कर दें ? वे (श्रीरामचन्द्र) अपने पिता द्वारा त्यागे (निष्कासित) नहीं गए हैं (अर्थात उन्होंने पिता की आज्ञा से धर्मपूर्वक वनवास स्वीकार किया है, किसी अपराध के कारण उन्हें निकाला नहीं गया है)। वे किसी भी प्रकार से मर्यादाहीन या अमर्यादित आचरण करने वाले नहीं हैं। वे लोभी या लालची नहीं हैं। वे बुरे चरित्र या दुष्ट स्वभाव वाले भी नहीं हैं। और न ही वे क्षत्रिय कुल को कलंकित करने वाले या अपने वंश का नाम डुबाने वाले हैं।
रावण और मारीच के बीच के इस संवाद से यह स्पष्ट हो जाता है कि रावण किस प्रकार त्रेता की भांति कलियुग में अपने चरित्र को सही ठहराने के लिए नए ‘मारीच ‘ ढूंढता रहता है, और कलियुग में अक्सर इसमें सफल भी हो जाता है। और वो मारीच इस आत्म-साक्षात्कार को अपनी उपलब्धि बताकर लोगो से रावण का महिममंडन करते फिरते हैं ।
“श्रीरामचित मानस” में भगवान शिव द्वारा माता पार्वती को सुनाई गई रामायण की कथा के अनुसार, रामायण की यह गाथा सदा चलती रहती है। यदि हम इस परिप्रेक्ष्य में देखें, तो दशहरे से पहले या बाद में रावण के चरित्र का बखान करने वाले लोग, जो उसमें अपना पूर्वज, अपनी जाति या अपने हिस्से की कोई नकारात्मकता खोजते हैं, वे वास्तव में मानव रूप में उन राक्षसों के वंशज हैं, जिनमें वे अपना आदर्श ढूंढ रहे हैं। प्रत्येक वर्ष नवरात्र के ऐसे समय जहाँ समाज में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो रहा है। ऐसे लोग नकारात्मकता की ओर आकर्षित होकर न केवल रावण के चरित्र को सही ठहराने का प्रयास करते हैं, बल्कि उस परम्परा को भी जीवित रखते हैं, जिसकी परिणति कभी सुखद नहीं हो सकती। उनकी परिणिति कुछ भी हो किन्तु लगातार चल रही रामायण के मध्य मानवो के बीच भी यह एक वैचारिक संघर्ष है, जहाँ अच्छाई और बुराई, सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच की रेखा धुंधली होती जा रही है और ये हम सभी का कर्तव्य है कि हम समय समय पर रावण द्वारा उसके चरित्र के लिए खोजे गये और अपने लिए प्रयोग किया जा रहे मारीचो का वही वैचारिक हश्र करें जो भगवान श्रीराम ने त्रेता में मर्ग रूपी मारीच का किया था।



