आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मी अभी से तेज हो गई है। राज्य में मुख्य विपक्षी गठबंधन का हिस्सा रहे समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच आगामी चुनाव को लेकर सीट बंटवारे पर औपचारिक बातचीत शुरू हो चुकी है। कांग्रेस पार्टी ने अपनी चुनावी तैयारियों को धार देते हुए उन लगभग 200 विधानसभा क्षेत्रों की पहचान की है, जहां पार्टी अपनी मजबूत मौजूदगी के आधार पर चुनाव लड़ना चाहती है। हालांकि, पार्टी ने यह स्पष्ट किया है कि इस सूची का अर्थ यह नहीं है कि गठबंधन के तहत वह इतनी ही सीटों की मांग कर रही है। कांग्रेस के लिए संख्या से अधिक गठबंधन में एक ‘सम्मानजनक हिस्सेदारी’ सर्वोपरि है।
रणनीति के तहत चार श्रेणियों में बंटी सीटें
कांग्रेस की ओर से तैयार की गई संभावित सीटों की सूची को चार अलग-अलग श्रेणियों (ए, बी, सी और डी) में विभाजित किया गया है। इन श्रेणियों के आधार पर ही पार्टी सपा के साथ समझौते की रूपरेखा तय कर रही है। विशेष रूप से ‘कैटेगरी ए’ (मजबूत सीटें) में उन क्षेत्रों को रखा गया है, जहां पार्टी हर हाल में अपने उम्मीदवार उतारना चाहती है। कुछ चुनिंदा सीटों पर कांग्रेस अपने रुख पर पूरी तरह कायम रहना चाहती है, जबकि अन्य सीटों पर राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार फेरबदल और समझौते की गुंजाइश रखी गई है।
सीट बंटवारे को लेकर हाल ही में उच्च स्तर पर प्रारंभिक चर्चाएं हुई हैं। इसके बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुवाई में पार्टी की तीन महत्वपूर्ण आंतरिक बैठकें संपन्न हुईं। इन बैठकों में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की अध्यक्ष आराधना मिश्रा, कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष इमरान मसूद और राज्य प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम विशेष रूप से मौजूद रहे। पार्टी सूत्रों के अनुसार, इन बैठकों में चुनावी रणनीति, क्षेत्रीय समीकरण और सीटों के आदान-प्रदान से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श किया गया।
पार्टी के भीतर एक धड़े का ये भी मानना है कि कांग्रेस को कम से कम 115 से 120 सीटों से कम पर समझौता नहीं करना चाहिए। वहीं, उत्तर प्रदेश के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने पार्टी के लिए कुल विधानसभा सीटों के 50 प्रतिशत हिस्से पर चुनाव लड़ने की वकालत की है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश का राजनीतिक समीकरण
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य की बात करें तो यहां कुल 136 विधानसभा सीटें हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके सहयोगियों ने इस क्षेत्र में शानदार प्रदर्शन करते हुए 91 सीटों पर जीत दर्ज की थी, अकेले भाजपा के खाते में 71 सीटें आई थीं। वहीं, समाजवादी पार्टी ने राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के साथ गठबंधन में 43 सीटें जीती थीं।
इस बार के चुनाव में कांग्रेस पश्चिमी यूपी में 60 से अधिक सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी पेश करने की तैयारी में है। इसमें मुख्य रूप से दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण बहुल सीटें और प्रमुख शहरी क्षेत्र शामिल हैं। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने सहारनपुर की 5, अमरोहा की सभी 4, गाजियाबाद की 3 और गौतम बुद्ध नगर की 3 विधानसभा सीटों को ‘कैटेगरी ए’ में रखा है। इसके अलावा मुरादाबाद, आगरा, अलीगढ़ और बरेली जिलों की 25 से अधिक सीटों को ‘कैटेगरी बी’ के तहत रखा गया है, जबकि 10 से 15 सीटें ‘सी’ और ‘डी’ कैटेगरी में हैं, जिन पर सपा के साथ समझौते की गुंजाइश छोड़ी गई है।
गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की सीटों का समीकरण
पश्चिमी यूपी के गौतम बुद्ध नगर जिले की तीनों विधानसभा सीटों (नोएडा, दादरी और जेवर) का राजनीतिक गणित इस बार गठबंधन के भीतर खासी चर्चा का विषय बना हुआ है। इतिहास पर नजर डालें तो समाजवादी पार्टी इन तीनों ही सीटों पर कभी भी चुनावी जीत दर्ज नहीं कर पाई है। इसके विपरीत, कांग्रेस का यहां पुराना आधार रहा है; पार्टी जेवर सीट पर तीन बार जीत हासिल कर चुकी है। वर्ष 2012 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े धीरेंद्र सिंह बसपा के वेदराम भाटी से मामूली अंतर से हारकर दूसरे स्थान पर रहे थे। कांग्रेस का मानना है कि बीजेपी और वर्तमान विधायक धीरेन्द्र सिंह के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी (Anti-Incumbency) यानी “सत्ता विरोधी लहर” के चलते यहाँ से लड़कर अपनी पुरानी सीट को पाया जा सकता है। कांग्रेस में यहाँ से लगभग 3 दावेदार अजय छोंकर, सतीश शर्मा और सुरेन्द्र प्रताप सिंह अपनी दावेदारी कर रहे है I
इसी तरह, दादरी विधानसभा क्षेत्र में भी कांग्रेस पूर्व में जीत दर्ज कर चुकी है, हालांकि पिछले कुछ दशकों से उसे यहां सफलता नहीं मिली है। 2017 के चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार समीर भाटी तीसरे स्थान पर रहे थे। दादरी में 2022 में चौथे स्थान पर रहे कांग्रेस के वर्तमान जिलाध्यक्ष दीपक चोटीवाला एक बार फिर से अपना दावा कर रहे है I राजकुमार भाटी के तीन बार हारने और उनके लगातार विवादित होने के चलते समाजवादी पार्टी वैसे भी यहाँ अपना प्रत्याशी देने में कोई सम्भावना नहीं देख रही है ऐसे यहाँ भी कांग्रेस को परेशानी नहीं होगीI
वहीं, नोएडा विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई और यहां पहला चुनाव 2012 में हुआ था। गठन के बाद से लेकर अब तक यहाँ कुल 4 चुनाव (3 आम चुनाव और 1 उपचुनाव) हुए हैं और इन सभी में भाजपा (BJP) ने जीत दर्ज की है। सपा की तरह इस सीट पर कांग्रेस को कभी सफलता नहीं मिली। उदाहरण के लिए, 2012 के चुनाव में कांग्रेस के डॉ. वी.एस. चौहान चौथे स्थान पर रहे थे और 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी पंखुड़ी पाठक को मात्र 13,494 वोट मिले थे और वे चौथे स्थान पर रही थीं। किन्तु ब्राह्मण बाहुल्य और शहरी होने के कारण नोएडा की ये सीट अगर गठबंधन के तहत कांग्रेस के खाते में जाती हैं, तो स्थानीय स्तर पर समीकरण काफी हद तक बदल सकते हैं। नोएडा सीट से इस बार समाजवादी पार्टी से शिक्षाविद मुकेश शर्मा दावेदारी कर रहे हैंI उनके नाम की विधिवत घोषणा तो नहीं हुई है किन्तु पुरे शहर में उनके प्रचार के पोस्टर विभिन्न कारणों से दिखाई दे रहे हैI विधान सभा चुनाव से पहले हुई रामलीलाओ, दुर्गापुजाओ में भी उनके दान और सम्मान की चर्चाये शहर में आम हैं, लेकिन यदि यह सीट कांग्रेस को मिलती है, तो उनकी उम्मीदवारी को लेकर संशय पैदा हो सकता है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस इस सीट से पंखुड़ी पाठक को मैदान में उतार सकती है, या फिर एक अन्य संभावना यह भी जताई जा रही है कि सपा से टिकट की दौड़ में आगे चल रहे मुकेश शर्मा को गठबंधन के तहत कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर मैदान में उतारा जा सके। इससे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों को कोई परेशानी होने की संभवना कम होगी I दोनों के ही स्थानीय संगठन नए नाम के कारण कोई विरोध करने की स्थिति में भी नहीं होंगेI
फिलहाल, दोनों दलों के बीच बातचीत शुरुआती दौर में है और आने वाले हफ्तों में सीटों के वास्तविक आंकड़ें और दोनों दलों की प्राथमिकताओं पर स्थिति अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है।



