आशु भटनागर। उत्तर प्रदेश की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले नोएडा में इन दिनों एक अजीब शांति है। यह शांति उन मशीनों की नहीं है जो कभी चौबीसों घंटे गूंजती थीं, बल्कि यह शांति उन सैकड़ो घरों की है जिनके परिजन इस समय जेल की सलाखों के पीछे हैं। उन सपनो को देखने वाली आँखों की है , उन चीखो के बाद की सिसकियो की है जो आन्दोलन, उपद्रव के बाद कोई नहीं देख रहा है। सोशल मीडिया पर ऐसी तमाम कहानी वायरल है जिसमें जेल में बंद लोगों के परिवार वाले अपने बच्चों अपने पति अपनी पत्नी अपने पिता की जानकारी लेने के लिए परेशान है ‘औद्योगिक इंजन’ कहे जाने वाले नोएडा के पहिये श्रमिक आज न केवल महंगाई और शोषण से त्रस्त हैं, बल्कि जेल जाने के डर से उनके पूरे परिवारों की कमर टूट चुकी है।
नोएडा सपनों का शहर, मजदूरों के शोषण का नर्क!
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार से अपना और अपने बच्चों का भविष्य संवारने के सपने लेकर नोएडा आए 18 से 50 वर्ष के ये श्रमिक, मुंबईया फिल्मों की तर्ज पर बड़े बनने आए थे। लेकिन यहां की फैक्ट्रियों में उन्हें शोषण, अपमान और महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार मिला है।महिलाओं के साथ अत्याचारों की कहानी और भी दर्दनाक थी। शारीरिक शोषण की घटनाओं के अलावा पीरियड्स में महिलाओं को 12-12 घंटे तक खड़ा करके काम करवाना आम बताया जा रहा था। मजदूरों के हित के बड़े-बड़े दावे करने वाले श्रम विभाग पर फैक्ट्री मालिकों से पैसे लेकर अत्याचारों की कहानियां दबा देने के आरोप भी इतने कामन है कि उन पर अब किसी को दुःख नहीं होता, क्रोध नहीं आता।
कम वेतन और भारी काम के बोझ तले दबे इन लोगों के लिए महंगाई ने ‘कोढ़ में खाज’ का काम किया। वैश्विक तनाव के चलते जब दिल्ली-एनसीआर में गैस सिलेंडर 4000 रुपये तक पहुंचा, तो श्रमिक वर्ग की बेबसी आक्रोश में बदल गई। बच्चों की भूख और मकान के भारी किराए के बीच गैस न मिलना वह आखिरी बूंद थी, जिसने धैर्य का बांध तोड़ दिया।
पुलिस, प्रशासन की विफलता और ‘अज्ञात’ शक्तियों का खेल
आन्दोलन की शुरुआत ब्रहस्पतिवार को नोएडा फेस-2 की एक कंपनी से हुई। पुलिस और श्रम विभाग ने लुभावने वादों से इसे शांत करने का प्रयास तो दिखाया किन्तु समाधान नहीं किया, मजदूरों का भरोसा शुक्रवार और शनिवार तक ही रहा। रविवार को फैक्ट्रियां बंद होने के बाद, मजदूरों के भीतर पनप रहे आक्रोश को एक ऐसी ‘अज्ञात शक्ति’ (जिसे हम अक्सर अर्बन नक्सल कहते है) ने हवा दी, जो सिस्टम के खिलाफ उन्हें लामबंद कर रही थी। नोएडा पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह ने श्रमिक आंदोलन के बाद हालात को लेकर बताया कि हिंसा के मुख्य आरोपी रूपेश रॉय, मनीषा चौहान गिरफ्तार, जबकि आदित्य आनंद फरार है और पुलिस तलाश में जुटी है। उधोगपतियो की संस्था ने आरोप लगाया कि रविवार को जिन 7 पॉइंट को सरकार ने बताया उसमे असली वेतन वृद्दि था ही नहीं जबकि श्रमिक उसी के लिए आन्दोलन पर उतरे थे।
सोमवार को नोएडा पुलिस प्रशासन यह मानकर निश्चिंत था कि रविवार की छुट्टी के बाद सब शांत हो जाएगा। दावा है कि पुलिस ने अतिरिक्त बल तैनात कर अपनी तैयारी पूरी की, लेकिन सोमवार की सुबह स्थिति पूरी तरह बदल गई। 18 से 25 साल के युवाओं की आक्रोशित भीड़ सड़कों पर उमड़ी भीड़ ने यह साबित कर दिया कि शासन का आंकलन गलत साबित हो चुका है।
अर्बन नक्सल नाम की अज्ञात शक्ति बेहद सतर्कता के साथ न सिर्फ मजदूरों को आकर्षित कर रही थी बल्कि उनके बीच ऐसा संदेश भी वायरल कर रही थी जिसे युवाओं का आक्रोश बढ़ता गया और एक समय वह आया जब नोएडा पुलिस के आंकड़ों की माने तो 42000 मजदूर 800 से 1000 लोगों की भीड़ में 40 से 50 जगह आक्रामक हो चला था। दोपहर तक उपद्रव चरम पर था । अब तक श्रमिकों के गरीबी बेबसी से सहानुभूति जाता रहे लोग उनके कृत्यों से उन पर गुस्सा हो रहे थे । आंदोलनकारी ने भीड़ बनते वही सब किया जिसकी आड़ में आम लोग परेशान होने लगे कहीं कोई अपने किसी की मृत्यु में जा रहा था तो उसकी गाड़ी रोक ली गई कहीं कोई एंबुलेंस में शामिल था तो उसको रास्ता नहीं दिया गया। हालात यहां तक हुए की कई जगह आंदोलनकारी ने पत्रकारों के साथ मारपीट कर दी और कई जगह पथराव में पत्रकार तक बाल बाल बच गए। शाम 4:30 बजे तक पुलिस ने लगभग सभी जगह आंदोलन को तितर बितर कर दिया। इस पूरे आंदोलन में सबसे बड़ी समस्या सामने किसी नेतृत्व का ना होना था। व्हाट्सएप संदेशों को पढ़कर भीड़ जोंबी बनकर जहां-जहां से गुजरी वहां उसने उद्योगों की बिल्डिंगों पर लगे चमकदार शीशे तोड़ दिए । उद्योग जगत के महारथी इससे दुखी हुए पूरे दिन औद्योगिक संगठन के अध्यक्षों के फोन गुनगुनाते रहे, उद्योगपति अपने-अपने बिल्डिंगों के ऊपर हमले के समाचार उनको बता रहे थे ।
सवाल वही, जवाब अनसुलझा!
आज स्थिति यह है कि पुलिस के अनुसार अब तक 13 मुकदमे दर्ज, 62 लोगों पर कार्रवाई हुई है जबकि किसान-मजदूर संगठनों के अनुसार 1,000 से अधिक मजदूर तोड़फोड़ के आरोप में जेल में बंद हैं। सोशल मीडिया पर उनके परिवारों की मार्मिक तस्वीरें और रुदन वायरल हो रहे हैं। दूसरी ओर, उद्योगपतियों के बड़े चेहरों का दावा है कि हिंसा में उनके श्रमिक शामिल नहीं थे। यह एक बड़ा विरोधाभास है—अगर आन्दोलन में उनके मजदूर नहीं थे, तो फिर वह कौन था जिसने नोएडा की सड़कों को दहला दिया? और वो कौन हैं जो अब थानों में , जेल में अपने परिजनों के गिरफ्तार करने के आरोप लगा रहे है या उनके बारे में जानकारी ढूंढ रहे हैं
इसके जवाब के लिए एनसीआर खबर ने पूरे आंदोलन को दोबारा से समझने की कोशिश करी, बृहस्पतिवार से लेकर सोमवार तक की घटनाओं की कड़ीयो को फिर से जोड़ा तो सोमवार को होने वाले घटनाओं में जो पैटर्न निकाल कर आया वह बेहद चौंकाने वाला था । फैक्ट्री ओनर्स और उद्योग संगठनों के लोगों से बातचीत के आधार पर यह समझ में आया कि भीड़ में मौजूद उपद्रव करने वाले आंदोलनकारी अपनी-अपनी फैक्ट्री के पास आंदोलन नहीं कर रहे थे बल्कि वह लोग ऑपोजिट डायरेक्शन में आंदोलन कर रहे थे इसका परिणाम यह हुआ कि आंदोलन हिंसक होता गया।
मंगलवार को सरकार की ओर से आए उच्च स्तरीय कमेटी ने घोषणा करते हुए 21% तक की वृद्धि श्रमिकों के वेतन में करने का फैसला सुनाया इसके साथ ही श्रमिकों की अन्य समस्याओं जैसे ओवरटाइम, महिलाओं के शोषण के समाधान को लेकर फैक्ट्री मालिकों को निर्देश भी दिए ।
जिलाधिकारी के निर्देशों के बाद एक्टिव हुए श्रम विभाग ने हाल ही में कुछ ठेकेदार कंपनियों पर पेनल्टी लगाकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की है, लेकिन सवाल अभी भी गंभीर हैं। क्या यह पेनल्टी केवल खानापूर्ति है? क्या उन उद्योगपतियों की मानसिकता बदलेगी जो वेतन बढ़ाने की मांग पर आज प्रेस कांफ्रेंस कर ‘उद्योग पलायन’ की धमकी दे रहे हैं? क्या भारत जैसे देश में कभी श्रमिको को वो सुविधाए और सम्मान मिलेगा जो विकसित देशो में मिलता है ?
फिलहाल, नोएडा की फैक्ट्रियों के बाहर वकीलों के चक्कर काटते और अपने परिजनों की रिहाई के लिए गिड़गिड़ाते मजदूर यह पूछने पर मजबूर हैं कि आखिर उनके ‘उज्जवल भविष्य’ का सपना, जेल की कालकोठरी में क्यों दम तोड़ रहा है? नोएडा का औद्योगिक पहिया तो शायद फिर चलने लगे, लेकिन सामाजिक न्याय का यह घाव कब भरेगा? इन प्रश्नों के उत्तर हम भविष्य में तलाशने की कोशिश करेंगे मगर तब तक इन श्रमिकों के दर्द को समझने के लिए लिए एक की कुछ पंक्तियां याद आती है
ज़िंदगी की तलाश में हम मौत के कितने पास आ गए
जब ये सोचा तो घबरा गए आ गए हम कहाँ आ गए
सोचो हम कब इतने मजबूर थे जो न करना था वो कर गए
पीछे मुड़ के जो देखा ज़रा अपने हालात से डर गए
खुद के बारे में सोचें जो हम अपने आप से शरमा गए
जब ये सोचा तो घबरा गए


