डांस ऑफ डेमोक्रेसी : अखिलेश यादव के ग्रेटर नोएडा आगमन पर आम जनता को हुई परेशानी से उठे प्रश्न, लोकतंत्र की आड़ में नेताओ का सामंतवाद कब तक करेगा आम जन का शोषण?

आशु भटनागर
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आशु भटनागर । बुधवार को उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में अपने कार्यकर्ता के कार्यक्रम में भाग लिया। कथित तोर पर सार्वजानिक किन्तु इस निजी निजी कार्यक्रम ने आम जनता की जीवन में सड़कों पर बैरिकेड और परेशानी ला दी। नोएडा पुलिस ने बिसरख गांव के सपा कार्यकर्ता के घर के पास भव्य समारोह के कारण एकमात्र सड़क के दोनों मार्गों पर बैरिकेड लगा दिए, जिससे अस्पताल तक पहुंचने वाले लोगों को भी समस्या का सामना करना पड़ा।

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दुखद तथ्य यह है कि इसी सड़क पर बिसरख गांव में ही नोएडा पुलिस कमिश्नरेट का बिसरख पुलिस थाना स्थित है और एकमात्र सीएचसी अस्पताल भी है। बैरिकेडिंग के कारण माताएं, जो अपने बच्चों को टीका लगवाने जा रही थीं, उन्हें 2 किलोमीटर तक पैदल चलकर अस्पताल पहुंचना पड़ा। पुलिस ने अस्पताल जा रहे लोगों को कार्यक्रम के दौरान रास्ता बदलने और कुछ घंटे बाद आने के लिए कहा। इससे लोगों का गुस्सा बढ़ गया और उन्होंने नेताओं के इस नए सामंतवाद पर आक्रोश प्रकट किया, जो केवल एक पार्टी के कार्यक्रम के कारण आम जनता की दिशा को नियंत्रित करता है।

लोगों के प्रश्नों पर चर्चा हम लेख के अगले हिस्से में लेंगे किंतु उससे पहले यह समझना होगा कि भारतीय लोकतंत्र की स्थापना का सपना दिखाने वाले महात्मा गांधी ने क्या कभी यह सोचा था कि स्वतंत्रता के बाद भी इस देश का सामान्य आदमी उन्हें ब्रिटिश कालीन सामंतवादी परंपराओं की बेड़ियों में जकड़ा रहेगा जिनको हटाकर अपने लोगों का स्वराज लाना चाहते थे । ब्रिटिश कालीन गुलामी से भारत को मुक्ति तो मिली किंतु स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद एक आम भारतीय उन्हें परंपराओं में फिर से बंधन महसूस करने लगा है । आखिर हमारे नेता हमारे पुलिस हमारी व्यवस्था आज भी उन्हें ब्रिटिश कालीन परंपराओं से क्यों बनी हुई है जिसमें किसी नेता के आने पर उसे जगह पर आने जाने से आम जनता को रोक दिया जाता है और स्वयं नेताओं को इस व्यवस्था से कभी कोई शिकायत क्यों नहीं होती जिसमें उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि उनके कारण कितने लोगों को परेशानी होने वाली है ।

यह प्रश्न तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव स्वयं नोएडा में जनता के बीच नहीं आते हैं, तब उनकी यह चुनाव नीतियाँ और कार्यक्रम किसके लिए हैं? सच तो ये है कि अखिलेश यादव ने गत तीन वर्षों में नोएडा में सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किए है बल्कि, उन्होंने कई बार अपने कार्यकर्ताओं के निजी मामलों में ही भाग लिया है, जैसे शादी, जन्मदिन या शोक कार्यक्रम आदि।कई लोगो का दावा है कि संसद सत्र के दौरान दिल्ली होने के कारण अक्सर अखिलेश यादव ऐसे ही अपने कार्यकर्ताओं से मिलने चले जाते हैं।

ऐसे में आम लोगों की यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि क्या पूर्व मुख्यमंत्री को आम जनता से कुछ लेना-देना है? सामान्य जनता के दृष्टिकोण से यह एक अस्वीकार्य स्थिति है। राजनीतिक दलों के नेता सामंतवादी प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते दिख रहे हैं, जिनका आम जनजीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न अखिलेश यादव के कार्यकर्ताओं और स्थानीय समाजवादी संगठन के प्रति भी उठना है कि क्या उनकी पार्टी के नेता अखिलेश यादव से अपने व्यक्तिगत संबंधों की प्रगाड़ता दिखाने के लिए इस तरीके के कार्य कर रहे हैं, क्या अपने पिता की स्मृति में हुए किसी आयोजन के अवार्ड समारोह में अखिलेश यादव को बुलाकर गांव के आसपास बनी सोसाइटियों के 200000 लोगों को कुछ घंटे के लिए रोक देना जनहित की राजनीति है या फिर यह उसे सामंतवादी सोच को आगे बढ़ती है जिसमें अपने अहम की तुष्टि के लिए आम जनता को कुछ समझा ही नहीं जाता था ।

इसके अलावा, नोएडा पुलिस कमिश्नरेट की भूमिका भी प्रश्नों के घेरे में है। क्या उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री के इस कार्यक्रम को सामाजिक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए अनुमति देनी चाहिए थी, जिसके कारण आमजन कई घंटे के लिए इस क्षेत्र के एक मात्र पुलिस थाने और एक मात्र अस्पताल तक जाने से रुक गए । प्रश्न यह है कि अगर पुलिस के पास इस कार्यक्रम की सूचना सार्वजनिक समारोह की थी तो क्या पूर्व मुख्यमंत्री के लिए बने प्रोटोकॉल के अनुसार उन्हें किसी बड़े ग्राउंड या खुले स्थान पर कार्यक्रम करने के लिए नहीं कहना चाहिए था और अगर इस कार्यक्रम की सूचना एक पारिवारिक कार्यक्रम की थी तो फिर पुलिस ने कार्यक्रम स्थल के दोनों ही और दो किलोमीटर तक का रास्ता क्यों सेनीटाइज कर दिया ।

आखिर इस देश में यूरोप की तरह हम कब यह समझेंगे कि नेताओं के वीवीआईपी या सामंतवादी सोच को बदलने का समय आ चुका है । कब तक हमारे नेता और हमारा पुलिस प्रशासन नेताओं को स्पेशल ट्रीटमेंट देने के नाम पर आम जनता को परेशान करता रहेगा ? और अगर नहीं तो महात्मा गांधी द्वारा स्वतंत्रता के दिखाए गए उसे सपना को क्या देश का आम नागरिक सपना ही समझेगा या कभी वह स्वतंत्र होने का एहसास भी कर पाएगा।

या फिर इसके पीछे की सोच यह दर्शाती है कि आज भी हमारे राजनीतिक नेताओं के लिए लोकतंत्र का अर्थ कुछ नहीं है। उनके लिए लोकतंत्र केवल सत्ता में आकर जनता का प्रतिनिधित्व करना नहीं है या फिर उसे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए आम व्यक्ति को अपदस्थ करना है, यह सवाल सभी राजनीतिक दलों और संगठनों के लिए गंभीरता से विचार करने का है।

आम जन यह जानना चाहते हैं कि जो नेता केवल चुनाव के समय अपनी बातों से समाजवाद की बात करते हैं, वे हमारी समस्याओं के प्रति संवेदनशील होंगे या उनके प्रति अपनी सामंतवादी सोच को दर्शाते रहेंगे। यह सिस्टम और सरकारे कब आम लोगों के लिए आवश्यक बातों को समझेगे और इस तरह की घटनाओं से सीख लेकर अगली बार सबक लेगी। यह केवल अखिलेश यादव के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए एक सबक है। हमारे नेताओं को यह समझना होगा कि सत्ता की जबाबदेही आम जनता के प्रति है और उनकी परेशानियां, उनकी आवश्यकताएं और उनकी भावनाएं दरकिनार नहीं की जा सकतीं। यह समय है बदलाव की ओर, यह समय है एक ऐसे लोकतंत्र की ओर जाने का जो असली में जनता का हो।

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आशु भटनागर बीते 15 वर्षो से राजनतिक विश्लेषक के तोर पर सक्रिय हैं साथ ही दिल्ली एनसीआर की स्थानीय राजनीति को कवर करते रहे है I वर्तमान मे एनसीआर खबर के संपादक है I उनको आप एनसीआर खबर के prime time पर भी चर्चा मे सुन सकते है I Twitter : https://twitter.com/ashubhatnaagar हम आपके भरोसे ही स्वतंत्र ओर निर्भीक ओर दबाबमुक्त पत्रकारिता करते है I इसको जारी रखने के लिए हमे आपका सहयोग ज़रूरी है I एनसीआर खबर पर समाचार और विज्ञापन के लिए हमे संपर्क करे । हमारे लेख/समाचार ऐसे ही सीधे आपके व्हाट्सएप पर प्राप्त करने के लिए वार्षिक मूल्य(रु999) हमे 9654531723 पर PayTM/ GogglePay /PhonePe या फिर UPI : ashu.319@oksbi के जरिये देकर उसकी डिटेल हमे व्हाट्सएप अवश्य करे