आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट जैसे-जैसे करीब आ रही है, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राज्य की मशीनरी को ‘मिशन मोड’ में डाल दिया है। एक दशक पूर्व भूमि ले चुके उधोगपतियो को सरकार का स्पष्ट संदेश है— “या तो काम दिखाओ, या जगह खाली करो।” इसी कड़ी में अब बाबा रामदेव का ‘पतंजलि ग्रुप’ उत्तर प्रदेश सरकार और यमुना विकास प्राधिकरण (YEIDA) के निशाने पर आ गया है।
लगभग एक दशक पुराने वादों और कागजी दावों के बीच अब धरातल पर परिणाम की मांग की जा रही है। सवाल यह है कि क्या अगले कुछ महीनों में पतंजलि अपनी साख बचा पाएगा या भारी-भरकम निवेश के दावे महज़ जुमला साबित होंगे?

एक दशक का इंतजार और ‘इन्वेस्ट यूपी’ का दम
पतंजलि ग्रुप और यमुना प्राधिकरण के बीच की कहानी 2016 के आसपास शुरू हुई थी। उत्तर प्रदेश सरकार ने 2018 में पतंजलि को बड़ी रियायतें और सब्सिडी देते हुए 430 एकड़ जमीन आवंटित की थी। योजना भव्य थी:
- 300 एकड़: मेगा फूड पार्क (अनुमानित निवेश ₹1,600 करोड़)।
- 130 एकड़: आयुर्वेद पार्क।
दावा किया गया था कि पतंजलि फूड एंड हर्बल पार्क से क्षेत्र में 3,000 से अधिक प्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे और स्थानीय किसानों की किस्मत बदल जाएगी। वर्ष 2022 में पतंजलि ने ₹231 करोड़ का भुगतान भी किया, लेकिन हकीकत यह है कि एक दशक बीतने के बाद भी 130 एकड़ के आयुर्वेद पार्क में केवल एक ‘बिस्कुट फैक्ट्री’ उद्घाटन की स्थिति तक पहुँच पाई है, जबकि 300 एकड़ का ‘मेगा फूड पार्क’ अभी भी बंजर पड़ा है।
लखनऊ दरबार की नाराजगी और ‘अल्टीमेटम’
विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, बीते सप्ताह पतंजलि की सुस्त रफ्तार पर ‘लखनऊ दरबार’ ने तीखी नाराजगी जताई है और पतंजलि पर काम दिखाने का दबाब बनाने का निदेश दिया गया है । सूत्रों कि माने तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संदेश स्पष्ट है कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘इन्वेस्ट यूपी’ केवल स्लोगन नहीं, बल्कि धरातल पर दिखने वाली वास्तविकता होनी चाहिए।
यमुना प्राधिकरण ने अब पतंजलि पर दबाव बनाना शुरू कर दिया है। प्राधिकरण के सूत्रों के अनुसार, आयुर्वेद पार्क के भीतर बिस्कुट फैक्ट्री का उद्घाटन हर हाल में अप्रैल माह तक करना होगा। लेकिन असली संकट 300 एकड़ के उस मेगा फूड पार्क पर है, जहाँ अभी ईंट तक नहीं रखी गई है।
स्थानीय निवासियों के लिए क्या हैं मायने?
आम जन के नजरिए से देखा जाए तो यह केवल एक कंपनी और सरकार के बीच का विवाद नहीं है। यह स्थानीय युवाओं के भविष्य और क्षेत्र के आर्थिक विकास से जुड़ा मुद्दा है।
- रोजगार का नुकसान: अब तक 300 एकड़ जमीन पर उद्योग नहीं लग पाने से उन 3,000 परिवारों का हक मारा जा रहा है जिन्हें वहां काम मिलना था।
- अवसर लागत: यमुना प्राधिकरण क्षेत्र (YEIDA) में आज दुनिया भर की कंपनियां निवेश करना चाहती हैं। यदि कोई एक समूह जमीन घेर कर बैठता है, तो वह दूसरी सक्रिय इकाइयों के लिए रास्ता बंद कर देता है।
क्या रद्द होगा आवंटन?
प्राधिकरण के सूत्रों का दावा है कि पतंजलि को दी गई जमीन ‘लीज’ पर है। अनुबंध की शर्तों के अनुसार, यदि तय समय सीमा के भीतर निर्माण या उत्पादन शुरू नहीं होता, तो सरकार को आवंटन निरस्त करने का पूरा अधिकार है। अप्रैल तक बिस्कुट फैक्ट्री का उद्घाटन एक ‘फेस-सेविंग’ (साख बचाने) की कवायद हो सकती है, लेकिन 300 एकड़ मेगा फूड पार्क पर लटकी तलवार अभी हटी नहीं है।
बड़ा सवाल: कौन पहले पलक झपकाएगा?
आज पतंजलि ग्रुप दोराहे पर खड़ा है। एक तरफ बाबा रामदेव की साख है, तो दूसरी तरफ योगी सरकार की ‘निवेश और विकास’ की सख्त नीति। क्या पतंजलि मेगा फूड पार्क पर रातों-रात काम शुरू करने का चमत्कार कर पाएगा? या फिर 2027 चुनाव से पहले सरकार एक कड़ा उदाहरण पेश करते हुए इस बड़े प्रोजेक्ट पर सख्ती करने का साहस दिखाएगी? भविष्य कुछ हो लेकिन एक बात साफ है— अब केवल ‘योग’ से काम नहीं चलेगा, पतंजलि को ‘उद्यम’ करके दिखाना होगा।


